राजनीति में उत्तराधिकारी की आहट? नीतीश के सामने मंत्री ने बेटे निशांत को दिया खुला ऑफर, जेडीयू में बढ़ी चर्चा

2

बिहार की राजनीति में एक बार फिर उत्तराधिकार और भविष्य की सियासत को लेकर हलचल तेज हो गई है। पटना में आयोजित जेडीयू के सरस्वती पूजा कार्यक्रम के दौरान एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने राजनीतिक गलियारों में नई अटकलों को जन्म दे दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने ही पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री ने उनके बेटे निशांत कुमार से खुलकर कह दिया—“अब मान जाइए और राजनीति में आइए।” यह वाक्य भले ही सहज माहौल में कहा गया हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने बेहद गहरे माने जा रहे हैं।

नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा रहे हैं। दशकों से सत्ता में सक्रिय रहते हुए उन्होंने न सिर्फ कई बार मुख्यमंत्री पद संभाला, बल्कि राज्य की राजनीति की दिशा भी तय की। लेकिन निजी जीवन में वे हमेशा अपने बेटे निशांत को राजनीति से दूर रखने के लिए जाने जाते रहे हैं। निशांत कुमार अब तक सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाए रखते आए हैं और शायद ही कभी राजनीतिक मंचों पर सक्रिय दिखे हों।

इसी पृष्ठभूमि में जेडीयू के इस कार्यक्रम में दिया गया यह ऑफर अचानक राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया। सरस्वती पूजा के मौके पर पार्टी के कई बड़े नेता और मंत्री मौजूद थे। माहौल धार्मिक और औपचारिक था, लेकिन मंच पर हुई यह टिप्पणी पूरे कार्यक्रम से ज्यादा सुर्खियों में आ गई।

बताया जा रहा है कि मंत्री ने मुस्कुराते हुए निशांत से कहा कि अब बहुत हो गया, आपको राजनीति में आकर पार्टी और बिहार की सेवा करनी चाहिए। खास बात यह रही कि यह बात खुद नीतीश कुमार के सामने कही गई। कुछ पल के लिए मंच पर मौजूद लोग भी चौंक गए और फिर माहौल हल्की हंसी और तालियों में बदल गया।

हालांकि, नीतीश कुमार ने इस पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्होंने न तो समर्थन जताया और न ही इसे सिरे से खारिज किया। लेकिन उनकी चुप्पी को ही अब राजनीतिक विश्लेषक कई तरह से पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

यह पहली बार नहीं है, जब निशांत कुमार को लेकर राजनीति में चर्चा हुई हो। इससे पहले भी कई मौकों पर जेडीयू के नेता यह इच्छा जता चुके हैं कि नीतीश कुमार के बाद पार्टी की कमान उनके बेटे के हाथों में जाए। लेकिन हर बार खुद नीतीश कुमार ने इस तरह की बातों को नकारते हुए कहा है कि राजनीति में वंशवाद की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

नीतीश कुमार हमेशा खुद को वंशवादी राजनीति के खिलाफ खड़ा करने वाले नेताओं में गिनाते रहे हैं। उन्होंने बार-बार कहा है कि उनकी पार्टी किसी परिवार की नहीं, बल्कि विचारधारा की पार्टी है। यही वजह है कि निशांत कुमार को उन्होंने कभी सार्वजनिक राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया।

लेकिन अब परिस्थितियां बदलती दिख रही हैं। नीतीश कुमार की उम्र, उनकी सेहत और बिहार की बदलती सियासत—ये सभी कारक पार्टी के भीतर भविष्य की रणनीति को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं। जेडीयू को भी यह सोचना पड़ रहा है कि नीतीश कुमार के बाद पार्टी का चेहरा कौन होगा।

इसी संदर्भ में मंत्री का यह ऑफर सिर्फ एक मजाक नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर चल रही गहरी सोच का संकेत माना जा रहा है। कुछ नेताओं का मानना है कि निशांत कुमार, अपने पिता की छवि और विरासत के चलते, पार्टी को एकजुट रखने का मजबूत विकल्प बन सकते हैं।

हालांकि, इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर मतभेद भी साफ दिखाई देते हैं। जेडीयू के कई नेता अभी भी वंशवाद के खिलाफ अपनी पुरानी लाइन पर कायम रहना चाहते हैं। उनका कहना है कि अगर पार्टी किसी परिवार विशेष तक सीमित हो गई, तो उसकी वैचारिक पहचान कमजोर पड़ जाएगी।

दूसरी ओर, कुछ नेता यह तर्क देते हैं कि निशांत कुमार का राजनीति में आना वंशवाद नहीं, बल्कि स्वाभाविक नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है—बशर्ते वे खुद सक्रिय भूमिका निभाना चाहें और संगठन के भीतर अपनी जगह बनाएं।

निशांत कुमार की भूमिका अब तक पूरी तरह निजी रही है। वे न तो चुनावी राजनीति में दिखे हैं, न ही पार्टी के किसी पद पर रहे हैं। मीडिया से दूरी, सार्वजनिक भाषणों से परहेज और राजनीतिक विवादों से अलग रहना—यही उनकी पहचान रही है।

इसी वजह से यह सवाल भी अहम हो जाता है कि क्या निशांत खुद राजनीति में आना चाहते हैं, या फिर यह सिर्फ नेताओं की इच्छा है? अब तक निशांत की ओर से इस विषय पर कोई सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार फिलहाल इस मुद्दे को खुलकर सामने नहीं लाना चाहते। वे जानते हैं कि वंशवाद का आरोप उनकी पूरी राजनीतिक छवि को चोट पहुंचा सकता है। इसलिए वे न तो इस ऑफर का समर्थन कर रहे हैं और न ही इसे पूरी तरह खारिज।

बिहार की राजनीति में उत्तराधिकार का सवाल हमेशा संवेदनशील रहा है। लालू प्रसाद यादव के परिवार से लेकर अन्य दलों तक, वंशवाद का मुद्दा बार-बार उठता रहा है। ऐसे में अगर नीतीश कुमार का बेटा राजनीति में आता है, तो विपक्ष इसे बड़ा हथियार बना सकता है।

विपक्षी दल पहले ही इस टिप्पणी को लेकर निशाना साधने लगे हैं। उनका कहना है कि जो नेता सालों तक वंशवाद के खिलाफ बोलता रहा, वही अब अपने बेटे को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। हालांकि, जेडीयू की ओर से फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी दिखा दिया है कि बिहार की राजनीति अब धीरे-धीरे “पोस्ट-नीतीश युग” के बारे में सोचने लगी है। भले ही नीतीश कुमार अभी सक्रिय हैं, लेकिन पार्टी के भीतर भविष्य की रणनीति पर मंथन शुरू हो चुका है।

कुछ नेताओं का मानना है कि यह ऑफर एक तरह से पार्टी के भीतर भावनात्मक दबाव बनाने की कोशिश भी हो सकता है—ताकि नीतीश कुमार खुद इस विषय पर खुलकर बात करें और भविष्य की दिशा साफ हो सके।

मनोवैज्ञानिक रूप से देखें तो यह स्थिति नीतीश कुमार के लिए भी कठिन है। एक तरफ उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता है, दूसरी तरफ पार्टी की स्थिरता और अपने बाद की विरासत का सवाल है। यही द्वंद्व इस चुप्पी में झलकता है।

यह घटना यह भी बताती है कि राजनीति में कई बार मंच पर कहे गए एक वाक्य से बड़ी बहस शुरू हो जाती है। मंत्री का यह ऑफर भले ही हल्के अंदाज़ में दिया गया हो, लेकिन उसने जेडीयू के भविष्य, नेतृत्व परिवर्तन और वंशवाद—तीनों मुद्दों को एक साथ खोल दिया है।

अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि नीतीश कुमार आगे इस पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या वे फिर से साफ कहेंगे कि निशांत राजनीति में नहीं आएंगे? या फिर आने वाले समय में धीरे-धीरे निशांत की सार्वजनिक मौजूदगी बढ़ेगी?

कुल मिलाकर, सरस्वती पूजा के मंच पर कही गई यह एक पंक्ति बिहार की राजनीति में नई चर्चा का बीज बो चुकी है। यह सिर्फ एक पिता और बेटे की कहानी नहीं, बल्कि एक पार्टी और एक राज्य के भविष्य की दिशा से जुड़ा सवाल बन गया है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह ऑफर महज एक क्षणिक टिप्पणी था या फिर जेडीयू की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत।

Share it :

End