नीले ड्रम हत्याकांड में फैसले की घड़ी: मेरठ जिला अदालत 30 सितंबर को सुनाएगी फैसला, क्या मुस्कान और साहिल को मिलेगी फांसी?

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30 सितंबर को अदालत में होगी निर्णायक सुनवाई

मेरठ के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में सामने आए सौरभ राजपूत हत्याकांड ने मार्च 2025 में देशभर में काफी चर्चा बटोरी थी। जांच के दौरान सौरभ का शव एक नीले प्लास्टिक ड्रम में सीमेंट के बीच छिपा हुआ मिलने की बात सामने आई थी। इसी वजह से यह मामला बाद में ‘नीला ड्रम हत्याकांड’ के नाम से चर्चित हो गया।

अब इस मामले में अदालत की कार्यवाही अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। अभियोजन और बचाव पक्ष की अंतिम बहस पूरी हो चुकी है और अदालत ने 30 सितंबर को फैसला सुनाने की तारीख तय की है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सुनवाई के दौरान करीब 126 पेशियां हुईं और 22 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए। फैसले के दिन दोनों आरोपियों को अदालत के सामने पेश किए जाने की बात भी सामने आई है।

पहले दोष तय होगा, फिर सजा पर सुनवाई

30 सितंबर को अदालत के सामने सबसे पहला सवाल यह होगा कि मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला के खिलाफ लगाए गए आरोप अभियोजन पक्ष द्वारा पर्याप्त रूप से साबित किए गए हैं या नहीं। अदालत गवाहों के बयान, परिस्थितिजन्य साक्ष्य, वैज्ञानिक और फॉरेंसिक सामग्री तथा बचाव पक्ष की दलीलों को ध्यान में रखकर निर्णय करेगी।

यदि अदालत दोनों को दोषी ठहराती है, तो इसके बाद सजा के मुद्दे पर सुनवाई होगी। अभियोजन पक्ष पहले ही दोनों के लिए मृत्युदंड की मांग कर चुका है। हालांकि, अंतिम सजा क्या होगी, यह अदालत के निर्णय और सजा के चरण में रखे जाने वाले तर्कों पर निर्भर करेगा। इसलिए फैसले से पहले यह कहना संभव नहीं है कि दोनों को फांसी की सजा ही मिलेगी।

मार्च 2025 में सामने आया था मामला

यह मामला मार्च 2025 में सामने आया था। पुलिस के अनुसार, मेरठ के ब्रह्मपुरी इलाके में सौरभ राजपूत की हत्या के बाद शव को ठिकाने लगाने के लिए नीले रंग के ड्रम का इस्तेमाल किया गया था। जांच आगे बढ़ने पर सौरभ की पत्नी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला के नाम सामने आए। दोनों को गिरफ्तार किया गया और बाद में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

मामला अदालत में पहुंचने के बाद जुलाई 2025 में जिला जज की अदालत में ट्रायल की कार्यवाही आगे बढ़ी। लगभग 13 महीने चली न्यायिक प्रक्रिया में अभियोजन पक्ष ने कई गवाहों को पेश किया और घटनाक्रम से जुड़े अलग-अलग पहलुओं को अदालत के सामने रखा।

अभियोजन ने किन साक्ष्यों पर रखा भरोसा?

अभियोजन पक्ष ने मामले को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अदालत के सामने रखा। अभियोजन के अनुसार, वारदात से पहले और उसके बाद की गतिविधियों से जुड़े कई तथ्य जांच में सामने आए। इनमें चाकू, उस्तरा, सीमेंट, बालू और बड़े नीले ड्रम की खरीद से जुड़े साक्ष्य भी शामिल बताए गए हैं।

अदालत में इन वस्तुओं की खरीद से जुड़े दुकानदारों और अन्य लोगों की गवाही कराई गई। अभियोजन पक्ष ने इन घटनाओं को जोड़कर अदालत के सामने अपनी पूरी कहानी प्रस्तुत की। सौरभ के परिवार की ओर से मुकदमे की पैरवी कर रहे अधिवक्ता के अनुसार, वादी पक्ष की ओर से कुल 22 गवाह पेश किए गए। इनमें सौरभ का भाई, उसकी मां, दोस्त और कुछ दुकानदार शामिल थे।

ड्रम और सीमेंट से जुड़े साक्ष्य भी अदालत में आए

मामले की जांच में नीला ड्रम सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्यों में से एक रहा। अदालत में ड्रम को खोलने और उसमें मौजूद सामग्री से जुड़े लोगों की गवाही भी दर्ज की गई।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, ड्रम के अंदर सीमेंट जमा हुआ था और उसमें शव के अवशेष पाए जाने की बात जांच में सामने आई। ड्रम को काटकर खोलने वाले व्यक्ति ने भी अदालत में अपनी गवाही दी। इसके अलावा घटनास्थल से बरामद सामान और फॉरेंसिक प्रक्रिया से संबंधित अधिकारियों के बयान भी रिकॉर्ड किए गए।

अभियोजन पक्ष ने इन साक्ष्यों के माध्यम से यह बताने की कोशिश की कि हत्या के बाद शव को छिपाने के लिए पहले से आवश्यक सामान जुटाया गया था। हालांकि, इन सभी साक्ष्यों की अंतिम कानूनी व्याख्या अदालत ही करेगी।

पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक साक्ष्य

मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट से जुड़े चिकित्सकीय साक्ष्य भी अदालत के सामने रखे गए। अभियोजन की ओर से पेश जानकारी के मुताबिक, शव पर धारदार हथियार से चोटों के निशान पाए गए थे।

फॉरेंसिक जांच और घटनास्थल से मिले साक्ष्यों को भी मामले की कड़ी के रूप में अदालत के सामने रखा गया। अभियोजन पक्ष का कहना रहा कि वैज्ञानिक साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को एक साथ देखने पर घटनाक्रम की तस्वीर सामने आती है।

हालांकि, किसी भी आपराधिक मामले में साक्ष्यों की अंतिम स्वीकार्यता और उनका महत्व अदालत निर्धारित करती है। केवल किसी जांच एजेंसी या अभियोजन की ओर से किया गया दावा अपने आप में दोष सिद्धि नहीं माना जाता।

परिवार के सदस्यों की भी हुई गवाही

सौरभ राजपूत के परिवार से जुड़े लोगों को भी अदालत में गवाही के लिए बुलाया गया। रिपोर्टों के अनुसार, सौरभ के भाई बबलू राजपूत ने अदालत में अपने बयान दर्ज कराए। परिवार की ओर से मामले में सौरभ के संपर्क टूटने और बाद में घटना की जानकारी मिलने से जुड़े तथ्य अदालत के सामने रखे गए।

इसके अलावा सौरभ की मां और उसके दोस्त समेत अन्य लोगों की गवाही भी हुई। अभियोजन पक्ष ने इन बयानों के जरिए घटनाक्रम की परिस्थितियों को अदालत के सामने रखने की कोशिश की।

यात्रा और लोकेशन से जुड़े साक्ष्य

मामले की जांच केवल घटनास्थल तक सीमित नहीं रही। अभियोजन पक्ष ने आरोपियों की गतिविधियों से जुड़े कुछ यात्रा और डिजिटल साक्ष्य भी अदालत के सामने पेश किए।

रिपोर्टों के अनुसार, एक कैब चालक ने मुस्कान और साहिल की यात्रा से जुड़ी जानकारी दी। इसके अलावा मोबाइल कॉल डिटेल और लोकेशन से संबंधित रिकॉर्ड भी अदालत में पेश किए गए। होटल से जुड़े एक गवाह ने भी आरोपियों के ठहरने से संबंधित जानकारी दी।

अभियोजन ने इन जानकारियों को घटनाक्रम के क्रम से जोड़ने की कोशिश की। दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने अभियोजन की कहानी और साक्ष्यों पर सवाल उठाए।

बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?

मामले में बचाव पक्ष ने अभियोजन की कहानी को चुनौती दी है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, बचाव पक्ष ने चश्मदीद गवाह नहीं होने समेत कई बिंदुओं पर सवाल उठाए। एक रिपोर्ट के अनुसार, बचाव पक्ष की ओर से संपत्ति विवाद से संबंधित दलील भी अदालत में रखी गई थी।

यानी अदालत के सामने केवल अभियोजन का पक्ष ही नहीं था, बल्कि बचाव पक्ष ने भी अपने तर्कों के जरिए आरोपों पर सवाल उठाए। अब अदालत दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की कानूनी समीक्षा के बाद फैसला सुनाएगी।

126 पेशियां और 22 से ज्यादा गवाह

इस मामले की सुनवाई लंबे समय तक चली। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत में करीब 126 तारीखें पड़ीं और 22 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए। अंतिम बहस सितंबर के मध्य में पूरी हुई, जिसके बाद अदालत ने फैसला सुनाने के लिए 30 सितंबर की तारीख तय की।

अभियोजन पक्ष ने अंतिम बहस के दौरान मामले में मौजूद परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को प्रमुख आधार बनाया और दोनों आरोपियों के लिए कड़ी सजा की मांग की। बचाव पक्ष ने अपने तर्कों के जरिए अभियोजन की कहानी और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।

क्या दोनों को फांसी मिलेगी?

यही सवाल इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है। अभियोजन पक्ष ने दोनों आरोपियों के लिए मृत्युदंड की मांग की है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत पहले से तय रूप से फांसी की सजा सुनाएगी।

सबसे पहले अदालत को यह निर्धारित करना होगा कि दोनों के खिलाफ लगाए गए आरोप पर्याप्त साक्ष्यों से साबित होते हैं या नहीं। दोष सिद्ध होने की स्थिति में भी सजा का फैसला अलग चरण में होगा। अदालत मामले की परिस्थितियों, अपराध की कानूनी प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करेगी।

इसलिए 30 सितंबर को आने वाले फैसले में पहले दोषसिद्धि या बरी किए जाने का निर्णय महत्वपूर्ण होगा। यदि दोषसिद्धि होती है, तो उसके बाद सजा की प्रकृति तय की जाएगी। अंतिम निर्णय अदालत का होगा।

फैसले पर टिकी सभी की नजरें

नीले ड्रम हत्याकांड की सुनवाई पूरी होने के बाद अब सौरभ राजपूत के परिवार, आरोपियों के परिजनों और मामले से जुड़े पक्षों की नजरें 30 सितंबर की अदालत की कार्यवाही पर हैं।

यह मामला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि जांच में शव को कथित तौर पर सीमेंट से भरे नीले ड्रम में छिपाए जाने की बात सामने आई थी। इसके बाद लंबे समय तक पुलिस जांच, फॉरेंसिक साक्ष्य, गवाहों के बयान और अदालत में हुई सुनवाई के अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा होती रही।

अब करीब 13 महीने की न्यायिक प्रक्रिया, 126 पेशियों और 22 से अधिक गवाहों की गवाही के बाद अदालत अपना फैसला सुनाने जा रही है। 30 सितंबर का निर्णय यह स्पष्ट करेगा कि अदालत अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों को किस तरह देखती है और मुस्कान रस्तोगी तथा साहिल शुक्ला के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर उसका क्या निष्कर्ष है।

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