चीता लैंडस्केप में 10 तेंदुओं के शिकार का खुलासा, मुरैना से एक और आरोपी गिरफ्तार; STSF की कार्रवाई में अब तक 15 पकड़े गए

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मध्य प्रदेश में तेंदुओं के शिकार और उनकी खाल व दूसरे अंगों की कथित तस्करी से जुड़े एक बड़े नेटवर्क के खिलाफ राज्य की स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स यानी STSF ने कार्रवाई तेज कर दी है। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस नेटवर्क के जरिए मध्य प्रदेश के अलग-अलग वन क्षेत्रों में तेंदुओं का शिकार किया गया और बाद में उनकी खाल तथा शरीर के दूसरे हिस्सों को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने की कोशिश की गई।

मुरैना से एक और कथित तस्कर की गिरफ्तारी के बाद इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है। जांच एजेंसियों का कहना है कि यह मामला केवल मुरैना या किसी एक जंगल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार मध्य प्रदेश से निकलकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान तक जुड़े होने की आशंका है।

इस कार्रवाई का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जांच में कूनो वाइल्डलाइफ डिवीजन, श्योपुर और मुरैना के चंबल क्षेत्र में तेंदुओं के शिकार की जानकारी सामने आई है। एजेंसियों के अनुसार, अब तक 10 तेंदुओं की खाल बरामद की जा चुकी हैं। इन जानवरों को कथित तौर पर बेहद क्रूर तरीके से मारा गया और उनके शरीर के कीमती माने जाने वाले हिस्से अलग करके तस्करी के लिए भेजे गए।

वन्यजीव अपराध से जुड़े इस मामले में मध्य प्रदेश STSF के साथ उत्तर प्रदेश वन विभाग और वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो यानी WCCB भी जांच में शामिल रहे हैं। शुरुआती कार्रवाई के दौरान आगरा क्षेत्र में हुई गिरफ्तारी से इस नेटवर्क का पता चला और पूछताछ आगे बढ़ने के साथ शिकारियों, तस्करों और संभावित खरीदारों की पूरी श्रृंखला सामने आने लगी।

मुरैना से एक और आरोपी गिरफ्तार

ताजा कार्रवाई में मुरैना से एक और कथित वन्यजीव तस्कर को गिरफ्तार किया गया है। इस गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियों की कार्रवाई में पकड़े गए लोगों की संख्या 15 तक पहुंच गई है।

मुरैना और उसके आसपास का इलाका चंबल के जंगलों और संरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों के कारण वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां तेंदुए, घड़ियाल और कई अन्य वन्यजीव पाए जाते हैं।

इसी वजह से वन्यजीव अपराधियों के लिए यह क्षेत्र संवेदनशील माना जाता है। चंबल क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां और जंगलों की दुर्गमता अवैध शिकार करने वालों के लिए छिपने या गतिविधियां संचालित करने का अवसर दे सकती हैं।

हालांकि पुलिस और वन विभाग की निगरानी लगातार बढ़ाई जा रही है।

10 तेंदुओं के शिकार का दावा

जांच एजेंसियों के मुताबिक, अब तक की पूछताछ में 10 तेंदुओं के शिकार से जुड़ी जानकारी सामने आई है।

इनमें से छह तेंदुओं का शिकार कूनो वाइल्डलाइफ डिवीजन में किए जाने का दावा किया गया है।

इसके अलावा श्योपुर इलाके में दो और मुरैना के चंबल अभयारण्य क्षेत्र में दो तेंदुओं के शिकार की जानकारी सामने आने की बात कही गई है।

इसका मतलब है कि एक ही कथित नेटवर्क ने अलग-अलग जंगलों को निशाना बनाया।

अगर जांच में ये आरोप पूरी तरह प्रमाणित होते हैं तो यह मध्य प्रदेश में वन्यजीव अपराध के संगठित स्वरूप की गंभीर तस्वीर सामने आएगी।

शिकार का तरीका भी सामने आया

पूछताछ में कथित तौर पर तेंदुओं के शिकार का तरीका भी सामने आया है।

जांच एजेंसियों के अनुसार, तेंदुओं को पकड़ने के लिए नायलॉन के जाल का इस्तेमाल किया जाता था।

जानवर जाल में फंसने के बाद भाग नहीं पाते थे और इसके बाद कथित तौर पर उन्हें डंडों से पीटकर मार दिया जाता था।

यह तरीका बेहद क्रूर है और इससे वन्यजीवों को लंबे समय तक पीड़ा झेलनी पड़ सकती है।

तेंदुए की मौत के बाद उसके शरीर से उन हिस्सों को अलग किया जाता था जिनकी अवैध वन्यजीव बाजार में मांग होती है।

खाल के अलावा किन अंगों पर नजर थी?

जांच में सामने आया कि तेंदुए की खाल के अलावा उसके सिर, हड्डियां, दांत, नाखून और मूंछ जैसे हिस्सों को भी अलग किया जाता था।

वन्यजीव तस्करी में ऐसे अंगों की अवैध मांग कई बार पारंपरिक मान्यताओं, सजावटी वस्तुओं और कथित औषधीय उपयोग से जुड़ी होती है।

हालांकि ऐसी मांग का बड़ा हिस्सा अवैध बाजार और अंधविश्वास से जुड़ा होता है।

वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत संरक्षित प्रजातियों के अंगों का कारोबार गंभीर अपराध है।

शव के बाकी हिस्से का क्या होता था?

पुलिस और वन विभाग की जांच के अनुसार, तेंदुए के शरीर से उपयोगी माने जाने वाले हिस्से निकालने के बाद बाकी शव को जंगल में ही दफना दिया जाता था।

इससे अपराधियों को उम्मीद रहती होगी कि शिकार का कोई स्पष्ट सबूत नहीं मिलेगा।

लेकिन वन्यजीव अधिकारियों के लिए जंगल में मिलने वाले शव, खाल और दूसरे अवशेष महत्वपूर्ण सुराग बन सकते हैं।

एक तेंदुए की मौत का पता चलने के बाद आसपास के क्षेत्र की निगरानी बढ़ाकर अन्य संभावित शिकार की घटनाओं की जांच की जा सकती है।

आगरा से खुला तस्करी नेटवर्क

इस पूरे मामले की अहम कड़ी 23 जुलाई की कार्रवाई से सामने आई।

आगरा-ग्वालियर हाईवे पर सैंया क्षेत्र के राजपूताना होटल में वन विभाग, पुलिस और वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी टीम ने कार्रवाई की थी।

इस दौरान चार संदिग्ध तस्करों को गिरफ्तार किया गया।

उनसे पूछताछ के बाद तेंदुओं की खाल और अन्य वन्यजीव अवशेषों की बरामदगी हुई।

यहीं से जांच एजेंसियों को शक हुआ कि मामला केवल स्थानीय शिकारियों तक सीमित नहीं है।

पूछताछ में मध्य प्रदेश के जंगलों से लेकर दूसरे राज्यों तक फैले संभावित नेटवर्क की जानकारी सामने आने लगी।

एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचती थी खाल

वन्यजीव तस्करी का नेटवर्क अक्सर कई स्तरों पर काम करता है।

एक व्यक्ति जंगल में शिकार कर सकता है।

दूसरा व्यक्ति खाल या अंगों को इकट्ठा कर सकता है।

तीसरा व्यक्ति उन्हें राज्य की सीमा पार पहुंचा सकता है।

इसके बाद कोई खरीदार या अंतिम सप्लायर उस सामग्री को आगे किसी अवैध बाजार तक पहुंचा सकता है।

जांच एजेंसियां अब इसी पूरी चेन को जोड़ने की कोशिश कर रही हैं।

मध्य प्रदेश से बाहर तक जुड़े तार

जांच में कथित तौर पर इस नेटवर्क के तार मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है।

इसका मतलब यह हो सकता है कि शिकार स्थानीय स्तर पर किया जाता था लेकिन वन्यजीव उत्पादों की सप्लाई अंतरराज्यीय नेटवर्क के जरिए होती थी।

ऐसे नेटवर्क को पकड़ना आसान नहीं होता क्योंकि इसमें शामिल लोग अलग-अलग राज्यों में रहते और अलग-अलग भूमिकाएं निभा सकते हैं।

इसी वजह से कई राज्यों की एजेंसियों के बीच समन्वय जरूरी हो जाता है।

दिल्ली के NGO का नाम क्यों आया?

जांच के दौरान दिल्ली स्थित एक वन्यजीव संरक्षण NGO का नाम भी सामने आया है।

आगरा से गिरफ्तार दो आरोपियों के इस संगठन से कथित संबंध होने की बात जांच में सामने आई।

इन आरोपों के बाद STSF ने संगठन के CEO को जांच अधिकारी के सामने पेश होने के लिए नोटिस जारी किया था।

यह बेहद संवेदनशील पहलू है क्योंकि वन्यजीव संरक्षण के लिए काम करने वाले किसी संगठन से जुड़े व्यक्ति का कथित तौर पर वन्यजीव तस्करी के नेटवर्क में शामिल होना गंभीर सवाल खड़े करता है।

हालांकि केवल किसी NGO से जुड़ाव किसी व्यक्ति को अपराधी साबित नहीं करता।

इस मामले में एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि गिरफ्तार आरोपियों का संगठन से किस प्रकार का संबंध था और क्या उस संबंध का कथित तस्करी गतिविधियों से कोई वास्तविक संबंध था।

NGO की भूमिका की भी जांच

STSF इस पहलू की जांच कर रही है कि संगठन से जुड़े लोगों ने वास्तव में क्या भूमिका निभाई।

क्या उनका संबंध केवल सामाजिक या व्यावसायिक स्तर का था?

क्या उन्हें किसी अवैध गतिविधि की जानकारी थी?

क्या संगठन के संसाधनों का गलत इस्तेमाल हुआ?

या फिर आरोप केवल व्यक्तिगत स्तर पर किसी आरोपी तक सीमित हैं?

इन सभी सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद सामने आएंगे।

वन्यजीव संरक्षण एजेंसियों का संयुक्त अभियान

इस मामले में कई एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

मध्य प्रदेश की STSF वन्यजीव अपराध और शिकार से जुड़े मामलों पर कार्रवाई करती है।

WCCB देशभर में वन्यजीव अपराध से संबंधित मामलों में विभिन्न राज्यों की एजेंसियों के साथ समन्वय करता है।

उत्तर प्रदेश वन विभाग भी आगरा में हुई शुरुआती कार्रवाई में शामिल था।

इन एजेंसियों के बीच जानकारी साझा होने से ही कथित अंतरराज्यीय नेटवर्क की कड़ियां सामने आईं।

STSF की भूमिका

स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स का मुख्य उद्देश्य बाघ और अन्य संरक्षित वन्यजीवों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कार्रवाई करना है।

हालांकि इसका नाम टाइगर स्ट्राइक फोर्स है, लेकिन वन्यजीव अपराध के दूसरे गंभीर मामलों में भी ऐसी विशेष एजेंसियां कार्रवाई करती हैं।

तेंदुए भी भारतीय वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत संरक्षित वन्यजीव हैं।

उनका शिकार, खाल या अंगों की खरीद-बिक्री और अवैध व्यापार कानूनन गंभीर अपराध है।

तेंदुए क्यों निशाने पर आते हैं?

तेंदुआ भारतीय जंगलों में पाए जाने वाले प्रमुख शिकारी जानवरों में से एक है।

उसकी खाल, दांत, नाखून और दूसरे अंगों की अवैध मांग ने कई वर्षों से इस प्रजाति को वन्यजीव अपराधियों के निशाने पर रखा है।

अवैध बाजार में इन अंगों के लिए ऊंची कीमत मिलने की उम्मीद शिकारियों को आकर्षित कर सकती है।

कई बार अंधविश्वास और झूठे दावों के कारण भी वन्यजीव अंगों की मांग पैदा होती है।

अवैध बाजार की मांग से बढ़ता शिकार

वन्यजीव अपराध की जड़ में केवल शिकारी नहीं होते।

जब तक किसी वन्यजीव के अंग खरीदने वाला बाजार मौजूद रहेगा, तब तक शिकार के लिए आर्थिक प्रोत्साहन बना रह सकता है।

इसीलिए जांच एजेंसियां केवल शिकारियों तक सीमित नहीं रहना चाहतीं।

वे यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि खाल और अंगों को खरीदने वाले लोग कौन हैं।

खरीदारों तक पहुंचने की कोशिश

STSF की जांच का अगला महत्वपूर्ण चरण कथित खरीदारों तक पहुंचना है।

अगर एजेंसियां अंतिम खरीदार या सप्लायर तक पहुंचती हैं तो पूरे नेटवर्क का वास्तविक आकार सामने आ सकता है।

इससे यह भी पता चल सकता है कि तेंदुओं की खाल किन शहरों या बाजारों में भेजी जाती थी।

साथ ही यह जानकारी दूसरे मामलों में भी उपयोगी हो सकती है।

15 गिरफ्तारियों का महत्व

इस मामले में अब तक 15 आरोपियों की गिरफ्तारी जांच के बढ़ते दायरे को दिखाती है।

शुरुआत में मामला कुछ स्थानीय तस्करों तक सीमित दिखाई दे रहा था।

लेकिन पूछताछ के बाद आरोपियों की संख्या बढ़ती गई और नेटवर्क के अलग-अलग हिस्सों का पता चलता गया।

हर गिरफ्तारी के बाद एजेंसियों को नए संपर्कों और संभावित स्थानों की जानकारी मिल सकती है।

क्या यह सिर्फ तेंदुओं तक सीमित है?

जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना भी महत्वपूर्ण है कि कथित नेटवर्क केवल तेंदुओं की तस्करी करता था या दूसरे संरक्षित वन्यजीव भी उसके निशाने पर थे।

भारत में कई दुर्लभ और संरक्षित प्रजातियां अवैध वन्यजीव व्यापार का शिकार बनती हैं।

यदि किसी नेटवर्क के पास पहले से तस्करी की व्यवस्था हो तो वह अलग-अलग वन्यजीव उत्पादों के कारोबार में भी शामिल हो सकता है।

फिलहाल इस मामले की जांच मुख्य रूप से तेंदुओं के कथित शिकार और उनकी खाल की तस्करी पर केंद्रित है।

कूनो क्षेत्र की चिंता

कूनो वाइल्डलाइफ डिवीजन का नाम इस मामले में विशेष रूप से सामने आया है।

कूनो राष्ट्रीय उद्यान भारत के वन्यजीव संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है और हाल के वर्षों में यह विशेष रूप से चीता संरक्षण कार्यक्रम के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा है।

ऐसे क्षेत्र में तेंदुओं का कथित अवैध शिकार संरक्षण व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जिन तेंदुओं के शिकार की बात जांच में सामने आई है, वे चीते नहीं थे।

चीता लैंडस्केप में तेंदुओं का महत्व

कूनो में चीतों के पुनर्वास और संरक्षण के बीच तेंदुए भी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

वे जंगल में शिकार प्रजातियों की संख्या और व्यवहार को संतुलित रखने में भूमिका निभाते हैं।

किसी क्षेत्र से बड़े शिकारी जीवों की संख्या कम होने पर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है।

इसलिए तेंदुओं का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने तक सीमित नहीं है।

चंबल क्षेत्र में भी शिकार

जांच में मुरैना के चंबल अभयारण्य क्षेत्र में दो तेंदुओं के शिकार की जानकारी सामने आने का दावा किया गया है।

चंबल का क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना और जैव विविधता के लिए जाना जाता है।

यहां नदी, बीहड़ और वन क्षेत्र कई प्रजातियों को प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं।

इस तरह के संवेदनशील क्षेत्र में अवैध शिकार जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।

श्योपुर में भी दो तेंदुओं का शिकार

श्योपुर जिले का नाम भी जांच में सामने आया है।

एजेंसियों के अनुसार यहां दो तेंदुओं के शिकार की जानकारी मिली है।

अगर ये घटनाएं एक ही नेटवर्क से जुड़ी साबित होती हैं तो यह संकेत होगा कि कथित शिकारी एक निश्चित क्षेत्र तक सीमित नहीं थे।

वे अलग-अलग जंगलों में जाकर शिकार करते थे।

जंगल में गड्ढा खोदकर शव दबाने का दावा

तस्करी के लिए खाल और अंग निकालने के बाद जानवर के शव को जंगल में दफनाने की बात भी जांच में सामने आई है।

इसका उद्देश्य संभवतः अवशेषों को छिपाना रहा होगा।

लेकिन वन विभाग के लिए जंगल में ऐसे अवशेष महत्वपूर्ण संकेत हो सकते हैं।

यदि किसी क्षेत्र में बार-बार जंगली जानवरों के अवशेष मिलते हैं तो वहां शिकार की गतिविधि की संभावना बढ़ जाती है।

नायलॉन के जाल का इस्तेमाल

जांच एजेंसियों के अनुसार, कथित शिकारी तेंदुओं को पकड़ने के लिए नायलॉन के जाल का इस्तेमाल करते थे।

ऐसे जाल जंगल में छिपाकर लगाए जा सकते हैं और उनमें फंसने के बाद जानवर खुद को मुक्त नहीं कर पाते।

वन विभाग के लिए इस तरह के जाल भी महत्वपूर्ण सबूत हो सकते हैं।

इनका मिलना संभावित शिकार गतिविधि का संकेत दे सकता है।

शिकारियों की तलाश अभी जारी

15 गिरफ्तारियों के बावजूद जांच पूरी नहीं हुई है।

एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि जंगल में वास्तविक शिकार कौन करता था।

कौन उन्हें जाल और अन्य सामान उपलब्ध कराता था?

कौन खाल इकट्ठा करता था?

कौन उन्हें दूसरे राज्यों तक पहुंचाता था?

और अंतिम खरीदार कौन थे?

इन सवालों के जवाब से नेटवर्क का पूरा ढांचा सामने आ सकता है।

तस्करी में बिचौलियों की भूमिका

अंतरराज्यीय वन्यजीव तस्करी में बिचौलियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

शिकारी आमतौर पर अंतिम खरीदार को नहीं जानते होंगे।

बीच में कई लोग संपर्क, परिवहन और भुगतान की व्यवस्था कर सकते हैं।

इस वजह से जांच एजेंसियों को वित्तीय लेनदेन और संपर्कों की भी जांच करनी पड़ सकती है।

डिजिटल साक्ष्य भी अहम

मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल संदेश ऐसे नेटवर्क की जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

किस व्यक्ति का संपर्क किससे था?

किस स्थान पर कौन मौजूद था?

घटना के बाद किससे संपर्क किया गया?

इन सवालों के जवाब डिजिटल रिकॉर्ड से मिल सकते हैं।

इसी तरह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल वन्यजीव उत्पादों की अवैध खरीद-बिक्री के लिए हुआ या नहीं, इसकी भी जांच की जा सकती है।

अंतरराज्यीय नेटवर्क पर शिकंजा

अगर तेंदुए की खाल मध्य प्रदेश से दूसरे राज्यों तक भेजी जा रही थी तो केवल स्थानीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी।

इसके लिए राज्यों की पुलिस और वन विभागों के बीच सूचना साझा करना जरूरी है।

आगरा में हुई कार्रवाई के बाद यही समन्वय इस मामले को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण रहा।

अब दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान से जुड़े संभावित संपर्कों की भी जांच की जा सकती है।

वन्यजीव अपराध में सख्त कानून

भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित वन्यजीवों का शिकार और उनके अंगों का अवैध व्यापार गंभीर अपराध है।

दोष सिद्ध होने पर आरोपी को जेल और आर्थिक दंड दोनों का सामना करना पड़ सकता है।

मामले की गंभीरता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि कौन सी धाराएं लगाई गई हैं और आरोपियों के खिलाफ कितने प्रमाण जुटाए गए हैं।

बरामद खालें सबसे अहम सबूत

10 तेंदुओं की खाल की बरामदगी जांच के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य है।

फॉरेंसिक जांच के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा सकती है कि खाल वास्तव में तेंदुए की है और कुछ मामलों में उनकी उत्पत्ति से जुड़े संकेत भी मिल सकते हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञ खाल के पैटर्न और अन्य जैविक संकेतों की जांच कर सकते हैं।

जानवरों की पहचान और वैज्ञानिक जांच

वन्यजीव अपराध की वैज्ञानिक जांच में डीएनए तकनीक भी उपयोगी हो सकती है।

यदि किसी बरामद खाल या अवशेष से पर्याप्त जैविक सामग्री उपलब्ध हो तो विशेषज्ञ उसके बारे में जानकारी जुटा सकते हैं।

इस तरह के वैज्ञानिक साक्ष्य अदालत में मामले को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।

NGO कनेक्शन की जांच क्यों जरूरी?

वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संगठनों के पास अक्सर वन क्षेत्रों, जानवरों और स्थानीय नेटवर्क के बारे में जानकारी होती है।

अगर किसी ऐसे संगठन से जुड़े व्यक्ति पर तस्करी का आरोप सामने आता है तो एजेंसियों को यह जांचना जरूरी हो जाता है कि संगठन की जानकारी या संसाधनों का कहीं दुरुपयोग तो नहीं हुआ।

लेकिन इस मामले में अभी जांच जारी है और NGO के खिलाफ किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

वन्यजीव संरक्षण संगठनों पर सवाल

यदि किसी NGO से जुड़े व्यक्ति की अपराध में भूमिका प्रमाणित होती है तो इससे पूरे क्षेत्र में भरोसे को नुकसान पहुंच सकता है।

लेकिन किसी एक आरोपी की कथित भूमिका के आधार पर पूरे संगठन या उसके सभी कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं होगा।

जांच को व्यक्ति और संस्था की भूमिका अलग-अलग स्पष्ट करनी होगी।

वन विभाग की निगरानी बढ़ेगी

इस मामले के बाद मध्य प्रदेश के संवेदनशील वन क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने की जरूरत और स्पष्ट हो गई है।

कैमरा ट्रैप, गश्त, स्थानीय मुखबिर नेटवर्क और तकनीकी निगरानी वन्यजीव अपराध रोकने में मदद कर सकते हैं।

जंगल के भीतर जाल और अन्य शिकार उपकरणों की नियमित तलाश भी जरूरी है।

स्थानीय समुदाय की भूमिका

वन्यजीव अपराध रोकने में स्थानीय लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

जंगल के आसपास रहने वाले लोग अक्सर संदिग्ध गतिविधियों को सबसे पहले देख सकते हैं।

यदि वे किसी संदिग्ध व्यक्ति, वाहन या जाल की सूचना वन विभाग को दें तो समय रहते कार्रवाई संभव हो सकती है।

इसके लिए स्थानीय लोगों में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है।

तेंदुए का संरक्षण क्यों जरूरी?

तेंदुआ भारत के कई जंगलों में खाद्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यह छोटे और मध्यम आकार के शिकार जानवरों की आबादी को नियंत्रित करता है।

तेंदुए की संख्या में गिरावट से जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन प्रभावित हो सकता है।

इसलिए तेंदुओं की सुरक्षा का मतलब केवल एक वन्यजीव को बचाना नहीं, बल्कि पूरे जंगल की जैव विविधता को सुरक्षित रखना है।

अवैध शिकार से जैव विविधता को खतरा

एक तेंदुए की मौत का असर उसके क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता।

अगर किसी जंगल में लगातार शिकार होता रहे तो धीरे-धीरे वहां शिकारी प्रजातियों की संख्या कम हो सकती है।

इससे शिकार प्रजातियों की संख्या में असंतुलन पैदा हो सकता है।

लंबे समय में यह पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित कर सकता है।

जंगलों में सुरक्षा के नए तरीके

वन विभाग अब पारंपरिक गश्त के साथ तकनीक का भी इस्तेमाल कर रहा है।

कैमरा ट्रैप, ड्रोन, जीपीएस आधारित पेट्रोलिंग और डिजिटल रिकॉर्डिंग जैसे साधनों से जंगलों की निगरानी की जा सकती है।

इन तकनीकों के इस्तेमाल से संदिग्ध गतिविधियों का पता जल्दी लगाया जा सकता है।

तस्करी रोकने के लिए सीमा पर निगरानी

क्योंकि इस मामले में अंतरराज्यीय तस्करी की आशंका है, इसलिए राज्यों की सीमाओं पर भी निगरानी जरूरी होगी।

वाहनों की जांच, संदिग्ध पार्सल और वन्यजीव उत्पादों की पहचान के लिए प्रशिक्षित अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

अगर किसी वाहन में वन्यजीवों के अंग मिलते हैं तो उसके स्रोत तक पहुंचना भी जरूरी है।

आगे की जांच में क्या हो सकता है?

STSF अब गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के आधार पर अन्य संदिग्धों की तलाश कर सकती है।

जांच एजेंसियां संभावित खरीदारों और अंतिम सप्लायर तक पहुंचने की कोशिश करेंगी।

साथ ही बरामद खाल और अन्य अवशेषों की वैज्ञानिक जांच भी मामले को आगे बढ़ा सकती है।

यदि नेटवर्क दूसरे राज्यों में सक्रिय पाया जाता है तो वहां भी गिरफ्तारी हो सकती है।

15 गिरफ्तारियां अंत नहीं

इस मामले में 15 गिरफ्तारियां बड़ी कार्रवाई जरूर हैं, लेकिन जांच के लिए यह अंतिम चरण नहीं है।

अक्सर संगठित तस्करी नेटवर्क में गिरफ्तारियों के बाद ही असली मास्टरमाइंड या अंतिम खरीदार तक पहुंचने का रास्ता खुलता है।

इसलिए आने वाले दिनों में और नाम सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

सबसे बड़ी चुनौती—अवैध बाजार

जब तक वन्यजीव उत्पादों की अवैध मांग बनी रहेगी, शिकारियों के लिए आर्थिक प्रोत्साहन मौजूद रहेगा।

इसलिए केवल जंगल में गश्त बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा।

अवैध खरीदारों और तस्करी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

लोगों को जागरूक करने की जरूरत

वन्यजीवों के अंगों से जुड़े अंधविश्वास और झूठे दावों के खिलाफ जागरूकता फैलाना भी जरूरी है।

तेंदुए के दांत, नाखून या दूसरे अंग किसी बीमारी का इलाज नहीं हैं और इनके कथित चमत्कारी उपयोग का कोई वैध वैज्ञानिक आधार नहीं है।

ऐसी मांग ही अवैध शिकार को बढ़ावा देती है।

जंगल की सुरक्षा सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं

वन्यजीव संरक्षण सरकार और वन विभाग की जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन समाज की भी इसमें भूमिका है।

अगर कोई व्यक्ति वन्यजीव अंग खरीदता है तो वह भी इस अवैध कारोबार को बढ़ावा देता है।

इसलिए संरक्षण के लिए मांग को खत्म करना भी जरूरी है।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश में तेंदुओं के कथित शिकार और उनकी खाल की तस्करी से जुड़े मामले ने राज्य के वन्यजीव संरक्षण तंत्र के सामने गंभीर चुनौती रख दी है। मुरैना से एक और आरोपी की गिरफ्तारी के बाद इस मामले में गिरफ्तार लोगों की संख्या 15 हो गई है। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह नेटवर्क मध्य प्रदेश के जंगलों में तेंदुओं के शिकार से लेकर उनकी खाल और दूसरे अंगों की अंतरराज्यीय सप्लाई तक फैला हुआ हो सकता है।

इस मामले की शुरुआती कड़ी 23 जुलाई को आगरा-ग्वालियर हाईवे पर सैंया क्षेत्र में हुई कार्रवाई से सामने आई थी। राजपूताना होटल में की गई संयुक्त कार्रवाई के दौरान चार संदिग्ध लोगों को पकड़ा गया और उनकी निशानदेही पर तेंदुओं की खाल, कटे हुए सिर तथा अन्य वन्यजीव अवशेष बरामद किए गए। इसके बाद जांच का दायरा लगातार बढ़ता गया।

जांच एजेंसियों के मुताबिक, अब तक 10 तेंदुओं की खाल बरामद होने की जानकारी सामने आई है। पूछताछ में कूनो वाइल्डलाइफ डिवीजन में छह, श्योपुर में दो और मुरैना के चंबल अभयारण्य क्षेत्र में दो तेंदुओं के शिकार की जानकारी सामने आने का दावा किया गया है।

एजेंसियों के अनुसार, कथित शिकारी तेंदुओं को नायलॉन के जाल में फंसाते थे। जानवर के फंस जाने के बाद उसे कथित तौर पर लाठियों से पीटकर मार दिया जाता था। इसके बाद उसकी खाल उतारकर सिर, हड्डियां, दांत, नाखून और मूंछ जैसे अंग अलग किए जाते थे। बाकी शरीर को जंगल में गड्ढा खोदकर दबाने की बात भी जांच में सामने आई है।

अगर जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह वन्यजीव अपराध की बेहद गंभीर तस्वीर होगी। एक तरफ देश में तेंदुओं के संरक्षण के लिए सरकार और वन विभाग लगातार प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संगठित गिरोह उनके अवैध शिकार से आर्थिक लाभ कमाने की कोशिश कर रहे हैं।

इस नेटवर्क के तार केवल मध्य प्रदेश तक सीमित होने की आशंका नहीं है। जांच एजेंसियों को उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान तक इसके संपर्क होने की जानकारी मिली है। इसका मतलब यह हो सकता है कि जंगल में शिकार करने वाले लोगों से लेकर खाल को एक राज्य से दूसरे राज्य पहुंचाने वालों और अंतिम खरीदारों तक कई स्तर मौजूद थे।

ऐसे मामलों में केवल शिकारी को पकड़ लेना पर्याप्त नहीं होता। जब तक अवैध बाजार में मौजूद खरीदारों और अंतिम सप्लायर तक नहीं पहुंचा जाता, तब तक पूरे नेटवर्क को खत्म करना मुश्किल रहता है। यही वजह है कि STSF और अन्य एजेंसियां गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के जरिए पूरी श्रृंखला जोड़ने की कोशिश कर रही हैं।

मामले में दिल्ली के एक वन्यजीव संरक्षण NGO से जुड़े लोगों के नाम सामने आना भी जांच का महत्वपूर्ण पहलू है। शुरुआती कार्रवाई में गिरफ्तार दो आरोपियों के संगठन से कथित संबंध होने की बात सामने आई थी। इसके बाद STSF ने NGO के CEO को जांच अधिकारी के सामने पेश होने का नोटिस दिया। लेकिन इस पहलू में किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी मानना अभी जल्दबाजी होगी। एजेंसियों को यह साबित करना होगा कि कथित संबंध किस प्रकृति के थे और क्या उनका वन्यजीव अपराध से कोई वास्तविक संबंध था।

इस मामले की जांच में WCCB की भूमिका भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराज्यीय वन्यजीव अपराध के मामलों में राज्यों के बीच समन्वय जरूरी होता है। एक राज्य में शिकार और दूसरे राज्य में सप्लाई होने की स्थिति में अलग-अलग एजेंसियों को मिलकर काम करना पड़ता है।

मुरैना, श्योपुर और कूनो क्षेत्र का नाम सामने आने से मध्य प्रदेश के वन क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठते हैं। कूनो क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां चीता संरक्षण कार्यक्रम चल रहा है। हालांकि इस मामले में जिन जानवरों के शिकार की बात सामने आई है, वे तेंदुए हैं, लेकिन कूनो का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र कई वन्यजीव प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण है।

तेंदुआ जंगल के खाद्य तंत्र का प्रमुख शिकारी है। वह कई शिकार प्रजातियों की संख्या को नियंत्रित करने में भूमिका निभाता है। इसलिए किसी क्षेत्र में तेंदुओं की संख्या कम होना पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

अवैध शिकार रोकने के लिए वन विभाग को तकनीकी निगरानी, कैमरा ट्रैप, ड्रोन, गश्त और स्थानीय सूचना तंत्र को और मजबूत करना होगा। जंगलों में जाल लगाने वालों के खिलाफ नियमित अभियान चलाना भी जरूरी है।

स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी इस लड़ाई में महत्वपूर्ण हो सकती है। जंगल के आसपास रहने वाले लोग संदिग्ध गतिविधियों को जल्दी पहचान सकते हैं। अगर वे वन विभाग को समय पर सूचना दें तो कई जानवरों की जान बचाई जा सकती है।

वन्यजीव अपराध का एक बड़ा कारण अवैध मांग है। जब तक तेंदुए की खाल, नाखून, दांत और अन्य अंगों के लिए खरीदार मौजूद रहेंगे, तब तक शिकारियों को आर्थिक लाभ की उम्मीद बनी रहेगी। इसलिए सरकार और एजेंसियों को शिकारियों के साथ-साथ खरीदारों और तस्करी के अंतिम नेटवर्क पर भी कार्रवाई करनी होगी।

मामले में अब तक 15 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, लेकिन जांच अभी खत्म नहीं हुई है। एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि इस नेटवर्क का वास्तविक आकार कितना बड़ा है और इसके पीछे कौन लोग काम कर रहे थे।

अभी यह भी जांच का विषय है कि क्या नेटवर्क केवल तेंदुओं तक सीमित था या दूसरे संरक्षित वन्यजीव भी इसके निशाने पर थे। यदि जांच में अन्य प्रजातियों की तस्करी के प्रमाण मिलते हैं तो मामला और व्यापक हो सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वन्यजीवों की खाल और अंगों की खरीद-बिक्री कानूनन अपराध है। तेंदुए जैसे संरक्षित वन्यजीवों का शिकार केवल एक जानवर की हत्या नहीं है, बल्कि यह जंगल की जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन के खिलाफ अपराध है।

मुरैना से हुई ताजा गिरफ्तारी के बाद जांच का दायरा और बढ़ गया है। अब एजेंसियों की नजर उन लोगों पर है जो कथित तौर पर शिकारियों से खाल लेकर आगे भेजते थे। यदि अंतिम खरीदार और मुख्य सप्लायर तक पहुंचने में सफलता मिलती है तो यह कार्रवाई मध्य प्रदेश के वन्यजीव तस्करी नेटवर्क के खिलाफ एक बड़ी सफलता साबित हो सकती है।

फिलहाल STSF और सहयोगी एजेंसियां गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर रही हैं। बरामद तेंदुओं की खाल और अन्य अवशेषों की जांच भी मामले में महत्वपूर्ण होगी। आने वाले समय में इस जांच से और नाम, नए ठिकाने और तस्करी के नए रास्ते सामने आने की संभावना है।

तेंदुओं के कथित शिकार से जुड़ा यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि वन्यजीव संरक्षण केवल जंगलों की सीमा के भीतर की जिम्मेदारी नहीं है। जंगल से लेकर अवैध बाजार तक पूरी श्रृंखला पर नजर रखना जरूरी है। जब शिकारी, बिचौलिए, परिवहनकर्ता और खरीदार सभी पर कार्रवाई होगी तभी वन्यजीव अपराध के इस चक्र को प्रभावी ढंग से तोड़ा जा सकेगा।

मध्य प्रदेश में 15 आरोपियों की गिरफ्तारी और 10 तेंदुओं की खाल की बरामदगी निश्चित रूप से बड़ी कार्रवाई है, लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब जांच एजेंसियां इस कथित नेटवर्क की पूरी श्रृंखला तक पहुंचें और यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में कूनो, श्योपुर, चंबल और राज्य के अन्य जंगलों में तेंदुओं तथा दूसरे संरक्षित वन्यजीवों को शिकारियों से सुरक्षित रखा जा सके।

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