नेपाल के Gen-Z नेता बालेन शाह से क्यों हुआ लोगों का मोहभंग? 150 दिनों में बदली तस्वीर, जानिए सरकार का रिपोर्ट कार्ड

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नेपाल की राजनीति में बदलाव और नई पीढ़ी की उम्मीद का चेहरा बनकर उभरे प्रधानमंत्री बालेन शाह के सत्ता संभालने के करीब 150 दिन पूरे हो गए हैं। जब वह मार्च 2026 में प्रधानमंत्री बने थे, तब उन्हें पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था से अलग एक नए दौर की शुरुआत करने वाला युवा नेता माना गया था। लेकिन करीब पांच महीने के भीतर उनकी लोकप्रियता और नेतृत्व शैली को लेकर सवाल उठने लगे हैं। जिन युवाओं और Gen-Z मतदाताओं ने उन्हें बदलाव की उम्मीद के तौर पर समर्थन दिया था, उनमें से ही कुछ वर्ग अब सरकार के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं।

बालेन शाह की राजनीतिक यात्रा पारंपरिक नेताओं से काफी अलग रही है। वह पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर हैं, रैपर के रूप में भी पहचान बना चुके हैं और राजनीति में आने से पहले काठमांडू के मेयर के तौर पर काम कर चुके हैं। काठमांडू के मेयर के रूप में उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी, जो पुराने राजनीतिक ढर्रे को चुनौती देने और प्रशासन में बदलाव की कोशिश करता है। इसी छवि ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में तेजी से लोकप्रिय बनाया।

मार्च 2026 के आम चुनाव के बाद उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी यानी Rastriya Swatantra Party को बड़ी जीत मिली और बालेन शाह प्रधानमंत्री बने। उन्होंने 27 मार्च को पद संभाला। उनकी सरकार से लोगों को उम्मीद थी कि भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता जैसी समस्याओं पर तेजी से काम होगा। शुरुआत में यही उम्मीद उनके पक्ष में दिखाई भी दी।

लेकिन 150 दिनों के भीतर तस्वीर पहले जैसी नहीं रही। सरकार के सामने प्रशासनिक कामकाज, संसद के साथ संबंध, विदेश नीति और सड़क पर बढ़ते विरोध जैसे कई मुद्दे सामने आए। जुलाई में काठमांडू में ऐसे विरोध प्रदर्शन भी हुए जिनमें सरकार से जवाबदेही की मांग की गई। यह वही युवा वर्ग था जिसे बालेन शाह की राजनीति की ताकत माना जाता था। :contentReference[oaicite:0]{index=0}

### बालेन शाह के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या बनी?

बालेन शाह के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह अपनी चुनावी लोकप्रियता को प्रभावी शासन में बदल पाए हैं। चुनाव जीतना और सरकार चलाना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं। चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख, तेजी से फैसले लेने और पुराने राजनीतिक दलों से दूरी ने उन्हें लोकप्रिय बनाया था। लेकिन सरकार में आने के बाद उन्हीं वादों को संस्थागत रूप से लागू करना ज्यादा कठिन साबित हुआ।

सत्ता संभालने के तुरंत बाद उनकी सरकार ने 100 सूत्रीय शासन सुधार एजेंडा पेश किया। इसमें प्रशासनिक सुधार, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई, सरकारी सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाना और संस्थागत बदलाव जैसे लक्ष्य शामिल थे। सरकार ने बाद में दावा किया कि पहले 100 दिनों में उसके एजेंडे का 87.2 प्रतिशत हिस्सा पूरा या पर्याप्त रूप से आगे बढ़ चुका था। सरकार के अनुसार 70 प्रतिशत काम पूरी तरह पूरा हुआ, जबकि बाकी कई कार्य 60 से 80 प्रतिशत से अधिक स्तर तक पहुंच चुके थे। :contentReference[oaicite:1]{index=1}

सरकार के इस दावे से एक सकारात्मक तस्वीर सामने आती है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि सरकारी रिपोर्ट में काम की प्रगति का प्रतिशत बताना और जमीन पर उसका असर दिखाई देना दो अलग बातें हैं। यही अंतर बालेन शाह सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है।

### 100 दिनों का सरकारी रिपोर्ट कार्ड बनाम जनता की उम्मीद

बालेन सरकार ने अपने पहले 100 दिनों को उपलब्धियों के साथ पेश किया था। सरकार ने शासन सुधार के लिए निर्धारित 100 सूत्रीय एजेंडे को आधार बनाकर अपनी प्रगति का आकलन किया। इसमें प्रशासनिक सुधार, भ्रष्टाचार विरोधी जांच, सरकारी संस्थानों में बदलाव और सेवाओं को बेहतर बनाने जैसे मुद्दे शामिल थे। :contentReference[oaicite:2]{index=2}

लेकिन जनता की अपेक्षाएं केवल सरकारी योजनाओं की संख्या या पूरे किए गए कार्यों के प्रतिशत तक सीमित नहीं थीं। बालेन शाह की लोकप्रियता का आधार ही यह था कि वह पारंपरिक नेताओं से अलग तरीके से काम करेंगे। इसलिए उनसे ज्यादा तेज और दिखाई देने वाले परिणामों की उम्मीद की गई।

यही कारण है कि सरकार के 87.2 प्रतिशत प्रगति के दावे के बावजूद उसके खिलाफ आलोचना दिखाई देने लगी। जनता यह देखना चाहती है कि सरकारी सेवाओं में वास्तव में कितना सुधार आया, भ्रष्टाचार पर कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई और आम नागरिक की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान कितना हुआ।

### संसद से दूरी बनी बड़ा राजनीतिक मुद्दा

बालेन शाह सरकार की आलोचना का एक महत्वपूर्ण मुद्दा संसद के साथ उनका संबंध है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक प्रधानमंत्री ने पद संभालने के बाद संसद की 39 बैठकों में से केवल पांच में भाग लिया। इस पर संसद के भीतर सवाल उठे और स्पीकर ने उन्हें 26 अगस्त को सदन में उपस्थित होने के लिए बुलाया। :contentReference[oaicite:3]{index=3}

यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री संसदीय लोकतंत्र में सरकार के प्रमुख होते हैं। जनता द्वारा चुनी गई संसद के साथ नियमित संवाद लोकतांत्रिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यदि प्रधानमंत्री संसद की बैठकों से लगातार दूर रहते हैं तो विपक्ष और आलोचक इसे संस्थागत दूरी के रूप में देख सकते हैं।

बालेन शाह की राजनीति की खासियत ही यह रही है कि वह पारंपरिक राजनीतिक शैली से अलग दिखना चाहते हैं। लेकिन सरकार चलाने के लिए संसद, विपक्ष और संवैधानिक संस्थाओं के साथ लगातार संवाद जरूरी है। यही वह क्षेत्र है जहां उनकी शैली को लेकर अब बहस तेज हो रही है।

### युवा समर्थन में दरार के संकेत

बालेन शाह की राजनीतिक ताकत का सबसे बड़ा आधार युवा मतदाता रहे हैं। उन्हें पुराने राजनीतिक दलों से ऊब चुके युवाओं ने नए विकल्प के रूप में देखा। भ्रष्टाचार और राजनीतिक परिवारवाद से नाराज युवा वर्ग ने उन्हें बदलाव के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया।

लेकिन सत्ता में आने के कुछ ही महीनों बाद उन्हीं युवाओं के बीच असंतोष के संकेत दिखाई देने लगे। जुलाई 2026 में काठमांडू में विरोध प्रदर्शनों ने सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी की। कुछ प्रदर्शन गरीब और विस्थापित लोगों के पुनर्वास से जुड़े मुद्दों पर हुए। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि हटाए गए लोगों के लिए पर्याप्त पुनर्वास व्यवस्था नहीं की गई। :contentReference[oaicite:4]{index=4}

एक अन्य विरोध ने सरकार के प्रति युवा असंतोष को और स्पष्ट किया। एक 25 वर्षीय राइड-शेयर ड्राइवर गणेश नेपाली की मौत के बाद युवाओं में आक्रोश दिखाई दिया। वह ट्रैफिक पुलिस द्वारा लगाए गए जुर्माने से जुड़े विवाद के बाद आत्मदाह कर बैठा था। इस घटना ने प्रशासन और आम नागरिक के बीच संबंध तथा सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े किए। :contentReference[oaicite:5]{index=5}

यह विरोध बालेन शाह के लिए इसलिए भी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि उनकी राजनीति का दावा ही यह था कि उनकी सरकार आम नागरिक और खासकर युवाओं की समस्याओं को प्राथमिकता देगी।

### पुराने राजनीतिक दलों से अलग दिखना कितना सफल रहा?

बालेन शाह की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी उनकी गैर-पारंपरिक छवि थी। वह पुराने नेताओं की तरह लंबे समय तक पार्टी राजनीति में सक्रिय नहीं रहे। पहले उन्होंने काठमांडू के मेयर के रूप में स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीता था। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया।

उनका रैपर से इंजीनियर और फिर मेयर तथा प्रधानमंत्री बनने तक का सफर युवाओं के बीच काफी आकर्षक रहा। लेकिन सत्ता में आने के बाद गैर-पारंपरिक शैली को प्रशासनिक अनुभव और संस्थागत प्रक्रिया के साथ संतुलित करना आवश्यक हो गया।

सरकार चलाने में केवल लोकप्रिय भाषण या सख्त बयान पर्याप्त नहीं होते। मंत्रालयों के बीच समन्वय, कानून निर्माण, संसद से संवाद, बजट प्रबंधन, प्रशासनिक नियुक्तियां और अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे मुद्दों पर लगातार संस्थागत काम करना पड़ता है।

यही वह क्षेत्र है जहां बालेन शाह की सरकार की परीक्षा हो रही है।

### भ्रष्टाचार के खिलाफ एजेंडा

बालेन शाह सरकार ने भ्रष्टाचार और अवैध वित्तीय गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई को अपने प्रमुख एजेंडे में रखा। सरकार ने कई मामलों की जांच शुरू करने और संदिग्ध वित्तीय गतिविधियों पर कार्रवाई करने की बात कही। 100 दिनों के रिपोर्ट कार्ड में भी शासन सुधार और भ्रष्टाचार विरोधी कदमों को प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया गया। :contentReference[oaicite:6]{index=6}

सरकार ने मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में 101 लोगों के नाम सामने लाने की बात भी कही थी। यह कदम भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के रूप में प्रस्तुत किया गया। हालांकि किसी व्यक्ति का जांच में नाम आना अपने आप अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं होता। मामलों की कानूनी प्रक्रिया और अदालतों के निर्णय अलग विषय हैं।

भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई बालेन शाह की राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन इस अभियान की सफलता का वास्तविक आकलन तभी होगा जब जांच के साथ-साथ संस्थागत सुधार भी स्थायी रूप से लागू हों और कार्रवाई राजनीतिक पक्षपात से मुक्त दिखाई दे।

### प्रशासनिक सुधार पर जोर

बालेन शाह सरकार ने प्रशासन को अधिक जवाबदेह और परिणाम आधारित बनाने की कोशिश की है। सरकार ने मंत्रियों के साथ प्रदर्शन समझौते भी किए हैं। अगस्त 2026 में प्रधानमंत्री और मंत्रियों के बीच चालू वित्त वर्ष के लिए काम और लक्ष्यों से जुड़े प्रदर्शन समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। :contentReference[oaicite:7]{index=7}

यह कदम इस सोच को दर्शाता है कि मंत्रियों की जिम्मेदारी केवल पद संभालने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें स्पष्ट लक्ष्य दिए जाएं और बाद में उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाए।

लेकिन इस मॉडल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन लक्ष्यों को कैसे मापा जाता है और अगर कोई मंत्री अपने लक्ष्य पूरे नहीं करता तो सरकार क्या कार्रवाई करती है। यदि प्रदर्शन समझौते केवल औपचारिक दस्तावेज बनकर रह जाते हैं तो उनका प्रभाव सीमित होगा।

### संघीय व्यवस्था को लेकर भी सवाल

नेपाल एक संघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है और स्थानीय तथा प्रांतीय सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। बालेन शाह सरकार के पहले 100 दिनों पर लिखे गए विश्लेषणों में संघीय व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए। विशेषज्ञों ने कहा कि नेपाल के संविधान में संघीय ढांचे की जो कल्पना की गई है, उसे प्रभावी बनाने के लिए प्रांतों और स्थानीय निकायों को वास्तविक अधिकार और संसाधन देना जरूरी है। :contentReference[oaicite:8]{index=8}

बालेन शाह खुद काठमांडू के मेयर रह चुके हैं, इसलिए स्थानीय शासन की समस्याओं से उनका परिचय रहा है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर संघीय ढांचे को संभालना अलग चुनौती है। केंद्र, प्रदेश और स्थानीय निकायों के बीच अधिकारों तथा संसाधनों का संतुलन बनाना जरूरी है।

यदि केंद्र सरकार अत्यधिक केंद्रीकरण की ओर बढ़ती है तो संघीय व्यवस्था कमजोर होने की आलोचना हो सकती है। दूसरी ओर अगर स्थानीय और प्रांतीय सरकारों के बीच समन्वय कमजोर रहता है तो विकास योजनाओं का प्रभाव कम हो सकता है।

### अध्यादेशों के इस्तेमाल पर बहस

बालेन सरकार ने कई सुधारों को तेजी से लागू करने के लिए अध्यादेशों का इस्तेमाल किया। सरकार का तर्क रहा कि कुछ पुराने कानून विकास और प्रशासनिक सुधारों में बाधा बन रहे थे, इसलिए तत्काल कदम उठाना जरूरी था। :contentReference[oaicite:9]{index=9}

लेकिन अध्यादेशों का अधिक इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर सवाल पैदा कर सकता है। संसद कानून बनाने वाली प्रमुख संस्था है। यदि सरकार बार-बार अध्यादेश के माध्यम से महत्वपूर्ण नीतियां लागू करती है तो विपक्ष इसे संसद को दरकिनार करने की कोशिश के रूप में देख सकता है।

बालेन शाह के लिए चुनौती यह है कि तेजी से फैसले लेने की उनकी छवि और संसदीय लोकतंत्र की प्रक्रियाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

### विदेश नीति में भी उठे सवाल

बालेन शाह सरकार के 150 दिनों में विदेश नीति भी चर्चा का विषय बनी। खासकर भारत-नेपाल संबंधों और सीमा से जुड़े उनके बयानों को लेकर राजनीतिक विवाद हुआ। हालिया रिपोर्टों के अनुसार उनके कुछ बयानों के बाद विपक्ष और अन्य राजनीतिक समूहों की ओर से आलोचना हुई। :contentReference[oaicite:10]{index=10}

नेपाल के लिए भारत और चीन दोनों के साथ संतुलित संबंध महत्वपूर्ण हैं। इसलिए प्रधानमंत्री के किसी भी बयान का घरेलू राजनीति के साथ-साथ कूटनीतिक प्रभाव भी हो सकता है।

बालेन शाह के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि उनका राजनीतिक अनुभव राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत नया है। विदेश नीति में सरकार को लगातार संस्थागत विशेषज्ञता और रणनीतिक संतुलन की जरूरत होती है।

### भारत के साथ एक महत्वपूर्ण मुद्दा

नेपाल और भारत के बीच लंबे समय से लोगों, व्यापार, संस्कृति और रोजगार के गहरे संबंध हैं। इसके अलावा नेपाली नागरिकों की भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों के रूप में ऐतिहासिक भूमिका रही है।

हाल में नेपाल में भारतीय सेना की अग्निवीर भर्ती को लेकर भी बहस जारी है। नेपाल सरकार से गोरखा समुदाय और पूर्व सैनिकों की ओर से इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है। यह विषय बालेन सरकार के लिए सामाजिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर संवेदनशील है। :contentReference[oaicite:11]{index=11}

सरकार को एक ओर नेपाल के युवाओं के हितों को देखना है, दूसरी ओर भारत के साथ लंबे समय से चले आ रहे सैन्य और सामाजिक संबंधों को भी ध्यान में रखना है।

### सरकार के पक्ष में क्या उपलब्धियां हैं?

बालेन शाह सरकार के 150 दिनों का मूल्यांकन केवल आलोचनाओं के आधार पर करना भी उचित नहीं होगा। सरकार ने कम समय में कई प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत की है। 100 सूत्रीय एजेंडा बनाना, उसकी प्रगति की निगरानी करना और मंत्रियों के लिए प्रदर्शन आधारित लक्ष्य निर्धारित करना सरकार की कार्यशैली में बदलाव की कोशिश को दिखाता है।

सरकार का अपना दावा है कि उसके 100 सूत्रीय एजेंडे का बड़ा हिस्सा निर्धारित समय में आगे बढ़ा। 87.2 प्रतिशत प्रगति का सरकारी आंकड़ा बताता है कि सरकार अपने कामकाज को मापने के लिए लक्ष्य आधारित व्यवस्था अपनाने की कोशिश कर रही है। :contentReference[oaicite:12]{index=12}

भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में जांच भी सरकार के एजेंडे का हिस्सा रही है। इसके अलावा प्रशासनिक संस्थाओं को अधिक जवाबदेह बनाने और डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है। :contentReference[oaicite:13]{index=13}

इसलिए बालेन सरकार को पूरी तरह विफल कहना भी जल्दबाजी होगी। असली सवाल यह है कि शुरुआती सुधारों को कितनी स्थायी सफलता मिलती है।

### फिर लोगों का मोहभंग क्यों?

बालेन शाह की लोकप्रियता जितनी तेज गति से बढ़ी थी, उसी कारण उनसे अपेक्षाएं भी बहुत ज्यादा थीं। युवा मतदाताओं ने उन्हें केवल एक सामान्य प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखा। वह उनके लिए राजनीतिक बदलाव के प्रतीक थे।

ऐसे में जब सरकार को सामान्य राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा तो निराशा भी तेजी से सामने आई। लोगों को लगा कि जिस तेजी से बदलाव की उम्मीद थी, वह जमीन पर उतनी तेजी से दिखाई नहीं दे रहा।

संसद से दूरी, विरोध प्रदर्शनों का बढ़ना, विदेश नीति से जुड़े विवाद और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उनकी छवि को प्रभावित कर रहे हैं। यही वजह है कि केवल 150 दिनों में उनके खिलाफ इस्तीफे की मांग जैसी आवाजें उठने लगीं। :contentReference[oaicite:14]{index=14}

### क्या Gen-Z क्रांति का असर खत्म हो रहा है?

नेपाल में Gen-Z आंदोलन ने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव पैदा किया। पुराने राजनीतिक नेतृत्व से नाराज युवाओं ने नई राजनीतिक दिशा की मांग की। बालेन शाह इस बदलाव के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक बनकर सामने आए।

लेकिन किसी आंदोलन के आधार पर सत्ता में आना और उस आंदोलन की उम्मीदों को लंबे समय तक बनाए रखना अलग चुनौती है। आंदोलन के दौरान जनता भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रशासनिक अक्षमता और राजनीतिक अस्थिरता के खिलाफ एकजुट हो सकती है। लेकिन सत्ता में आने के बाद सरकार को इन्हीं समस्याओं के जटिल और व्यावहारिक समाधान देने पड़ते हैं।

युवाओं की उम्मीदें भी बहुत ऊंची हैं। वे केवल घोषणाएं नहीं बल्कि परिणाम चाहते हैं। यही कारण है कि बालेन शाह के लिए आने वाले महीने बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

### 150 दिनों के बाद सबसे बड़ा टेस्ट

बालेन शाह सरकार का अगला चरण उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण हो सकता है। शुरुआती 100 दिनों में सरकार ने अपना एजेंडा और उपलब्धियां पेश कर दी हैं। अब जनता यह देखना चाहेगी कि उन सुधारों का वास्तविक प्रभाव क्या रहा।

संसद के साथ संबंध सुधारना, विपक्ष के साथ संवाद बढ़ाना, युवाओं की शिकायतों का समाधान करना और विदेश नीति में संतुलित रुख बनाए रखना सरकार की प्राथमिकताओं में होना चाहिए।

इसके साथ ही भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखना जरूरी होगा। यदि कार्रवाई केवल राजनीतिक विरोधियों तक सीमित दिखाई देती है तो सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

### बालेन शाह के सामने दो रास्ते

150 दिनों के बाद बालेन शाह के सामने मूल रूप से दो राजनीतिक रास्ते दिखाई देते हैं। पहला रास्ता है अपनी गैर-पारंपरिक और टकराव वाली शैली को जारी रखना। इससे उनके पुराने समर्थकों का एक हिस्सा उनके साथ रह सकता है, लेकिन संस्थागत टकराव बढ़ने का खतरा रहेगा।

दूसरा रास्ता है अपनी लोकप्रियता को संस्थागत शासन में बदलना। इसमें संसद के साथ संवाद, विपक्ष से बातचीत, प्रशासनिक विशेषज्ञों का इस्तेमाल और संघीय संस्थाओं के साथ बेहतर समन्वय शामिल हो सकता है।

दूसरा रास्ता शायद कठिन हो, लेकिन लंबे समय तक सरकार चलाने के लिए यही ज्यादा टिकाऊ साबित हो सकता है।

### जनता अब क्या चाहती है?

नेपाल की जनता ने बालेन शाह से सिर्फ राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि ठोस परिणाम की उम्मीद की थी। युवा मतदाता भ्रष्टाचार से मुक्ति, बेहतर रोजगार, पारदर्शी प्रशासन और प्रभावी सरकारी सेवाएं चाहते हैं।

साथ ही लोग यह भी चाहते हैं कि सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करे। संसद से दूरी और अध्यादेशों के इस्तेमाल को लेकर उठे सवाल इसीलिए महत्वपूर्ण हैं।

बालेन शाह को यह साबित करना होगा कि बदलाव का मतलब केवल पुराने नेताओं को हटाना नहीं है। असली बदलाव तब होगा जब सरकारी संस्थाएं बेहतर काम करें, भ्रष्टाचार कम हो, नागरिक सेवाएं तेज हों और आम लोगों को सरकार की नीतियों का वास्तविक लाभ मिले।

### 150 दिनों का संतुलित रिपोर्ट कार्ड

अगर बालेन शाह सरकार के पहले 150 दिनों का संतुलित मूल्यांकन किया जाए तो तस्वीर मिश्रित नजर आती है।

एक तरफ सरकार ने महत्वाकांक्षी 100 सूत्रीय एजेंडा पेश किया, प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया, भ्रष्टाचार विरोधी जांच को आगे बढ़ाया और मंत्रियों के लिए प्रदर्शन आधारित लक्ष्य तय करने की कोशिश की। सरकार ने अपने 100 दिनों के प्रदर्शन को 87.2 प्रतिशत तक सफल बताया। :contentReference[oaicite:15]{index=15}

दूसरी तरफ सरकार को संसद से दूरी, विरोध प्रदर्शनों, पुनर्वास से जुड़े विवादों, विदेश नीति पर सवाल और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा है। प्रधानमंत्री की संसद में कम उपस्थिति को लेकर स्पीकर द्वारा उन्हें सदन में बुलाया जाना इस तनाव का स्पष्ट संकेत है। :contentReference[oaicite:16]{index=16}

इसलिए फिलहाल बालेन शाह को न तो पूरी तरह सफल और न ही पूरी तरह असफल नेता कहना उचित होगा। उनके पास अभी भी बड़े बहुमत और राजनीतिक समर्थन का आधार है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे शुरुआती लोकप्रियता को लंबे समय की विश्वसनीयता में कैसे बदलते हैं।

### आने वाले महीनों में क्या होगा?

बालेन शाह के लिए अगले कुछ महीने निर्णायक होंगे। यदि सरकार युवाओं के बीच बढ़ती नाराजगी को कम करने में सफल होती है, संसद के साथ संबंध सुधारती है और अपने 100 सूत्रीय एजेंडे के वास्तविक परिणाम दिखाती है तो उनकी लोकप्रियता दोबारा मजबूत हो सकती है।

लेकिन यदि विरोध बढ़ता है, संसद के साथ टकराव जारी रहता है और सरकार के दावे जमीन पर दिखाई नहीं देते तो शुरुआती Gen-Z समर्थन तेजी से कमजोर हो सकता है।

उनकी सबसे बड़ी ताकत भी युवा समर्थन है और सबसे बड़ी कमजोरी भी यही बन सकती है। युवा मतदाता किसी नेता को तेजी से ऊपर उठा सकते हैं, लेकिन वे परिणाम न मिलने पर उतनी ही तेजी से सवाल भी उठा सकते हैं।

बालेन शाह की राजनीतिक यात्रा इसलिए नेपाल के लिए सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस पीढ़ी की कहानी भी है जो पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर नई तरह की शासन व्यवस्था चाहती है।

लेकिन नई राजनीति को पुरानी समस्याओं का समाधान करने के लिए संस्थागत क्षमता विकसित करनी होगी। लोकप्रियता और सोशल मीडिया समर्थन किसी सरकार को लंबे समय तक नहीं चला सकते। इसके लिए मजबूत संस्थाएं, पारदर्शी निर्णय, जवाबदेही और निरंतर प्रशासनिक परिणाम जरूरी होते हैं।

150 दिनों के बाद बालेन शाह के सामने यही सबसे बड़ी परीक्षा है। क्या वह उस युवा आंदोलन की उम्मीदों को वास्तविक शासन में बदल पाएंगे जिसने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया? क्या वह संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ बेहतर तालमेल बना पाएंगे? क्या उनकी सरकार भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता के खिलाफ अपने वादों को स्थायी सुधार में बदल पाएगी?

इन सवालों के जवाब अभी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं।

फिलहाल बालेन शाह की सरकार एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां शुरुआती उत्साह धीरे-धीरे वास्तविक शासन की कसौटी में बदल चुका है। चुनावी जीत ने उन्हें सत्ता दी, लेकिन अब शासन की गुणवत्ता ही उनकी राजनीतिक विरासत तय करेगी।

नेपाल के युवाओं ने जिस नेता में पुराने राजनीतिक दौर से बाहर निकलने की उम्मीद देखी थी, वही नेता अब उन्हीं उम्मीदों को पूरा करने की चुनौती का सामना कर रहा है। 150 दिनों में उनके खिलाफ उठती आवाजें यह संकेत जरूर देती हैं कि जनता अब केवल बदलाव का वादा नहीं, बल्कि बदलाव का परिणाम चाहती है।

इसलिए बालेन शाह का असली रिपोर्ट कार्ड अभी 150 दिनों में पूरा नहीं हुआ है। 100 सूत्रीय एजेंडे के आंकड़े सरकार की शुरुआती उपलब्धियों को दिखाते हैं, जबकि सड़क पर हो रहे विरोध और संसद से जुड़े विवाद उसके सामने मौजूद कमजोरियों को सामने रखते हैं। :contentReference[oaicite:17]{index=17}

आने वाले महीनों में अगर सरकार अपने सुधारों को जमीन पर उतारने, युवाओं की शिकायतों को सुनने और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ संतुलन बनाने में सफल होती है तो बालेन शाह फिर से बदलाव के मजबूत प्रतीक बन सकते हैं। लेकिन अगर जनता की उम्मीदों और सरकार के वास्तविक प्रदर्शन के बीच दूरी बढ़ती रही, तो उनकी राजनीतिक चमक और समर्थन दोनों पर असर पड़ना तय माना जा सकता है।

यही वजह है कि नेपाल की राजनीति में बालेन शाह का 150 दिनों का सफर एक मिश्रित रिपोर्ट कार्ड पेश करता है। यह सरकार पूरी तरह विफल नहीं हुई है, लेकिन इसे वह निर्णायक सफलता भी नहीं मिली है जिसकी उम्मीद उनके समर्थकों ने सत्ता में आने से पहले की थी। अब असली चुनौती यह है कि बालेन शाह अपनी लोकप्रियता को संस्थागत सुधार, बेहतर प्रशासन और जनता के भरोसे में बदल पाते हैं या नहीं।

 

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