NALSAR विवाद पर CJI सूर्यकांत की सफाई, बोले- न्योता स्वीकार ही नहीं किया तो जाने का सवाल ही नहीं

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राष्ट्रीय अकादमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च यानी NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के दीक्षांत समारोह को लेकर चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI सूर्यकांत ने सोमवार को स्पष्ट किया कि उन्होंने NALSAR के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनने का निमंत्रण कभी स्वीकार ही नहीं किया था। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया, तो समारोह में उनके शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। CJI की इस सफाई के बाद उस पूरे विवाद को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है, जिसमें पिछले कुछ दिनों से उनके प्रस्तावित दीक्षांत समारोह में शामिल होने को लेकर चर्चा और छात्रों का विरोध हो रहा था।

यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब NALSAR ने अपने आगामी दीक्षांत समारोह के लिए CJI सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने की जानकारी सामने आई। विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह के अवसर पर देश के प्रमुख संवैधानिक और न्यायिक पदों पर बैठे लोगों को आमंत्रित करने की परंपरा रही है। इसी क्रम में इस बार CJI का नाम सामने आया था। हालांकि विश्वविद्यालय के छात्रों के एक वर्ग ने इस प्रस्तावित आमंत्रण पर आपत्ति जताई। छात्रों की आपत्ति का संबंध CJI की अदालत में छात्र प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सामने आए रुख और टिप्पणियों से बताया गया।

छात्रों के विरोध के बाद मामला केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रहा। विवाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI भी शामिल हो गया। BCI की ओर से NALSAR के कुलपति को पत्र भेजकर उन छात्रों के खिलाफ जांच की मांग की गई जिन्होंने CJI को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए जाने पर आपत्ति जताई थी। शुरुआती कार्रवाई में 2026 बैच के स्नातक छात्रों के स्टेट बार काउंसिल में नामांकन को लेकर भी गंभीर कदम उठाया गया था। इस फैसले ने विवाद को और बड़ा बना दिया क्योंकि इसका असर पूरे बैच के छात्रों पर पड़ सकता था। बाद में BCI ने अपना यह फैसला वापस ले लिया।

BCI के इस कदम पर व्यापक प्रतिक्रिया सामने आई। सवाल उठने लगे कि किसी विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा किसी आमंत्रित अतिथि के खिलाफ असहमति जताने पर पूरे बैच के पेशेवर नामांकन को रोकना किस हद तक उचित है। इस विवाद ने कानूनी शिक्षा, छात्रों के अभिव्यक्ति के अधिकार और संस्थागत स्वायत्तता जैसे मुद्दों को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया। अंततः BCI ने स्पष्ट किया कि 2026 में NALSAR से स्नातक होने वाले छात्रों को उनके राज्य बार काउंसिल में नामांकन का अधिकार रहेगा और किसी छात्र को ऐसी परिस्थिति के लिए नुकसान नहीं उठाना चाहिए जिसके लिए वह व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं है।

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में भी BCI के कदम को लेकर टिप्पणी हुई। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने यह मुद्दा आया और अदालत ने BCI की कार्रवाई पर सवाल उठाए। रिपोर्टों के अनुसार CJI ने इस मामले को उनके और छात्रों के बीच का विषय बताया और BCI के हस्तक्षेप पर असहमति जताई। इसके बाद BCI ने 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर लगाई गई रोक को हटा दिया। हालांकि छात्रों द्वारा CJI को दीक्षांत समारोह में बुलाए जाने के विरोध से संबंधित जांच का विषय पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ और BCI ने कहा कि आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों के आधार पर तय की जाएगी।

अब CJI सूर्यकांत की ताजा सफाई ने विवाद के एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू को स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने NALSAR के आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया था। इसलिए उनके समारोह में शामिल होने से पीछे हटने या निमंत्रण रद्द करने जैसी कोई स्थिति बनी ही नहीं थी। उनका कहना है कि जब उनकी ओर से समारोह में आने की सहमति दी ही नहीं गई, तो उनके उपस्थित होने या नहीं होने को लेकर पैदा हुई चर्चा सही संदर्भ में नहीं थी।

CJI की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले सामने आई कई रिपोर्टों में यह बताया गया था कि NALSAR ने उन्हें मुख्य अतिथि बनने का निमंत्रण दिया था और उनके समारोह में शामिल होने की संभावना थी। कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया था कि छात्रों के विरोध के बावजूद CJI ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। बाद में सामने आई CJI की अपनी सफाई इस धारणा से अलग तस्वीर पेश करती है। उन्होंने साफ किया कि उन्होंने आमंत्रण पर सहमति नहीं दी थी। इसलिए उनके अनुसार समारोह में शामिल होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

NALSAR विवाद की शुरुआत छात्रों के एक खुले विरोध से हुई थी। 2026 में स्नातक होने वाले छात्रों के एक समूह ने विश्वविद्यालय से CJI को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने के निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। रिपोर्टों के अनुसार 400 से अधिक छात्रों और कुछ पूर्व छात्रों ने इस मुद्दे पर अपनी आपत्ति व्यक्त की। छात्रों की चिंता का संबंध मुख्य रूप से उन मामलों से था जिनमें दिल्ली में छात्र प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई से संबंधित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के सामने आई थीं। छात्रों का मानना था कि उन मामलों में सामने आए न्यायिक रुख को देखते हुए CJI को दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि बनाया जाना उनके लिए असहज स्थिति पैदा करता है।

विवाद में जिस छात्र प्रदर्शन का संदर्भ दिया गया, वह 20 जुलाई को दिल्ली में संसद की ओर प्रस्तावित मार्च और प्रदर्शन से संबंधित था। इस दौरान प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं। याचिकाकर्ताओं की ओर से पुलिस कार्रवाई, कथित अत्यधिक बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों की निजता से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे। छात्रों के विरोध का आधार इसी व्यापक कानूनी और संवैधानिक बहस से जुड़ा बताया गया।

NALSAR के छात्रों का विरोध किसी दीक्षांत समारोह के बहिष्कार के रूप में सामने नहीं आया था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार छात्रों का मुख्य आग्रह यह था कि CJI को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने के निर्णय पर विश्वविद्यालय पुनर्विचार करे। वे अपने मत और असहमति को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना चाहते थे। यह भी रिपोर्ट किया गया कि छात्रों ने समारोह को ही रोकने या उसका बहिष्कार करने की घोषणा नहीं की थी। उनका विरोध मुख्य अतिथि के चयन को लेकर था।

यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण बन गया क्योंकि NALSAR देश के प्रमुख विधि विश्वविद्यालयों में शामिल है। यहां पढ़ने वाले छात्रों का प्रशिक्षण संविधान, कानून, न्यायिक प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों से जुड़े विषयों में होता है। ऐसे में जब विश्वविद्यालय के छात्र किसी न्यायिक पदाधिकारी को लेकर अपनी असहमति व्यक्त करते हैं, तो मामला केवल एक कार्यक्रम के अतिथि चयन तक सीमित नहीं रहता। यह सवाल भी उठता है कि कानून की शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों को संस्थागत वातावरण में असहमति व्यक्त करने का कितना अधिकार होना चाहिए और विश्वविद्यालय तथा पेशेवर संस्थाएं ऐसी असहमति से किस तरह निपटें।

BCI की शुरुआती प्रतिक्रिया ने इसी कारण विवाद को और गंभीर बना दिया था। पूरे 2026 बैच के नामांकन पर असर डालने वाले निर्देश ने छात्रों के भविष्य को लेकर चिंता पैदा कर दी थी। बाद में BCI ने अपना निर्णय वापस लिया और कहा कि पूरे बैच के छात्रों को उनके पेशेवर करियर से वंचित नहीं किया जा सकता। इस बदलाव ने विवाद को कुछ हद तक शांत किया, लेकिन BCI द्वारा जांच की बात जारी रहने के कारण मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया भी इस विवाद का अहम हिस्सा बनी। अदालत में BCI की कार्रवाई को लेकर सवाल उठे और CJI सूर्यकांत ने भी इस बात पर नाराजगी जताई कि छात्रों के मुद्दे में BCI किस आधार पर हस्तक्षेप कर रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक CJI ने इस विषय को उनके और छात्रों के बीच का संवाद बताया। इसके बाद BCI ने छात्रों के नामांकन पर लगी सामूहिक रोक हटा दी। इससे छात्रों के पेशेवर भविष्य पर तत्काल बना संकट टल गया।

हालांकि इस पूरे विवाद का एक दिलचस्प पहलू यह है कि अब CJI स्वयं कह रहे हैं कि उन्होंने NALSAR का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था। इसका मतलब यह है कि विवाद का एक बड़ा हिस्सा उस धारणा के आसपास बना था कि CJI समारोह में आने वाले हैं या उन्होंने आने की सहमति दे दी है। CJI की ताजा टिप्पणी से यह स्पष्ट हो गया कि उनकी ओर से ऐसी कोई स्वीकृति नहीं दी गई थी। इसलिए उन्होंने समारोह में न जाने के बारे में उठ रही चर्चाओं को ही अप्रासंगिक बताया।

इस घटनाक्रम के बाद NALSAR के दीक्षांत समारोह को लेकर स्थिति पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट हो सकती है। विश्वविद्यालय को अब यह तय करना होगा कि समारोह में मुख्य अतिथि कौन होगा और आयोजन किस रूप में किया जाएगा। रिपोर्टों के अनुसार समारोह अगस्त के अंत या सितंबर में होने की संभावना बताई गई थी, हालांकि तारीख को लेकर अंतिम घोषणा की जानकारी अलग-अलग रिपोर्टों में स्पष्ट नहीं थी।

यह विवाद कानूनी संस्थानों और छात्रों के बीच संवाद के महत्व को भी सामने लाता है। किसी विश्वविद्यालय में छात्र केवल डिग्री हासिल करने वाले विद्यार्थी नहीं होते, बल्कि वे कानून और संविधान के सिद्धांतों को समझने और उन पर सवाल उठाने वाले भविष्य के पेशेवर भी होते हैं। इसलिए असहमति को संभालने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी प्रशासनिक निर्णय का होना। NALSAR मामले में छात्रों ने अपनी आपत्ति सार्वजनिक की, BCI ने उस पर कार्रवाई की और फिर आलोचना के बाद अपना कदम वापस लिया। अब CJI की सफाई ने इस पूरे घटनाक्रम में एक नया तथ्य जोड़ दिया है।

इस विवाद में एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा संस्थागत अधिकार क्षेत्र का भी है। BCI का मुख्य काम अधिवक्ताओं के पेशेवर नियमन और कानूनी पेशे से संबंधित विभिन्न मामलों से जुड़ा है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालयों के भीतर छात्रों के अकादमिक और प्रशासनिक मामलों को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन की अपनी जिम्मेदारियां होती हैं। जब किसी छात्र के विश्वविद्यालयी विरोध का असर उसके पेशेवर नामांकन पर पड़ने लगे तो दोनों संस्थाओं की भूमिकाओं और अधिकारों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। सुप्रीम कोर्ट में हुई टिप्पणियों और BCI के बाद के फैसले ने इसी प्रश्न को राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बना दिया।

NALSAR के छात्रों के लिए भी यह मामला केवल एक अतिथि के चयन से आगे बढ़ चुका है। उनके लिए यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति दर्ज कराने के अधिकार का प्रश्न बन गया है। दूसरी ओर, किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को लेकर छात्रों की सार्वजनिक असहमति को किस तरह देखा जाए, यह भी एक संवेदनशील विषय है। इस पूरे मामले में दोनों पक्षों के बीच संवाद और संस्थागत प्रक्रिया के जरिए समाधान निकालना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

CJI सूर्यकांत की ताजा टिप्पणी ने हालांकि उनके व्यक्तिगत रुख को स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा है कि उन्होंने निमंत्रण स्वीकार नहीं किया था और इसलिए समारोह में जाने का सवाल ही नहीं उठता। इस बयान से यह धारणा समाप्त होती है कि उन्होंने पहले समारोह में शामिल होने की सहमति दी और बाद में छात्रों के विरोध के कारण अपना फैसला बदला। उनके अनुसार ऐसा कोई घटनाक्रम हुआ ही नहीं था।

अब आगे की नजर NALSAR और BCI से जुड़े बचे हुए प्रशासनिक तथा जांच संबंधी पहलुओं पर रहेगी। BCI ने 2026 बैच के छात्रों के नामांकन को लेकर अपना प्रतिबंध वापस ले लिया है, लेकिन छात्रों द्वारा CJI के आमंत्रण का विरोध करने के मामले में जांच की बात सामने आई थी। विश्वविद्यालय प्रशासन से रिपोर्ट मांगी गई थी और उसके आधार पर आगे की कार्रवाई पर विचार करने की बात कही गई थी। इसलिए विवाद का एक हिस्सा अभी भी संस्थागत स्तर पर जारी रह सकता है।

पूरे घटनाक्रम को देखें तो मामला कई चरणों से होकर गुजरा है। पहले NALSAR की ओर से CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह का निमंत्रण दिए जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद छात्रों के एक वर्ग ने उनके मुख्य अतिथि बनने पर आपत्ति जताई। फिर BCI ने हस्तक्षेप करते हुए छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी और पूरे 2026 बैच के नामांकन पर रोक लगाने जैसा कदम उठाया। विरोध और आलोचना के बाद BCI ने यह रोक हटा दी। सुप्रीम कोर्ट में भी इस कार्रवाई पर सवाल उठे। और अब CJI ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्होंने निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था।

इस पूरे मामले से यह भी स्पष्ट होता है कि किसी सार्वजनिक पदाधिकारी के कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर बनी धारणा और वास्तविक आधिकारिक सहमति में अंतर हो सकता है। NALSAR ने निमंत्रण दिया था, लेकिन CJI की ओर से उसे स्वीकार करने की बात अब उन्होंने खुद खारिज कर दी है। इसलिए आगे इस मुद्दे पर चर्चा करते समय उनके इस स्पष्ट बयान को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा।

कुल मिलाकर, NALSAR दीक्षांत समारोह विवाद में CJI सूर्यकांत ने अपने रुख को साफ कर दिया है। उन्होंने कहा है कि उन्होंने विश्वविद्यालय का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था, इसलिए समारोह में उनके जाने या बाद में न जाने का सवाल पैदा नहीं होता। यह बयान उस विवाद के एक महत्वपूर्ण पहलू को स्पष्ट करता है, जो पिछले दिनों छात्रों के विरोध, BCI की कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया। छात्रों की आपत्ति, BCI की शुरुआती सख्ती और बाद में उसका फैसला वापस लेना इस पूरे मामले के प्रमुख घटनाक्रम रहे हैं। अब CJI की सफाई के बाद विवाद का केंद्र उनके समारोह में शामिल होने से हटकर छात्रों की असहमति, BCI की जांच और संस्थागत अधिकार क्षेत्र जैसे मुद्दों पर रह सकता है। आने वाले दिनों में NALSAR के दीक्षांत समारोह की अंतिम व्यवस्था और BCI की आगे की कार्रवाई से यह साफ होगा कि यह विवाद किस दिशा में जाता है।

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