
भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल ‘लगान’ ने अपनी रिलीज के 25 साल पूरे कर लिए हैं। साल 2001 में रिलीज हुई इस फिल्म ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की थी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का नाम रोशन किया था। अब जब फिल्म अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रही है, तब इससे जुड़ी कई दिलचस्प और अनसुनी कहानियां एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं। इन्हीं में से एक कहानी गायत्री मंत्र से जुड़ी है, जिसने फिल्म की पूरी टीम को छह महीने तक एक अलग तरह की ऊर्जा और अनुशासन से जोड़े रखा।
हाल ही में फिल्म की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में आमिर खान, निर्देशक आशुतोष गोवारिकर और फिल्म के कई कलाकार एक साथ नजर आए। इस दौरान आमिर खान ने फिल्म की शूटिंग से जुड़ी कई यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि ‘लगान’ की शूटिंग के दौरान एक ऐसी परंपरा बन गई थी, जिसने पूरी टीम के माहौल को बदल दिया था। यह परंपरा थी रोजाना गायत्री मंत्र सुनने की।
आमिर खान के अनुसार, फिल्म में अर्जन का किरदार निभाने वाले अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा हर सुबह शूटिंग लोकेशन पर जाते समय बस में गायत्री मंत्र बजाया करते थे। शुरुआत में कुछ लोग अंग्रेजी गाने सुनना चाहते थे, जबकि कुछ अन्य कलाकारों की भी अपनी पसंद थी। लेकिन धीरे-धीरे पूरी टीम गायत्री मंत्र सुनने की आदी हो गई और यह रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन गया।
बताया जाता है कि शूटिंग के दौरान पूरी यूनिट सुबह सूर्योदय से पहले बस में सफर करती थी। उस समय बाहर अंधेरा होता था और बस के भीतर गायत्री मंत्र की ध्वनि गूंजती रहती थी। इस माहौल ने कलाकारों और तकनीकी टीम के सदस्यों को एकाग्रता और मानसिक शांति प्रदान की। आमिर खान ने कहा कि छह महीने तक लगातार ऐसा करने से पूरी टीम एक विशेष मानसिक स्थिति में पहुंच जाती थी, जिससे काम के प्रति समर्पण और फोकस बढ़ता था।
दिलचस्प बात यह रही कि आमिर खान ने एक समय अखिलेंद्र मिश्रा से यह भी पूछा था कि आखिर गायत्री मंत्र का वास्तविक अर्थ क्या है और इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है। इसके बाद मंत्र के अर्थ और उसके आध्यात्मिक संदेश पर चर्चा हुई। बताया जाता है कि इस चर्चा ने कई कलाकारों को भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं को समझने का अवसर भी दिया। फिल्म की टीम के लिए यह केवल एक धार्मिक अभ्यास नहीं बल्कि सकारात्मक सोच और सामूहिक ऊर्जा का माध्यम बन गया था।
‘लगान’ की शूटिंग गुजरात के भुज और आसपास के क्षेत्रों में हुई थी। उस समय मौसम की कठिन परिस्थितियां, लंबा शूटिंग शेड्यूल और विशाल कलाकार दल अपने आप में बड़ी चुनौती थे। ऐसे माहौल में गायत्री मंत्र सुनने की यह परंपरा पूरी यूनिट को मानसिक रूप से संतुलित रखने में मददगार साबित हुई। कई कलाकारों ने बाद में भी स्वीकार किया कि उस अनुभव ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित किया था।
फिल्म के निर्माण की यात्रा भी किसी संघर्ष से कम नहीं थी। आमिर खान ने कई बार बताया है कि शुरुआत में उन्होंने ‘लगान’ की कहानी को लेकर संदेह जताया था। क्रिकेट, अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष और लगान जैसे विषयों पर आधारित फिल्म उस दौर में एक जोखिम भरा प्रयोग मानी जा रही थी। लेकिन निर्देशक आशुतोष गोवारिकर के विश्वास और कहानी की ताकत ने आखिरकार आमिर को फिल्म करने के लिए तैयार कर लिया। बाद में यही फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित फिल्मों में शामिल हो गई।
‘लगान’ ने न केवल दर्शकों का दिल जीता बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी में अकादमी पुरस्कार (ऑस्कर) के लिए नामांकित किया गया था। यह उपलब्धि हासिल करने वाली चुनिंदा भारतीय फिल्मों में से एक बनी। इसके अलावा फिल्म ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार अपने नाम किए।
25 साल बाद भी ‘लगान’ का जादू बरकरार है। फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग, री-रिलीज और कलाकारों के पुनर्मिलन कार्यक्रमों ने दर्शकों के बीच पुरानी यादें ताजा कर दी हैं। इस दौरान सामने आई गायत्री मंत्र वाली कहानी ने यह भी दिखाया कि किसी फिल्म की सफलता केवल कैमरे के सामने होने वाले अभिनय से नहीं बल्कि कैमरे के पीछे बनने वाले रिश्तों, अनुशासन और सकारात्मक माहौल से भी तय होती है।
आज जब ‘लगान’ भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है, तब उससे जुड़ी ये छोटी-छोटी यादें फिल्म की विरासत को और भी खास बना देती हैं। छह महीने तक बस में गूंजता गायत्री मंत्र, कलाकारों की सामूहिक ऊर्जा और एक सपने को सच करने का जुनून— यही वे तत्व थे जिन्होंने ‘लगान’ को केवल एक फिल्म नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा की एक अमर कहानी बना दिया।