India-US LPG Supply: युद्ध के बीच बदला भारत का गैस सप्लाई नेटवर्क, अमेरिका बना सबसे बड़ा LPG पार्टनर

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भारत की रसोई गैस सप्लाई व्यवस्था में पिछले कुछ महीनों के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास पैदा हुई अस्थिरता ने भारत के पारंपरिक LPG सप्लाई नेटवर्क को प्रभावित किया है। ऐसे समय में भारत ने अपनी जरूरत पूरी करने के लिए अमेरिका की ओर रुख किया और देखते ही देखते अमेरिकी LPG भारत के आयात बाजार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी वाला स्रोत बन गया।

कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स कंपनी Kpler के टैंकर डेटा के मुताबिक, मार्च से अगस्त 2026 के बीच भारत के कुल LPG आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर 53 फीसदी हो गई। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ठीक पहले सितंबर 2025 से फरवरी 2026 के छह महीनों में अमेरिका की हिस्सेदारी महज 7.9 फीसदी थी। यानी कुछ ही महीनों में भारत के LPG आयात में अमेरिका की भूमिका कई गुना बढ़ गई।

इस बदलाव के पीछे केवल व्यापारिक गणित नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया में युद्ध और उससे जुड़ी ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता भी बड़ी वजह है। भारत लंबे समय से LPG के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर रहा है। लेकिन जब उस क्षेत्र से आने वाली सप्लाई में बाधा पैदा हुई, तब भारत के लिए वैकल्पिक स्रोत तलाशना जरूरी हो गया।

छह महीने में पूरी तरह बदल गया LPG आयात का समीकरण

आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत ने सितंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच अमेरिका से लगभग 9.93 लाख टन LPG आयात किया था। इसके बाद मार्च से अगस्त 2026 के दौरान अमेरिकी LPG आयात बढ़कर करीब 37.8 लाख टन हो गया। यानी छह महीने में अमेरिका से LPG आयात में लगभग 281 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

दिलचस्प बात यह है कि इसी अवधि में भारत का कुल LPG आयात बढ़ने के बजाय घट गया। मार्च-अगस्त के दौरान भारत का कुल LPG आयात करीब 71.4 लाख टन रहा, जो इससे पहले के छह महीनों की तुलना में 43.1 फीसदी कम था। ऐसे में कुल आयात घटने के बावजूद अमेरिकी LPG की मात्रा में इतनी तेज बढ़ोतरी यह दिखाती है कि सप्लाई संकट के बीच भारत ने अपने स्रोतों का रुख तेजी से बदला।

यानी भारत की रणनीति केवल ज्यादा LPG खरीदने की नहीं थी, बल्कि उपलब्ध स्रोतों में बदलाव करके सप्लाई को बनाए रखने की भी थी। अमेरिका इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर सामने आया।

पहले खाड़ी देश थे भारत के प्रमुख सप्लायर

पश्चिम एशिया संकट से पहले भारत की LPG जरूरतों में खाड़ी देशों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। UAE, कतर, कुवैत और सऊदी अरब लंबे समय से भारत को LPG की बड़ी मात्रा उपलब्ध कराते रहे हैं।

सितंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच UAE भारत के LPG आयात का सबसे बड़ा स्रोत था और उसकी हिस्सेदारी 37.8 फीसदी थी। कतर की हिस्सेदारी 21.1 फीसदी, कुवैत की 15.1 फीसदी और सऊदी अरब की 14.1 फीसदी थी।

लेकिन मार्च से अगस्त 2026 के दौरान तस्वीर पूरी तरह बदल गई। UAE की हिस्सेदारी घटकर 13.4 फीसदी रह गई। कतर का हिस्सा 5.7 फीसदी, कुवैत का 4.9 फीसदी और सऊदी अरब का 5.9 फीसदी रह गया।

इस बदलाव से साफ है कि पश्चिम एशिया में पैदा हुई आपूर्ति संबंधी समस्याओं का असर भारत के LPG स्रोतों पर कितना गहरा पड़ा। जहां पहले खाड़ी देशों का दबदबा था, वहीं अब अमेरिकी सप्लाई ने बाजार में प्रमुख स्थान हासिल कर लिया है।

आखिर अमेरिका से ही क्यों बढ़ी खरीद?

अमेरिका दुनिया के प्रमुख LPG निर्यातकों में शामिल है। इसलिए जब भारत के पारंपरिक सप्लाई रूट में परेशानी बढ़ी तो अमेरिकी LPG एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक विकल्प बनकर सामने आया।

Kpler के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम एशिया से LPG की सप्लाई प्रभावित होने के बाद भारत ने दूरस्थ बाजारों से खरीद बढ़ाई। अमेरिका इस लिहाज से एक महत्वपूर्ण स्रोत था, जहां से बड़ी मात्रा में LPG निर्यात की क्षमता मौजूद है।

यह बदलाव किसी एक दिन में नहीं हुआ। भारत और अमेरिका के बीच LPG व्यापार को बढ़ाने की दिशा में पहले से भी कदम उठाए जा रहे थे। CRISIL के एक विश्लेषण के अनुसार, 2025 के अंत में अमेरिका के साथ 2.2 मिलियन टन प्रति वर्ष की LPG व्यवस्था ने भी इस बदलाव के लिए आधार तैयार किया था। यह मात्रा भारत के सालाना LPG आयात का लगभग 10 फीसदी बैठती है।

इसके बाद जब पश्चिम एशिया में संकट गहराया तो अमेरिका से आने वाली LPG खेपों को बढ़ाना भारत के लिए एक व्यावहारिक विकल्प बन गया।

होर्मुज क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

भारत के LPG सप्लाई नेटवर्क को समझने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की भूमिका को समझना बेहद जरूरी है। यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के ऊर्जा कारोबार के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है।

भारत के लिए इसकी अहमियत और भी ज्यादा है क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में देश के LPG आयात का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर आता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत के करीब 90 फीसदी LPG आयात, 60 फीसदी LNG आयात और लगभग 40 फीसदी कच्चे तेल का आयात सामान्य परिस्थितियों में होर्मुज रूट से जुड़ा रहता है।

इसलिए जब इस क्षेत्र में सैन्य तनाव या जहाजों की आवाजाही से जुड़ी समस्या पैदा होती है, तो उसका असर सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।

यही वजह है कि भारत के लिए अमेरिका से LPG खरीद बढ़ाना सिर्फ एक व्यापारिक फैसला नहीं था। यह ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखने और किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की रणनीति का हिस्सा भी बन गया।

अमेरिका की हिस्सेदारी 7.9 फीसदी से 53 फीसदी

भारत के LPG आयात में अमेरिकी हिस्सेदारी में हुआ बदलाव इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

सितंबर 2025 से फरवरी 2026: 7.9 फीसदी

मार्च से अगस्त 2026: 53 फीसदी

यानी छह महीने की अवधि में अमेरिकी हिस्सेदारी में 45.1 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई। वहीं इसी दौरान पारंपरिक खाड़ी सप्लायरों की हिस्सेदारी में तेज गिरावट आई।

यह आंकड़ा बताता है कि संकट के दौरान भारत ने किस तेजी से अपने LPG आयात के स्रोतों को बदला। अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ-साथ खाड़ी देशों का संयुक्त प्रभाव काफी कम हुआ।

क्या भारत हमेशा अमेरिका पर निर्भर रहेगा?

अमेरिका की बढ़ी हुई हिस्सेदारी को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आने वाले वर्षों में भारत की LPG जरूरतों का बड़ा हिस्सा अमेरिका से पूरा होगा।

इसका जवाब फिलहाल निश्चित नहीं है। अगस्त 2026 के आंकड़े बताते हैं कि खाड़ी देशों से LPG सप्लाई में फिर से सुधार शुरू हुआ। उस महीने अमेरिकी LPG शिपमेंट करीब 7.19 लाख टन रहा, जबकि जुलाई में यह 8.93 लाख टन था। इसके बावजूद अमेरिकी हिस्सेदारी 50 फीसदी से ऊपर बनी रही। दूसरी ओर, खाड़ी देशों की संयुक्त सप्लाई अगस्त में 44.2 फीसदी बढ़कर करीब 4.49 लाख टन हो गई।

इससे संकेत मिलता है कि बाजार में अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच प्रतिस्पर्धा फिर बढ़ सकती है। अगर पश्चिम एशिया से सप्लाई सामान्य होती है तो पारंपरिक सप्लायर अपनी हिस्सेदारी वापस हासिल कर सकते हैं।

लेकिन संकट ने भारत को एक महत्वपूर्ण सबक जरूर दिया है—ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक ही क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।

भारत ने सप्लाई के विकल्प बढ़ाने शुरू किए

भारत अब केवल अमेरिका की ओर ही नहीं देख रहा है। ऊर्जा संकट के बाद देश ने LPG के लिए कई वैकल्पिक स्रोत तलाशने शुरू किए हैं।

अगस्त 2026 में आई रिपोर्टों के मुताबिक, भारत ने अल्जीरिया से भी LPG आयात बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। Indian Oil Corporation ने 2027 के लिए Sonatrach से नियमित LPG कार्गो लेने की व्यवस्था की है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत हर महीने लगभग 45,000 से 55,000 टन LPG वाला एक बड़ा गैस कैरियर लिया जा सकता है।

इस तरह भारत की रणनीति धीरे-धीरे एक ऐसे मॉडल की ओर बढ़ती दिख रही है जिसमें अमेरिका, खाड़ी देश और अन्य उत्पादक सभी ऊर्जा आपूर्ति के हिस्सेदार हों।

महंगी पड़ सकती है यह रणनीति

अमेरिका से LPG खरीद बढ़ाने का एक दूसरा पहलू लागत भी है। अमेरिकी LPG को भारत तक पहुंचाने के लिए लंबी समुद्री दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में परिवहन, जहाजों और बीमा की लागत बढ़ सकती है।

Centre for Research on Energy and Clean Air के आकलन के अनुसार, मार्च से अगस्त 2026 के दौरान भारत की अतिरिक्त LPG आयात लागत करीब 1.1 अरब डॉलर आंकी गई। रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया कि 14.2 किलोग्राम के घरेलू LPG सिलेंडर की आयात-समता लागत युद्ध से पहले की अपेक्षा लगभग 29 फीसदी अधिक रही। हालांकि यह खुदरा उपभोक्ता द्वारा भुगतान की जाने वाली कीमत नहीं है, क्योंकि इसमें सब्सिडी, टैक्स और वितरण मार्जिन जैसे तत्व शामिल नहीं होते।

इसलिए अमेरिका से ज्यादा LPG खरीदने का फायदा सिर्फ सप्लाई की उपलब्धता से नहीं मापा जा सकता। इसकी कीमत और लॉजिस्टिक्स लागत भी महत्वपूर्ण रहेगी।

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का नया अध्याय

भारत की सालाना LPG खपत 3.3 करोड़ टन से अधिक है और करीब 60 फीसदी जरूरत आयात से पूरी होती है। इतनी बड़ी जरूरत को देखते हुए देश के लिए स्थिर और विविध सप्लाई नेटवर्क बेहद जरूरी है।

पश्चिम एशिया संकट ने यह दिखा दिया कि अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का असर केवल कच्चे तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा प्रभाव रसोई गैस जैसे रोजमर्रा के ईंधन पर भी पड़ सकता है।

अमेरिका से LPG आयात में हुई 281 फीसदी की वृद्धि इसी बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। कुछ महीने पहले जिस देश की भारत के LPG आयात में हिस्सेदारी 7.9 फीसदी थी, वही अब 53 फीसदी हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा स्रोत बन गया है।

आगे क्या होगा?

आने वाले महीनों में भारत के LPG आयात का समीकरण पश्चिम एशिया की स्थिति, होर्मुज मार्ग की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय LPG कीमतों और अमेरिकी सप्लाई की लागत पर निर्भर करेगा।

अगर खाड़ी देशों से सप्लाई पूरी तरह सामान्य होती है तो UAE, कतर, कुवैत और सऊदी अरब अपनी पुरानी हिस्सेदारी वापस बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं। अगस्त में Gulf suppliers की बढ़ती सप्लाई इसका शुरुआती संकेत भी दे चुकी है।

वहीं दूसरी तरफ भारत के लिए अमेरिका अब केवल एक वैकल्पिक स्रोत नहीं रह गया है। पिछले छह महीनों में जिस तेजी से अमेरिकी LPG ने भारतीय बाजार में जगह बनाई है, उससे दोनों देशों के ऊर्जा व्यापार में एक नया आयाम जुड़ गया है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत अब अधिक विविध सप्लाई नेटवर्क की ओर बढ़ रहा है। पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका, अल्जीरिया और अन्य देशों से खरीद बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है।

युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव ने भारत के सामने चुनौती जरूर खड़ी की, लेकिन इसी संकट ने देश को अपनी ऊर्जा आपूर्ति के विकल्पों को व्यापक बनाने का मौका भी दिया। अमेरिका का भारत के LPG आयात में 53 फीसदी हिस्सेदारी तक पहुंचना इसी बदलाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। आने वाले समय में यह हिस्सेदारी कितनी स्थायी रहती है, यह पश्चिम एशिया की स्थिति और वैश्विक ऊर्जा बाजार की दिशा तय करेगी।

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