इजरायल चुनाव में किसी गठबंधन को बहुमत नहीं, नेतन्याहू 53 सीटों पर आगे; आइजेनकोट के खाते में 48, अरब दलों की अहम भूमिका

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इजरायल चुनाव 2026: नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें, आइजेनकोट को 48, सरकार गठन पर सस्पेंस बरकरार

इजरायल में त्रिशंकु संसद के संकेत, किसी भी प्रमुख गठबंधन के पास बहुमत नहीं

इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए संसदीय चुनाव के बाद राजनीतिक तस्वीर काफी जटिल होती दिखाई दे रही है। मतगणना के शुरुआती और बाद के रुझानों में लगातार बदलाव के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया है। वहीं, उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के खाते में 48 सीटें जाती दिख रही हैं। अरब दलों को कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान है। इन आंकड़ों ने इजरायल में अगली सरकार के गठन को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है।

इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है और इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। सरकार बनाने के लिए सामान्य तौर पर कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। मौजूदा अनुमान के अनुसार, नेतन्याहू के गठबंधन को बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए आठ अतिरिक्त सीटों की जरूरत है। दूसरी ओर, आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन को 13 सीटें और जुटानी होंगी। इस तरह दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमे अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं दिखाई दे रहे हैं।

मतगणना के लगभग 85.6 प्रतिशत आंकड़ों के आधार पर सामने आए सीट अनुमानों में नेतन्याहू का गठबंधन आगे है, लेकिन सीटों की यह बढ़त सरकार बनाने की गारंटी नहीं देती। इजरायल की बहुदलीय संसदीय व्यवस्था में सबसे बड़ी पार्टी या सबसे अधिक सीटों वाला गठबंधन होना और सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटा लेना दो अलग-अलग बातें हैं। इसी वजह से चुनाव के बाद अब राजनीतिक दलों के बीच संभावित सहयोग, गठबंधन और समर्थन के विकल्पों पर चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है।

लिकुड सबसे बड़ी पार्टी बनने की स्थिति में

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड चुनाव के बाद सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरती दिखाई दे रही है। हालांकि, किसी पार्टी का सबसे बड़ी पार्टी बनना अपने आप में सरकार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इजरायल की व्यवस्था में संसद में बहुमत हासिल करने के लिए अलग-अलग दलों के बीच समझौता करना पड़ता है।

नेतन्याहू लंबे समय से इजरायल की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। उनके राजनीतिक नेतृत्व का आधार दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी और धार्मिक विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन रहा है। वर्ष 2022 के चुनाव के बाद उन्होंने दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के सहयोग से सरकार बनाई थी। उस समय गठबंधन को 120 सदस्यीय संसद में 64 सीटों का समर्थन हासिल था।

2026 के चुनाव के बाद सामने आ रहे आंकड़े इस स्थिति से अलग हैं। मौजूदा अनुमान में नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिल रही हैं, जो बहुमत से आठ कम हैं। इसका अर्थ है कि उन्हें अपने मौजूदा सहयोगियों के अलावा अन्य दलों का समर्थन जुटाना पड़ सकता है। यह प्रक्रिया कितनी आसान या कठिन होगी, इसका निर्धारण राजनीतिक दलों की विचारधारा, नीतिगत प्राथमिकताओं और सार्वजनिक रूप से घोषित रुख पर निर्भर करेगा।

लिकुड के लिए एक चुनौती यह भी है कि चुनावी बढ़त को वास्तविक संसदीय समर्थन में बदलना होगा। संसद में सरकार चलाने के लिए केवल प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का समर्थन पर्याप्त नहीं होता। सहयोगी दलों को सरकार की नीतियों, मंत्रिमंडल में भागीदारी, बजट और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी सहमति बनानी पड़ती है। इस कारण चुनाव परिणामों के बाद होने वाली बातचीत सरकार की स्थिरता के लिहाज से अहम होगी।

आइजेनकोट के नेतृत्व में विपक्ष के सामने भी चुनौती

विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व कर रहे गादी आइजेनकोट इजरायल के पूर्व सैन्य प्रमुख रह चुके हैं। उनकी अगुवाई वाला गठबंधन नेतन्याहू के राजनीतिक विकल्प के रूप में चुनाव मैदान में उतरा। आंशिक मतगणना के अनुसार, इस गठबंधन को 48 सीटें मिलती दिख रही हैं। यह संख्या बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों से काफी कम है।

विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग राजनीतिक दलों को एक साझा सरकार के लिए तैयार करना है। नेतन्याहू का विरोध करने वाले सभी दल जरूरी नहीं कि आर्थिक नीति, सुरक्षा, धार्मिक मुद्दों या अरब दलों के साथ सहयोग के प्रश्न पर एक जैसा रुख रखते हों। चुनाव में एक ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ खड़े होने से किसी गठबंधन के सभी सदस्य सरकार चलाने के लिए स्वतः सहमत नहीं हो जाते।

आइजेनकोट के नेतृत्व वाले खेमे को बहुमत तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त 13 सीटों की आवश्यकता होगी। अरब दलों के 19 सीटों के अनुमान को देखते हुए संसद में संभावित सहयोग के गणित पर ध्यान केंद्रित होना स्वाभाविक है। हालांकि, किसी भी संभावित समझौते को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी। समर्थन औपचारिक गठबंधन के रूप में मिलेगा, बाहर से दिया जाएगा या किसी दूसरे संसदीय समझौते के जरिए बनेगा, यह आगे की बातचीत से स्पष्ट होगा।

विपक्ष को यह भी तय करना होगा कि सरकार बनाने की स्थिति में उसकी साझा प्राथमिकताएं क्या होंगी। अलग-अलग दलों को एक साथ लाने के लिए सुरक्षा नीति, अर्थव्यवस्था, धार्मिक और सामाजिक मुद्दों तथा शासन के तरीके पर सहमति जरूरी हो सकती है। केवल नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने की इच्छा सरकार के पूरे कार्यकाल में स्थिर सहयोग की गारंटी नहीं देती।

इसलिए आइजेनकोट के लिए चुनाव के बाद का दौर उतना ही महत्वपूर्ण है जितना चुनाव प्रचार का समय था। उन्हें अपने गठबंधन के भीतर एकजुटता बनाए रखते हुए अन्य दलों से समर्थन हासिल करने की संभावनाओं पर काम करना होगा।

अरब दलों को 19 सीटें मिलने का अनुमान क्यों अहम है?

चुनाव के बाद सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक अरब दलों का प्रदर्शन है। आंशिक आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर अरब दलों को कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान है। इसमें राअम और जॉइंट लिस्ट जैसे राजनीतिक समूह शामिल हैं। यह संख्या इजरायल की संसद में अरब प्रतिनिधित्व के लिहाज से उल्लेखनीय मानी जा रही है।

अरब दलों की संयुक्त सीटें इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि नेतन्याहू और आइजेनकोट, दोनों प्रमुख गठबंधनों के अनुमानित आंकड़े बहुमत से नीचे हैं। ऐसे में इन दलों की भूमिका सरकार गठन से जुड़ी बातचीत में चर्चा का विषय बन सकती है। हालांकि, यह मान लेना सही नहीं होगा कि अरब दलों की सभी सीटें किसी एक गठबंधन के समर्थन में चली जाएंगी। उनके बीच भी राजनीतिक प्राथमिकताओं और सहयोग को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं।

इजरायल में अरब नागरिक देश की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न लंबे समय से सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहा है। अरब दलों के चुनावी प्रदर्शन को समझने के लिए मतदान, प्रतिनिधित्व, सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रीय नीतियों के संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक है। संसद में अधिक सीटें मिलने से इन दलों को विधायी बहस और संभावित गठबंधन वार्ताओं में अपनी मांगें रखने का अधिक अवसर मिल सकता है।

राअम ने 2021 में इजरायल की एक गठबंधन सरकार में शामिल होकर एक ऐतिहासिक राजनीतिक कदम उठाया था। उस अनुभव ने यह दिखाया कि अरब राजनीतिक दलों की भूमिका केवल विपक्ष तक सीमित रहना जरूरी नहीं है। हालांकि, किसी पुराने राजनीतिक अनुभव को वर्तमान चुनाव के लिए निश्चित परिणाम नहीं माना जा सकता। 2026 में सहयोग की संभावनाएं उस समय की परिस्थितियों और संबंधित दलों के निर्णयों पर निर्भर करेंगी।

यदि किसी सरकार को अरब दलों के समर्थन की आवश्यकता होती है, तो संभावित वार्ता में नागरिक सेवाओं, स्थानीय विकास, सुरक्षा, बजट आवंटन और समान अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठ सकते हैं। लेकिन इन विषयों पर कोई विशेष समझौता हुआ है, ऐसा कहना अभी उचित नहीं होगा। फिलहाल उपलब्ध सीट अनुमानों से केवल इतना स्पष्ट है कि अरब दलों का संयुक्त संसदीय प्रतिनिधित्व इस चुनाव के बाद सरकार गठन की चर्चा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

77.7 प्रतिशत मतदान, 1999 के बाद सबसे ऊंचा स्तर

इजरायल के इस संसदीय चुनाव में मतदान प्रतिशत भी चर्चा का प्रमुख विषय रहा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मतदान लगभग 77.7 प्रतिशत दर्ज किया गया। यह 1999 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया गया है। अधिक मतदान चुनाव में नागरिकों की भागीदारी का संकेत देता है, लेकिन केवल मतदान प्रतिशत से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मतदाताओं ने किसी एक दल या विचारधारा का समर्थन किया।

चुनाव में उच्च भागीदारी का अर्थ यह है कि बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इसके बावजूद, मतदान में बढ़ोतरी का प्रभाव किस दल को कितना लाभ पहुंचा, यह समझने के लिए प्रत्येक पार्टी के वोट, सीटों और अलग-अलग क्षेत्रों के आंकड़ों का विश्लेषण करना जरूरी है।

इजरायल की चुनावी व्यवस्था में मतदाता आम तौर पर संसद के लिए राजनीतिक दलों की सूची को वोट देते हैं। सीटों का बंटवारा राष्ट्रीय स्तर पर दलों के मत प्रतिशत और लागू चुनावी नियमों के अनुसार किया जाता है। इस प्रणाली में कई दल संसद में पहुंच सकते हैं, जिससे एक ही पार्टी के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना कठिन हो सकता है। सरकार बनाने के लिए इसलिए दलों को चुनाव के बाद सहयोगियों की तलाश करनी पड़ती है।

इस चुनाव में 77.7 प्रतिशत मतदान के साथ किसी भी प्रमुख गठबंधन का बहुमत से दूर रहना दिखाता है कि मतदाता भागीदारी और सरकार गठन का परिणाम एक ही बात नहीं हैं। उच्च मतदान के बावजूद राजनीतिक दलों को संसद में आवश्यक समर्थन जुटाने के लिए बातचीत करनी पड़ सकती है।

इजरायल के चुनाव में सैनिकों और विदेशों में तैनात राजनयिकों सहित कुछ श्रेणियों के मतदाताओं की भागीदारी भी महत्वपूर्ण रही। रिपोर्टों के अनुसार, सैन्य कर्मियों के बीच मतदान लगभग 79.9 प्रतिशत रहा। जेलों में मतदान और विदेशों में राजनयिक तैनाती वाले केंद्रों से जुड़े आंकड़े भी सामने आए हैं। हालांकि, इन समूहों के मतदान प्रतिशत से अकेले उनके राजनीतिक रुझान का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

मतगणना अभी पूरी नहीं, विशेष मतपत्र बदल सकते हैं सीटों का बंटवारा

चुनाव के बाद जारी आंकड़ों को अंतिम परिणाम समझना उचित नहीं होगा। लगभग 85.6 प्रतिशत कुल मतों की गणना के आधार पर 53, 48 और 19 सीटों के अनुमान सामने आए थे। लेकिन कुछ विशेष मतपत्रों की गिनती और सत्यापन बाकी होने की बात कही गई है। इसलिए अंतिम सीटों के आंकड़े बदलने की संभावना बनी हुई है।

इन विशेष मतपत्रों में डबल-एनवेलप बैलेट शामिल हैं। ऐसी प्रक्रिया के तहत डाले गए मतों की गिनती से पहले अधिकारियों को यह सत्यापित करना होता है कि संबंधित मतदाता ने पहले किसी दूसरे मतदान केंद्र पर वोट नहीं डाला है। यह प्रक्रिया दोहरे मतदान की संभावना को रोकने और मतगणना की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए अपनाई जाती है।

इन श्रेणियों में सैनिकों, विदेशों में तैनात राजनयिकों, कैदियों और कुछ अन्य पात्र मतदाताओं के मत शामिल हो सकते हैं, जो अपने निर्धारित मतदान केंद्र पर सामान्य प्रक्रिया से वोट नहीं डाल पाए। विभिन्न रिपोर्टों में इन मतपत्रों की संख्या के अलग-अलग अनुमान दिए गए हैं। कुछ शुरुआती आंकड़ों में संख्या लगभग छह लाख तक बताई गई, जबकि बाद के अनुमानों में 4.3 लाख से 4.8 लाख के बीच मतपत्रों का उल्लेख किया गया। इन संख्याओं में अंतर के कारण अंतिम आधिकारिक गणना और चुनाव अधिकारियों की पुष्टि महत्वपूर्ण होगी।

विशेष मतपत्रों की गिनती के कारण सीटों का अंतिम वितरण बदल सकता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि किस गठबंधन को कितना फायदा या नुकसान होगा। इसका जवाब मतों की वास्तविक संख्या, उनका भौगोलिक और राजनीतिक वितरण तथा सीट आवंटन की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

इजरायल के केंद्रीय चुनाव आयोग को मतगणना और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करनी है। अंतिम परिणाम घोषित होने से पहले किसी गठबंधन को निश्चित बहुमत मिलने या किसी दूसरे गठबंधन की सरकार बनने का दावा सावधानी से देखा जाना चाहिए।

इजरायल की चुनावी व्यवस्था में 61 सीटों का महत्व

इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें होती हैं। बहुमत सरकार बनाने के लिए सामान्य राजनीतिक गणित में कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी होता है। यहां प्रधानमंत्री का चयन सीधे किसी एक राष्ट्रीय राष्ट्रपति चुनाव की तरह नहीं होता, जिसमें मतदाता सीधे प्रधानमंत्री के नाम पर वोट डालें। इसके बजाय, संसद की संरचना और दलों के बीच समर्थन का समीकरण सरकार गठन में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

मतदाता राजनीतिक दलों को वोट देते हैं और सीटों का आवंटन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर होता है। इस व्यवस्था का एक परिणाम यह है कि कई राजनीतिक दल संसद में प्रतिनिधित्व हासिल कर सकते हैं। जब कोई दल अकेले बहुमत तक नहीं पहुंचता, तो उसे दूसरे दलों के साथ गठबंधन बनाना पड़ता है।

सरकार गठन की प्रक्रिया में राष्ट्रपति की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। अंतिम चुनावी नतीजे आने के बाद राष्ट्रपति इस बात पर विचार करते हैं कि कौन-सा उम्मीदवार संसद में समर्थन जुटाकर सरकार बना सकता है। इसके लिए राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श किया जाता है। राष्ट्रपति द्वारा किसी उम्मीदवार को सरकार बनाने का अवसर दिया जाना अपने आप में सरकार के गठन की गारंटी नहीं होता। उम्मीदवार को निर्धारित समय के भीतर जरूरी संसदीय समर्थन जुटाना पड़ता है।

चुनाव के बाद बातचीत में कई विषय शामिल हो सकते हैं। इनमें मंत्रिमंडल में पदों का वितरण, बजट, सुरक्षा नीति, धार्मिक और सामाजिक मामलों पर कानून, आर्थिक प्राथमिकताएं और गठबंधन सहयोगियों की अन्य मांगें शामिल हो सकती हैं। यदि सहयोगी दल किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर सहमत नहीं होते, तो बातचीत लंबी खिंच सकती है।

इसलिए 2026 के चुनाव में केवल सीटों की संख्या ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के बीच संभावित सहयोग भी अहम होगा। नेतन्याहू के 53 सीटों वाले गठबंधन और आइजेनकोट के 48 सीटों वाले गठबंधन को आगे बढ़ने के लिए समर्थन के नए रास्ते तलाशने होंगे।

क्या इजरायल में फिर चुनाव हो सकता है?

यदि कोई भी उम्मीदवार जरूरी संसदीय समर्थन जुटाने में सफल नहीं होता, तो इजरायल में राजनीतिक गतिरोध की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में सरकार गठन की वैकल्पिक कोशिशें की जा सकती हैं। यदि संवैधानिक प्रक्रिया के तहत कोई समाधान नहीं निकलता और संसद भंग होती है, तो नए चुनाव की स्थिति भी पैदा हो सकती है।

हालांकि, चुनाव के तुरंत बाद दोबारा मतदान की संभावना को निश्चित परिणाम के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। इजरायल के राजनीतिक दलों के पास बातचीत, सहयोग और अलग-अलग प्रकार के संसदीय समझौतों के जरिए सरकार बनाने के प्रयास करने के विकल्प होते हैं। किसी भी विकल्प का वास्तविक स्वरूप संबंधित दलों की रणनीति और राष्ट्रपति की प्रक्रिया के बाद स्पष्ट होगा।

देश के राजनीतिक इतिहास में पहले भी ऐसे दौर आए हैं, जब लगातार चुनाव होने के बावजूद सरकार बनाने के लिए स्पष्ट बहुमत जुटाना मुश्किल रहा। इससे पता चलता है कि इजरायल की बहुदलीय व्यवस्था में गठबंधन वार्ता केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि शासन की संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

2026 के चुनाव में यदि नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत तक नहीं पहुंचता, तो उन्हें अन्य दलों का समर्थन हासिल करना होगा। इसी तरह आइजेनकोट को भी अपनी सीटों के अलावा अतिरिक्त संसदीय समर्थन जुटाना पड़ेगा। अरब दलों की 19 सीटों का अनुमान इन वार्ताओं को और महत्वपूर्ण बना सकता है, लेकिन उनके समर्थन को पहले से तय नहीं माना जा सकता।

नए चुनाव की स्थिति तभी स्पष्ट होगी, जब सरकार गठन के प्रयासों का परिणाम सामने आएगा। फिलहाल मतगणना और राजनीतिक बातचीत की प्रक्रिया जारी है, इसलिए आगे के घटनाक्रम पर नजर रखना जरूरी है।

नेतन्याहू और आइजेनकोट के लिए आगे की राजनीतिक चुनौतियां

नेतन्याहू के लिए चुनाव के बाद सबसे बड़ी चुनौती अपने गठबंधन को बहुमत तक पहुंचाना है। लिकुड के सबसे बड़ी पार्टी बनने की संभावना उनके राजनीतिक आधार को दर्शाती है, लेकिन 53 सीटों का अनुमान अपने आप में सरकार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह देखना होगा कि कौन-से अतिरिक्त दल उनके साथ काम करने को तैयार हैं और किन मुद्दों पर समझौता संभव है।

दूसरी ओर, आइजेनकोट को विपक्षी दलों को एक साझा राजनीतिक कार्यक्रम पर एकजुट करना होगा। उनके गठबंधन को 48 सीटों का अनुमान मिला है, जबकि बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं। इसलिए उन्हें 13 अतिरिक्त सीटों के बराबर समर्थन की आवश्यकता होगी। यह समर्थन औपचारिक गठबंधन, बाहरी समर्थन या अन्य संसदीय व्यवस्थाओं के जरिए मिल सकता है, लेकिन इसका फैसला राजनीतिक वार्ताओं पर निर्भर करेगा।

दोनों पक्षों को यह भी समझना होगा कि चुनाव के दौरान दिए गए वादों और सरकार चलाने की वास्तविक जरूरतों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होगा। गठबंधन में शामिल दल अपने समर्थकों के सामने किए गए वादों को पूरा करने की अपेक्षा रखते हैं। यदि सरकार की साझा प्राथमिकताओं पर सहमति नहीं बनती, तो बहुमत जुटाने के बाद भी शासन में मुश्किलें आ सकती हैं।

इजरायल की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, नागरिक जीवन और क्षेत्रीय संबंधों से जुड़े मुद्दे नई सरकार के सामने महत्वपूर्ण रहेंगे। लेकिन चुनावी परिणाम अकेले यह नहीं बताते कि इन क्षेत्रों में भविष्य की नीतियां किस दिशा में जाएंगी। इसके लिए सरकार के गठन, गठबंधन समझौते और संबंधित नेताओं के आधिकारिक बयानों का इंतजार करना होगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी परिणाम पर नजर

इजरायल के चुनाव परिणामों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। देश की सुरक्षा नीति, क्षेत्रीय संघर्षों, ईरान के साथ संबंधों और फिलिस्तीन से जुड़े मुद्दों के कारण वहां की सरकार के राजनीतिक फैसलों का प्रभाव देश की सीमाओं से बाहर भी पड़ सकता है।

हालांकि, किसी नई सरकार की विदेश नीति के बारे में ठोस निष्कर्ष निकालने के लिए उसके गठन और आधिकारिक कार्यक्रम को देखना आवश्यक होगा। चुनाव के बाद सामने आए सीटों के अनुमान से यह पता चलता है कि किस राजनीतिक खेमे को कितना संसदीय समर्थन मिल रहा है, लेकिन इससे भविष्य की प्रत्येक नीति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

नेतन्याहू लंबे समय से इजरायल की सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ी बहस के केंद्र में रहे हैं। आइजेनकोट का सैन्य नेतृत्व का अनुभव भी उनकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा है। फिर भी, किसी भी नेता के लिए सरकार चलाने की क्षमता केवल व्यक्तिगत अनुभव पर नहीं, बल्कि संसद में समर्थन और गठबंधन की स्थिरता पर भी निर्भर करती है।

अरब दलों के बढ़े हुए प्रतिनिधित्व से इजरायल के भीतर नागरिक अधिकारों, सामाजिक सेवाओं और राजनीतिक भागीदारी से जुड़ी चर्चाओं को भी महत्व मिल सकता है। लेकिन यह तय करना अभी जल्दबाजी होगी कि इन मुद्दों पर नई संसद या सरकार किस प्रकार के फैसले करेगी।

अंतिम नतीजों के बाद ही स्पष्ट होगी सरकार की तस्वीर

28 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध आंशिक आंकड़ों के अनुसार, इजरायल के संसदीय चुनाव में नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को 53 सीटें, आइजेनकोट के गठबंधन को 48 सीटें और अरब दलों को 19 सीटें मिलने का अनुमान है। लगभग 77.7 प्रतिशत मतदान ने चुनाव में व्यापक भागीदारी को दर्शाया है। फिर भी, किसी भी प्रमुख गठबंधन को बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटें हासिल होती नहीं दिख रही हैं।

मतगणना के बाकी हिस्से और विशेष मतपत्रों का सत्यापन अंतिम सीटों के वितरण को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बाद सरकार गठन की प्रक्रिया में राष्ट्रपति, राजनीतिक दलों और संभावित सहयोगियों की भूमिका अहम होगी।

नेतन्याहू का गठबंधन सीटों के अनुमान में आगे है और लिकुड सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है, लेकिन सरकार बनाने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाना आवश्यक होगा। आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्ष को भी अपने सहयोगियों और अन्य दलों के साथ सहमति बनानी पड़ेगी। अरब दलों की 19 सीटें संभावित संसदीय गणित में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके किसी गठबंधन को समर्थन देने का फैसला अभी निश्चित नहीं है।

फिलहाल चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि इजरायल में सरकार गठन का रास्ता खुला तो है, लेकिन आसान नहीं दिख रहा। अंतिम परिणाम, राजनीतिक बातचीत और संसदीय समर्थन की वास्तविक स्थिति ही तय करेगी कि अगली सरकार किस नेतृत्व में बनेगी या देश को एक बार फिर चुनाव का सामना करना पड़ेगा।

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