
झारखंड का सारंडा जंगल एक बार फिर माओवादी हिंसा से दहल उठा। वर्षों से नक्सल गतिविधियों का अड्डा रहा यह इलाका एक बार फिर उस दर्दनाक घटना का गवाह बना जिसमें आम ग्रामीण, खासकर महिलाएँ, माओवादी साजिश का शिकार हो गईं। IED ब्लास्ट में एक महिला की मौत हो गई, जबकि दो अन्य महिलाएँ गंभीर रूप से घायल हो गईं। यह घटना न केवल सुरक्षा के लिहाज से चिंताजनक है, बल्कि यह भी साफ दिखाती है कि माओवादी अपनी रणनीति में आम लोगों को ढाल बना रहे हैं।
घटना की पूरी कहानी—जंगल के रास्ते में बिछाया गया मौत का जाल
सारंडा जंगल झारखंड का वह इलाका है जो कई दशकों से माओवादियों की गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहां पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा लगातार खोजी अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन नक्सली आए दिन किसी न किसी घटनाक्रम से यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि उनकी पकड़ अभी भी मजबूत है।
घटना वाले दिन महिलाएँ जंगल रास्ते से होकर गुजर रही थीं। इन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि उनकी रोजमर्रा की यात्रा इतनी भयावह हो जाएगी।
रास्ते में माओवादियों ने कई IED (इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) लगाए हुए थे। जैसे ही महिलाएँ उस हिस्से में पहुंचीं, एक जोरदार विस्फोट हुआ।
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एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई
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दो महिलाएँ गंभीर रूप से घायल हो गईं
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आसपास के लोग भी सदमे में आ गए
घायलों को तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज जारी है।
IED का खतरा—माओवादियों की सबसे खतरनाक चाल
माओवादी अक्सर सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए जंगलों, पहाड़ी क्षेत्रों और कच्ची सड़कों में IED लगाते हैं। लेकिन कई बार इन विस्फोटकों का शिकार आम लोग हो जाते हैं।
IED ऐसी तकनीक से तैयार किए जाते हैं कि:
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हल्के वजन या दबाव से भी फट जाएं
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पैदल यात्री, बाइक, साइकिल या यहां तक कि आवारा पशु भी इन्हें एक्टिव कर सकते हैं
यही इस घटना में भी हुआ—लक्षित कोई और था, लेकिन जानें निर्दोष लोगों की गईं।
सारंडा—हिंसा की चपेट में आया शांत इलाका
सारंडा क्षेत्र झारखंड के सबसे घने व बड़े जंगलों में गिना जाता है। यहां कई गांव जंगल के बीच बसे हैं, जहां से लोग रोजाना लकड़ी, पानी या खेती-बाड़ी के काम के लिए आवाजाही करते हैं।
इस इलाके में माओवादी अक्सर सुरक्षाबलों की गतिविधि देखते ही IED लगाते हैं ताकि अभियान को रोक सकें या जवानों को नुकसान पहुंचा सकें।
लेकिन इनकी इस रणनीति की वजह से:
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ग्रामीणों की आवाजाही खतरे में रहती है
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महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर सबसे ज्यादा खतरा आता है
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घर, खेत, स्कूल और अस्पताल तक जाने के लिए भी लोग डरते हैं
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रात के समय तो लोग बाहर निकलने की हिम्मत भी नहीं करते
माओवादियों की नई रणनीति—आम लोगों में डर फैलाना
पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षाबलों ने माओवादियों की ताकत कम की है, लेकिन नक्सली अब भी रणनीतिक वार करके अपनी उपस्थिति दिखाते रहते हैं।
IED ब्लास्ट एक ऐसा तरीका है जिससे:
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सुरक्षाबलों की मूवमेंट रुक जाती है
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ग्रामीणों के बीच डर फैल जाता है
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जंगल में माओवादियों की पकड़ नजर में आती रहती है
हालांकि सुरक्षा एजेंसियां लगातार इन IEDs को डिफ्यूज करने में लगी रहती हैं, फिर भी पूरी तरह सुरक्षित वातावरण तैयार करना आसान नहीं होता।
सरकारी जवाबदेही—सुरक्षा व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
इस घटना ने सरकार और प्रशासन के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं:
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आखिर कब तक आम लोग माओवादी हिंसा की कीमत चुकाते रहेंगे?
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जंगल के रास्तों को सुरक्षित बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
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ग्रामीणों को किस तरह जागरूक किया जा रहा है कि वे खतरे वाले क्षेत्रों से दूर रहें?
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IED से निपटने के लिए तकनीकी सहयोग कितना मजबूत है?
स्थानीय पुलिस और CRPF ने इलाके में सर्च ऑपरेशन तेज कर दिया है। विस्फोट वाली जगह के आसपास और भी IED मिलने की आशंका जताई जा रही है।
ग्रामीणों का डर—“जिंदगी रोज दांव पर है”
घटना से स्थानीय ग्रामीण भयभीत हैं। उनकी दिक्कतें दोहरी हैं:
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जंगल के रास्तों से वे बच नहीं सकते, क्योंकि यही उनकी रोजमर्रा की जरूरतों का मार्ग है।
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लेकिन यही रास्ते माओवादियों के विस्फोटकों से खतरे से भरे रहते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार वे आवाजाही ही बंद कर देते हैं, जिससे खेती और अन्य काम प्रभावित होते हैं।
महिलाओं के लिए यह डर और भी ज्यादा है क्योंकि वे अक्सर लकड़ी, पानी, चारा और पशुओं की देखभाल के लिए दूर-दूर जाती हैं।
IED ब्लास्ट—सिर्फ हादसा नहीं, बड़ा मानवीय संकट
यह घटना सिर्फ एक ब्लास्ट नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि माओवादी अब भी ग्रामीणों की परवाह किए बिना हिंसा फैलाने को तैयार हैं।
महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि वे अधिकतर जंगल या खेतों की ओर जाते हैं।
इस तरह की घटनाएँ स्थानीय विकास कार्यों को भी धीमा कर देती हैं—सड़क, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी बाधित हो जाती हैं।
निष्कर्ष—सुरक्षा से ज्यादा जरूरी है भरोसा
झारखंड के सारंडा जंगल में हुई यह घटना एक बार फिर राज्य की सुरक्षा चुनौतियों को उजागर करती है।
माओवादी हिंसा का सबसे बड़ा शिकार आम नागरिक हैं—और इस बार भी मासूम महिलाएँ IED का शिकार बनीं।
जरूरत है:
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जंगलों को IED मुक्त करने के लिए आधुनिक तकनीक अपनाने की
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ग्रामीणों को खतरे वाली जगहों के बारे में जागरूक करने की
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और सबसे ज़रूरी, ऐसा वातावरण बनाने की जिसमें ग्रामीण खुद को सुरक्षित महसूस करें
जब तक आम लोगों को डरमुक्त वातावरण नहीं मिलेगा, तब तक माओवाद के खिलाफ लड़ाई अधूरी ही रहेगी।