
17 साल की लड़की से रेप के आरोपी ने शादी का दिया हवाला, केरल HC ने कहा- POCSO में चलेगा केस
केरल हाईकोर्ट ने 17 साल की एक नाबालिग लड़की के साथ कथित तौर पर बार-बार दुष्कर्म के मामले में आरोपी व्यक्ति को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। आरोपी ने अदालत में यह दलील दी थी कि वह लड़की का पति है और दोनों की शादी मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। इसी आधार पर उसने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और पॉक्सो मामले को खत्म करने की मांग की थी। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किसी नाबालिग लड़की से शादी होने का दावा आरोपी को POCSO यानी बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाले कानून के तहत आपराधिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।
न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन की एकल पीठ ने आरोपी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की कानून की नजर में बच्ची है और उसके साथ यौन संबंध बनाने पर POCSO Act लागू हो सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विवाह वास्तव में मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाजों के तहत हुआ भी हो, तब भी इससे आरोपी को POCSO के तहत चल रही कार्रवाई से सुरक्षा नहीं मिलेगी।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोपी ने अपनी बचाव की दलील में विवाह और व्यक्तिगत कानून का सहारा लिया था। कोर्ट ने कहा कि POCSO एक विशेष कानून है और इसके तहत 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। इसलिए शादी का दावा इस कानूनी सुरक्षा को समाप्त नहीं करता।
आरोपी ने हाईकोर्ट में क्यों लगाई याचिका?
यह मामला केरल के मन्नारक्कड़ पुलिस स्टेशन में दर्ज एक अपराध से जुड़ा है। मामला फिलहाल पट्टाम्बी की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में लंबित है।
मामले में आरोपी व्यक्ति को मुख्य आरोपी बनाया गया है। उस पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ POCSO Act की धाराओं के तहत भी मामला दर्ज किया गया है।
आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 528 के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की।
उसका मुख्य तर्क था कि जिस लड़की ने शिकायत की, वह उसकी कानूनी पत्नी थी और दोनों का विवाह घटना से पहले हो चुका था।
आरोपी के अनुसार, विवाह 23 जुलाई 2021 को हुआ था और उस समय लड़की की उम्र 17 साल और करीब एक महीने थी।
उसने दावा किया कि शादी मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार दोनों परिवारों की मौजूदगी में हुई थी।
आरोपी ने शादी को बनाया बचाव का आधार
आरोपी की तरफ से अदालत में यह तर्क दिया गया कि अगर लड़की उसकी पत्नी थी तो उसके साथ यौन संबंध को रेप नहीं माना जा सकता।
उसने IPC की धारा 375 के Exception 2 का हवाला दिया।
आरोपी के वकील का तर्क था कि पुराने कानूनी प्रावधान में पति और पत्नी के बीच संबंध को कुछ परिस्थितियों में बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा गया था।
इसी आधार पर आरोपी ने कहा कि उसके खिलाफ चल रही कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसे खत्म कर दिया जाना चाहिए।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा- 18 साल से कम उम्र में POCSO लागू
हाईकोर्ट ने सबसे पहले POCSO Act में बच्चे की परिभाषा पर ध्यान दिया।
POCSO Act की धारा 2(1)(d) के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में लड़की की उम्र 17 वर्ष थी।
इसलिए वह कानून के तहत बच्ची थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम है, तो केवल यह दावा कि वह आरोपी की पत्नी है, POCSO कानून को खत्म नहीं कर सकता।
अदालत के मुताबिक, POCSO में बच्चे की उम्र एक महत्वपूर्ण कानूनी कसौटी है।
शादी से नाबालिग की कानूनी स्थिति नहीं बदलती
अदालत ने यह भी कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि आरोपी और लड़की के बीच मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार विवाह हुआ था, तब भी इससे आरोपी की आपराधिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
यानी शादी हो जाने के बाद भी लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम होने की स्थिति में POCSO Act की सुरक्षा लागू रहेगी।
कोर्ट ने साफ किया कि व्यक्तिगत कानून या धार्मिक रीति-रिवाज किसी विशेष कानून के तहत बच्चे को मिली सुरक्षा को खत्म नहीं कर सकते।
शादी की वैधता पर भी कोर्ट ने उठाया सवाल
हाईकोर्ट ने आरोपी की शादी के दावे को इस चरण पर अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने ध्यान दिया कि आरोपी की ओर से विवाह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया था।
आरोपी ने मुख्य रूप से लड़की, उसके भाई और उस मस्जिद के काजी द्वारा पुलिस को दिए गए बयानों पर भरोसा किया था जहां कथित तौर पर विवाह हुआ था।
लेकिन अदालत ने कहा कि विवाह वास्तव में हुआ था या नहीं और अगर हुआ था तो उसकी कानूनी वैधता क्या है, इन सवालों का अंतिम निर्धारण ट्रायल के दौरान किया जा सकता है।
लेकिन शादी वैध मान भी लें तो भी राहत नहीं
इस मामले में कोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही था।
अदालत ने कहा कि बहस के लिए अगर यह मान भी लिया जाए कि मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह हुआ था, तब भी इससे आरोपी को POCSO मामले में राहत नहीं मिल सकती।
क्योंकि कथित विवाह और उसके बाद के यौन संबंधों के समय लड़की की उम्र 17 वर्ष थी।
यानी विवाह की वैधता का सवाल अलग है और नाबालिग के साथ यौन संबंध पर POCSO लागू होने का सवाल अलग।
कोर्ट ने दोनों विषयों को अलग-अलग कानूनी मुद्दों के रूप में देखा।
POCSO Act का उद्देश्य क्या है?
POCSO यानी Protection of Children from Sexual Offences Act बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया विशेष कानून है।
इस कानून में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है।
कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और अश्लील गतिविधियों से सुरक्षा देना है।
इस कानून की खासियत यह है कि यह बच्चे की उम्र को केंद्रीय आधार बनाता है।
यानी अगर व्यक्ति 18 वर्ष से कम है तो उसकी सुरक्षा के लिए POCSO की धाराएं लागू हो सकती हैं।
व्यक्तिगत कानून बनाम विशेष कानून
इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल व्यक्तिगत कानून और POCSO के बीच संबंध को लेकर भी उठा।
आरोपी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह का हवाला दिया।
लेकिन अदालत ने कहा कि किसी विशेष कानून के तहत बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है तो व्यक्तिगत कानून के आधार पर उस सुरक्षा को खत्म नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने पहले के फैसले और POCSO Act की संबंधित धाराओं का भी उल्लेख किया।
अदालत ने विशेष रूप से POCSO की धारा 42A का हवाला दिया, जिसके तहत अन्य कानूनों के साथ टकराव की स्थिति में POCSO को प्रभावी बनाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला
केरल हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2017 के महत्वपूर्ण फैसले Independent Thought v. Union of India का भी उल्लेख किया।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 375 के Exception 2 की व्याख्या करते हुए 15 से 18 वर्ष की उम्र की पत्नी से यौन संबंध के संबंध में मौजूद पुराने अपवाद को पढ़कर सीमित कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध को केवल विवाह के आधार पर बलात्कार की परिभाषा से बाहर नहीं किया जा सकता।
केरल हाईकोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को वर्तमान मामले में लागू किया।
घटना अक्टूबर 2021 की बताई गई
अभियोजन पक्ष के अनुसार, मामला अक्टूबर 2021 की घटना से जुड़ा है।
आरोप है कि 23 अक्टूबर को आरोपी लड़की को कार में अपने साथ ले गया।
बताया गया कि वह उसे कपड़े खरीदने के बहाने अपने साथ लेकर गया था।
इसके बाद वह उसे अपने घर ले गया।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि वहां लड़की के साथ जबरन यौन संबंध बनाए गए।
चार दिनों तक बार-बार दुष्कर्म का आरोप
मामले में आरोप है कि कथित यौन हिंसा एक दिन तक सीमित नहीं रही।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 23 अक्टूबर से 26 अक्टूबर 2021 के बीच लड़की के साथ कई बार दुष्कर्म किया गया।
मामले में मुख्य आरोपी के अलावा दो अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया है।
इन दोनों पर कथित अपराध को सुविधाजनक बनाने में मदद करने का आरोप है।
हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगी।
आरोपी के परिवार पर भी आरोप
अभियोजन पक्ष ने आरोपी के परिवार से जुड़े लोगों के संबंध में भी आरोप लगाए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, लड़की के आरोपी के घर पहुंचने के बाद उसके साथ कथित घटना हुई।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि आरोपी के माता-पिता को घटना की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने लड़की को वापस नहीं भेजा और कथित अपराध की सूचना संबंधित अधिकारियों को भी नहीं दी।
इन आरोपों पर भी अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर होगा।
आरोपी ने कहा- शिकायत बदले की भावना से
हाईकोर्ट में आरोपी की तरफ से यह भी दावा किया गया कि शिकायत उसके खिलाफ बदला लेने की भावना से दर्ज कराई गई।
उसने अदालत से कहा कि आपराधिक मामला कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल है।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस स्तर पर इन दलीलों के आधार पर केस खत्म करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री को पहली नजर में देखने पर आरोपों में संबंधित अपराधों के आवश्यक तत्व दिखाई देते हैं।
हाईकोर्ट ने क्यों नहीं रद्द किया केस?
आपराधिक मामले को शुरुआती स्तर पर रद्द करने के लिए अदालत को यह देखना होता है कि क्या आरोपों और उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है।
इस मामले में अदालत ने पाया कि अभियोजन की ओर से लगाए गए आरोपों को पूरी तरह खारिज करने का आधार नहीं है।
इसलिए अदालत ने FIR, अंतिम रिपोर्ट और आगे की आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।
यानी आरोपी को अभी ट्रायल का सामना करना होगा।
कोर्ट ने मिनी ट्रायल से किया परहेज
हाईकोर्ट ने इस स्तर पर मामले के सभी साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन करने से भी परहेज किया।
अदालत ने माना कि याचिका आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए है और इस स्तर पर यह तय करना उचित नहीं होगा कि कौन-सा सबूत सही है और कौन-सा गलत।
विवाह की वास्तविक स्थिति और अन्य तथ्य ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर तय किए जा सकते हैं।
POCSO में विवाह कोई अपवाद नहीं
इस फैसले का व्यापक संदेश यही है कि POCSO Act में नाबालिग के साथ यौन संबंध के मामले में विवाह को स्वतः बचाव नहीं बनाया जा सकता।
अगर लड़की 18 वर्ष से कम उम्र की है तो वह POCSO के तहत बच्ची है।
इसलिए आरोपी यह नहीं कह सकता कि शादी के कारण POCSO की धाराएं लागू नहीं होतीं।
लड़की की उम्र क्यों बनी सबसे अहम बात?
पूरे मामले में लड़की की उम्र 17 वर्ष और करीब एक महीने बताई गई है।
यानी वह 18 वर्ष की कानूनी सीमा से स्पष्ट रूप से नीचे थी।
POCSO के तहत 18 वर्ष की उम्र महत्वपूर्ण सीमा है।
यही कारण है कि अदालत ने विवाह के दावे से अधिक लड़की की उम्र को कानूनी सुरक्षा के केंद्र में रखा।
‘पत्नी’ होने का दावा क्यों पर्याप्त नहीं?
अदालत के मुताबिक, किसी नाबालिग को पत्नी कह देने से उसकी कानूनी स्थिति ‘बालिग’ में नहीं बदल जाती।
विवाह का दावा किसी व्यक्ति की उम्र को नहीं बदलता।
अगर व्यक्ति कानून के अनुसार बच्चा है तो POCSO की सुरक्षा बनी रहती है।
यही सिद्धांत इस मामले में लागू किया गया।
धार्मिक रीति-रिवाजों पर कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने किसी धार्मिक समुदाय की विवाह व्यवस्था पर सामान्य टिप्पणी नहीं की।
उसका फोकस केवल इस बात पर था कि किसी भी व्यक्तिगत या धार्मिक कानून का इस्तेमाल POCSO Act के तहत बच्चे को मिली वैधानिक सुरक्षा खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि भले ही विवाह धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ हो, इससे नाबालिग के साथ यौन संबंध के आरोप में POCSO की आपराधिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होगी।
POCSO की धारा 42A का महत्व
POCSO Act की धारा 42A इस मामले में विशेष महत्व रखती है।
यह प्रावधान कानून के अन्य प्रावधानों के साथ टकराव की स्थिति में POCSO को प्रभावी बनाने से संबंधित है।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत कानून और POCSO के बीच टकराव की स्थिति में बच्चे की सुरक्षा वाले विशेष कानून को प्राथमिकता दी।
IPC की धारा 375 पर भी चर्चा
आरोपी ने IPC की धारा 375 के Exception 2 पर भरोसा किया था।
उसका तर्क था कि पति और पत्नी के बीच यौन संबंध को रेप की श्रेणी से बाहर रखने वाला प्रावधान उसे संरक्षण देता है।
लेकिन हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Independent Thought फैसले का हवाला देकर इस दलील को अस्वीकार किया।
अब कानूनी स्थिति यह है कि यह वैवाहिक अपवाद 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध को संरक्षण नहीं देता।
ट्रायल कोर्ट में चलेगा मामला
हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी।
मामला पट्टाम्बी की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट के सामने लंबित है।
वहीं आरोपों, दस्तावेजों और गवाहों की जांच की जाएगी।
अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट द्वारा सभी साक्ष्यों और कानूनी दलीलों को देखने के बाद किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने दोष साबित नहीं किया
यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि हाईकोर्ट ने आरोपी को इस आदेश में दोषी घोषित नहीं किया है।
अदालत ने केवल यह तय किया है कि इस चरण पर उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को खत्म करने का आधार नहीं है।
आरोप सही हैं या नहीं, इसका अंतिम निर्णय ट्रायल के दौरान होगा।
POCSO मामलों में उम्र का प्रमाण अहम
POCSO मामलों में पीड़ित की उम्र का निर्धारण बेहद महत्वपूर्ण होता है।
स्कूल रिकॉर्ड, जन्म प्रमाणपत्र और अन्य आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर उम्र तय की जा सकती है।
इस मामले में भी लड़की की उम्र 17 वर्ष बताई गई है।
यही तथ्य आरोपी के वैवाहिक बचाव के बावजूद POCSO कार्यवाही के लिए महत्वपूर्ण बना।
बाल विवाह का सवाल भी सामने आता है
मामले में कथित विवाह की उम्र 17 वर्ष बताई गई है।
भारत में बाल विवाह को लेकर अलग कानून भी मौजूद है।
हालांकि वर्तमान हाईकोर्ट आदेश का मुख्य सवाल यह नहीं था कि विवाह वैध था या अवैध।
मुख्य सवाल यह था कि कथित विवाह और यौन संबंध के बावजूद POCSO Act लागू होगा या नहीं।
अदालत ने इस सवाल का जवाब स्पष्ट रूप से हां में दिया।
विवाह और यौन अपराध को अलग-अलग देखना होगा
फैसले से एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है।
किसी विवाह की वैधता एक अलग कानूनी प्रश्न हो सकती है।
लेकिन अगर विवाह में शामिल व्यक्ति 18 वर्ष से कम उम्र का है तो उसके साथ यौन संबंध पर POCSO का सवाल अलग से पैदा होता है।
इसलिए विवाह का अस्तित्व अपने आप में POCSO कार्यवाही को समाप्त नहीं करता।
अदालत ने कहा- बच्चे की सुरक्षा प्राथमिक
POCSO कानून का मूल उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है।
इसलिए कानून बच्चे की उम्र को केंद्रीय आधार बनाता है।
केरल हाईकोर्ट के फैसले में भी यही दृष्टिकोण दिखाई देता है।
अदालत ने व्यक्तिगत कानून या वैवाहिक संबंध की तुलना में नाबालिग की वैधानिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
समाज के लिए क्या संदेश?
यह फैसला बाल संरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण संदेश देता है।
कानून किसी नाबालिग को केवल इसलिए यौन अपराधों से कम सुरक्षा नहीं देता क्योंकि उसका विवाह हो गया है या विवाह का दावा किया जा रहा है।
18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति के संबंध में POCSO Act की सुरक्षा लागू रहती है।
आरोपी के लिए आगे क्या विकल्प?
हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद आरोपी के खिलाफ ट्रायल आगे बढ़ेगा।
कानून के तहत उसके पास उपलब्ध अन्य न्यायिक उपायों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
लेकिन वर्तमान आदेश के अनुसार न तो FIR रद्द हुई है और न ही अंतिम रिपोर्ट या आगे की कार्यवाही को समाप्त किया गया है।
मामला क्यों बना चर्चा का विषय?
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें व्यक्तिगत कानून, विवाह, बाल संरक्षण और आपराधिक कानून के बीच संबंध का सवाल सामने आया।
भारत जैसे विविध कानूनी और धार्मिक परंपराओं वाले देश में ऐसे मामलों में अदालतों के सामने कई जटिल प्रश्न आते हैं।
लेकिन POCSO Act के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा मानने की व्यवस्था स्पष्ट है।
कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष
केरल हाईकोर्ट के आदेश को सरल भाषा में समझें तो इसका अर्थ है कि यदि किसी लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम है, तो केवल शादी का दावा करके उसके साथ यौन संबंध के आरोप से POCSO कानून से बचा नहीं जा सकता।
भले ही आरोपी यह दावा करे कि विवाह धार्मिक रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था, POCSO के तहत आपराधिक जिम्मेदारी का सवाल बना रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट की मिसाल का असर
Independent Thought मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने नाबालिग पत्नी के संबंध में IPC के पुराने वैवाहिक अपवाद की सीमा स्पष्ट कर दी थी।
केरल हाईकोर्ट ने इसी कानूनी सिद्धांत को वर्तमान मामले में लागू किया।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि निचली अदालतों और हाईकोर्ट के सामने आने वाले ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक और कानूनी निष्कर्ष महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
POCSO और व्यक्तिगत कानून का संतुलन
अदालत ने इस मामले में व्यक्तिगत कानून को पूरी तरह समाप्त करने की बात नहीं कही।
उसने केवल यह स्पष्ट किया कि जहां POCSO Act की स्पष्ट सुरक्षा और व्यक्तिगत कानून के बीच टकराव हो, वहां बच्चे की सुरक्षा वाला विशेष कानून प्रभावी रहेगा।
यह अंतर कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है।
क्या यह फैसला सभी विवाहों पर लागू होगा?
फैसले का मूल सिद्धांत POCSO Act के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे पर लागू होता है।
अर्थात किसी विशेष धर्म या समुदाय के लिए अलग नियम नहीं बनाया गया।
अदालत ने कहा कि POCSO की सुरक्षा इस बात से प्रभावित नहीं होती कि विवाह किस व्यक्तिगत कानून के तहत हुआ है।
अदालत का आदेश 19 अगस्त का
केरल हाईकोर्ट ने यह आदेश 19 अगस्त 2026 को पारित किया था, जबकि इस फैसले की जानकारी 1 सितंबर को व्यापक रूप से सामने आई।
न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन ने आरोपी की याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया आरोपों को अपराधों से जोड़ती है और इस चरण पर कार्यवाही रद्द करने का कोई आधार नहीं है।
कानूनी विशेषज्ञों के लिए भी महत्वपूर्ण फैसला
इस फैसले का महत्व केवल एक मामले तक सीमित नहीं है।
यह POCSO Act, व्यक्तिगत कानून और विवाह से जुड़े मामलों में अदालतों के दृष्टिकोण को समझने के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहां आरोपी वैवाहिक संबंध का हवाला देकर POCSO से बचने की कोशिश करता है, यह आदेश महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ प्रदान करता है।
निष्कर्ष
केरल हाईकोर्ट ने 17 वर्षीय लड़की से कथित दुष्कर्म के आरोपी को यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया कि शादी का दावा उसे POCSO Act के तहत आपराधिक जिम्मेदारी से नहीं बचा सकता। आरोपी ने अदालत में कहा था कि लड़की उसकी पत्नी है और दोनों का विवाह मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। उसने इसी आधार पर अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति POCSO Act के तहत बच्चा है और विवाह की स्थिति इस कानूनी सुरक्षा को खत्म नहीं करती।
मामले में आरोपी ने दावा किया कि उसका विवाह लड़की से 23 जुलाई 2021 को हुआ था और उस समय उसकी उम्र 17 वर्ष और एक महीने थी। उसने कहा कि विवाह दोनों परिवारों की मौजूदगी में मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। उसने इस दावे के समर्थन में लड़की, उसके भाई और संबंधित काजी के पुलिस बयानों का हवाला भी दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह को साबित करने वाला कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया है। विवाह वास्तव में हुआ था या नहीं और उसकी वैधता क्या है, इसका फैसला ट्रायल के दौरान किया जा सकता है।
लेकिन अदालत ने साथ ही एक बेहद महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की। उसने कहा कि अगर बहस के लिए यह मान भी लिया जाए कि विवाह मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था, तब भी आरोपी POCSO Act के तहत आपराधिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। इसकी वजह यह है कि कथित विवाह और बाद में हुए यौन संबंधों के समय लड़की 17 वर्ष की थी। POCSO Act की धारा 2(1)(d) के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति बच्चा है। इसलिए नाबालिग के साथ यौन संबंध का आरोप POCSO के दायरे में आता है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 23 अक्टूबर 2021 को आरोपी लड़की को कार में अपने साथ ले गया और अपने घर ले जाने के बाद उसके साथ कथित तौर पर जबरन यौन संबंध बनाए। आरोप है कि यह सिलसिला 26 अक्टूबर तक चला और इस दौरान लड़की के साथ कई बार दुष्कर्म किया गया। मामले में दो अन्य लोगों पर कथित अपराध में मदद करने का आरोप है। लड़की के माता-पिता के खिलाफ भी अभियोजन ने यह आरोप लगाया है कि उन्हें कथित घटना की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने उसे वापस नहीं लिया और संबंधित अधिकारियों को जानकारी नहीं दी। इन सभी आरोपों का अंतिम फैसला ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर होगा।
आरोपी ने IPC की धारा 375 के Exception 2 का सहारा लेते हुए कहा था कि पति और पत्नी के बीच यौन संबंध को कुछ परिस्थितियों में रेप की परिभाषा से बाहर रखा गया था। लेकिन हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2017 के Independent Thought v. Union of India फैसले का हवाला देते हुए इस दलील को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध को वैवाहिक अपवाद का संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
केरल हाईकोर्ट ने POCSO Act की धारा 42A का भी उल्लेख किया। यह प्रावधान POCSO को अन्य कानूनों के साथ टकराव की स्थिति में प्रभावी बनाता है। इसी कानूनी आधार पर अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत कानून या धार्मिक रीति-रिवाज POCSO के तहत बच्चे को दी गई सुरक्षा को खत्म नहीं कर सकते।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी को दोषी घोषित कर दिया गया है। हाईकोर्ट ने केवल यह तय किया है कि इस स्तर पर उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का कोई आधार नहीं है। अब मामले की सुनवाई संबंधित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में आगे बढ़ेगी और वहां गवाहों, दस्तावेजों और अन्य सबूतों के आधार पर अंतिम फैसला किया जाएगा।
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अदालत ने विवाह और नाबालिग के साथ यौन अपराध को दो अलग-अलग कानूनी मुद्दों के रूप में देखा। यदि किसी व्यक्ति की उम्र 18 वर्ष से कम है तो वह POCSO के तहत बच्चा है। विवाह का दावा उसकी उम्र नहीं बदलता और न ही उस व्यक्ति को कानून द्वारा दी गई सुरक्षा समाप्त करता है।
यह फैसला बाल संरक्षण कानून के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। भारत में POCSO Act का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण और अपराधों से सुरक्षा देना है। कानून ने 18 वर्ष से कम उम्र के सभी व्यक्तियों के लिए एक स्पष्ट सुरक्षा सीमा निर्धारित की है। हाईकोर्ट ने इसी वैधानिक व्यवस्था को प्राथमिकता दी।
फैसले से यह संदेश भी साफ है कि किसी नाबालिग को पत्नी बताकर उसके साथ यौन संबंध के आरोप से POCSO की कार्यवाही से बचने की कोशिश सफल नहीं होगी। चाहे विवाह के लिए किसी व्यक्तिगत या धार्मिक कानून का हवाला दिया जाए, बच्चे की सुरक्षा से संबंधित विशेष कानून अपना प्रभाव बनाए रखेगा।
अब इस मामले में आगे ट्रायल की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। वहां यह देखा जाएगा कि अभियोजन द्वारा लगाए गए आरोप किस हद तक सबूतों से साबित होते हैं। हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि इस चरण पर उसने आरोपों की अंतिम सत्यता का फैसला नहीं किया है।
कुल मिलाकर, केरल हाईकोर्ट का यह फैसला इस कानूनी सिद्धांत को मजबूत करता है कि 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति की सुरक्षा POCSO Act के तहत सर्वोपरि है और केवल विवाह का दावा आरोपी को इस कानून से संरक्षण नहीं देता। आरोपी की याचिका खारिज होने के बाद अब उसके खिलाफ लंबित POCSO और अन्य आपराधिक कार्यवाही आगे जारी रहेगी।