राजस्थान निकाय चुनाव में Gen-Z की एंट्री, 21 साल के फैज हसन और नेहा शर्मा ने जीता पार्षद का चुनाव

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राजस्थान के 2026 नगर निकाय चुनाव के नतीजों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबले के साथ-साथ एक और तस्वीर तेजी से उभरकर सामने आई है। इस चुनाव में युवा यानी Gen-Z उम्मीदवारों ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और कुछ बेहद कम उम्र के प्रत्याशियों ने जीत हासिल कर पार्षद के रूप में स्थानीय राजनीति में कदम रखा है। इनमें जयपुर नगर निगम के वार्ड 71 से 21 वर्षीय कांग्रेस उम्मीदवार फैज हसन और अलवर जिले की थानागाजी नगरपालिका के वार्ड 6 से 21 साल चार महीने की बीजेपी उम्मीदवार नेहा शर्मा शामिल हैं। दोनों की जीत को राजस्थान की स्थानीय राजनीति में नई पीढ़ी की एंट्री के तौर पर देखा जा रहा है।

इन चुनावों से पहले ही बीजेपी और कांग्रेस ने युवा चेहरों पर बड़ा दांव लगाया था। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, अजमेर और कोटा जैसे पांच प्रमुख शहरों में दोनों दलों ने 21 से 29 वर्ष की उम्र के कुल 70 Gen-Z उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। इनमें कांग्रेस के 49 और बीजेपी के 21 उम्मीदवार शामिल थे। अब नतीजों के बाद इन युवा प्रत्याशियों में से कुछ के जीतने से यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या राजस्थान की स्थानीय राजनीति में धीरे-धीरे पीढ़ीगत बदलाव दिखाई देने लगा है।

21 साल के फैज हसन ने जयपुर में दर्ज की जीत

जयपुर नगर निगम के वार्ड 71 का चुनाव इस बार खास चर्चा में रहा। यहां कांग्रेस ने 21 वर्षीय फैज हसन को उम्मीदवार बनाया था। फैज ने चुनाव में 5,426 वोट हासिल किए और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी निर्दलीय उम्मीदवार मोहम्मद सलीम को 170 वोटों के अंतर से हराया। सलीम को 5,256 वोट मिले, जबकि बीजेपी की उम्मीदवार निशा गौड़ तीसरे स्थान पर रहीं।

फैज की जीत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह महज 21 साल की उम्र में जयपुर नगर निगम के पार्षद बने हैं। नगर निगम चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम उम्र 21 वर्ष है, इसलिए वह उस आयु सीमा को पूरा करते ही चुनावी मैदान में उतरे और जीत हासिल करने में सफल रहे।

जीत के बाद फैज ने अपने वार्ड के लोगों का आभार जताया और कहा कि जनता ने उन पर भरोसा किया है। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों को पूरा करने की बात कही। उनके प्रमुख स्थानीय मुद्दों में सफाई व्यवस्था और सड़कों से जुड़ी समस्याएं शामिल थीं।

फैज का कहना है कि अब उनका ध्यान वार्ड में साफ-सफाई की स्थिति सुधारने और सड़क निर्माण जैसे कामों पर रहेगा। यानी उनकी प्राथमिकताएं राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के बजाय सीधे उन समस्याओं पर केंद्रित हैं जिनका सामना वार्ड के लोग रोजाना करते हैं।

पत्रकारिता से राजनीति में आईं नेहा शर्मा

अलवर जिले की थानागाजी नगरपालिका से भी 21 साल की उम्र में एक युवा चेहरा पार्षद बनी हैं। बीजेपी की नेहा शर्मा ने वार्ड 6 से चुनाव जीतकर स्थानीय राजनीति में प्रवेश किया है।

नेहा की उम्र जीत के समय 21 साल चार महीने थी। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को 101 वोटों से हराया। खास बात यह है कि बीजेपी के मुताबिक, थानागाजी नगरपालिका में पार्टी के उम्मीदवारों में नेहा की जीत का अंतर सबसे ज्यादा रहा।

नेहा का राजनीतिक सफर सीधे राजनीति से शुरू नहीं हुआ। चुनाव लड़ने से पहले वह करीब चार साल तक स्थानीय समाचार संगठनों के साथ पत्रकार के रूप में काम कर चुकी थीं। पत्रकारिता के अनुभव के बाद उन्होंने चुनावी राजनीति में उतरने का फैसला किया।

यानी नेहा के लिए यह बदलाव पत्रकारिता से सीधे जमीनी राजनीति की ओर जाने वाला कदम है। स्थानीय स्तर की समस्याओं को करीब से समझने और लोगों से संवाद करने का उनका अनुभव चुनाव प्रचार में भी उनके काम आया।

नेहा की जीत को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने अपेक्षाकृत कम उम्र में पहली बार चुनाव लड़कर सफलता हासिल की है।

परिवार में खुशी का माहौल

नेहा की जीत के बाद उनके परिवार में खुशी का माहौल है। उनकी मां पूजा शर्मा ने बताया कि परिवार अपनी बेटी की जीत से बेहद खुश और गर्व महसूस कर रहा है।

परिवार के मुताबिक, नेहा ने चुनाव के दौरान लगातार मेहनत की और वार्ड के लोगों को अपने पक्ष में मतदान करने के लिए समझाने की कोशिश की। उनकी मां का कहना था कि नेहा का उद्देश्य अगले पांच वर्षों तक वार्ड के लोगों की सेवा करना है।

नेहा की कहानी यह भी बताती है कि स्थानीय चुनावों में युवा उम्मीदवारों के लिए केवल राजनीतिक परिवार से आना ही जरूरी नहीं है। पत्रकारिता या सामाजिक क्षेत्र जैसे दूसरे अनुभवों से आने वाले युवा भी स्थानीय राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

Gen-Z उम्मीदवारों पर पहले से था पार्टियों का भरोसा

राजस्थान के इस निकाय चुनाव में Gen-Z उम्मीदवारों को टिकट देने का सिलसिला केवल एक-दो सीटों तक सीमित नहीं था। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने बड़ी संख्या में 21 से 29 वर्ष के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था।

जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, अजमेर और कोटा के 510 वार्डों में दोनों दलों ने कुल 70 Gen-Z उम्मीदवारों को टिकट दिया। इनमें कांग्रेस ने 49 और बीजेपी ने 21 युवा प्रत्याशी उतारे थे।

जयपुर में कांग्रेस ने 12 Gen-Z उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जबकि बीजेपी ने छह युवा प्रत्याशियों पर भरोसा जताया था। कांग्रेस की ओर से फैज हसन 21 साल की उम्र में सबसे युवा उम्मीदवारों में शामिल थे।

जोधपुर में भी 17 Gen-Z उम्मीदवार मैदान में थे। कांग्रेस ने यहां 10 और बीजेपी ने सात युवा प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाया था। कांग्रेस की 21 वर्षीय सरस्वती और बीजेपी की 24 वर्षीय भाग्यश्री आचार्य भी इस सूची में शामिल थीं।

इससे स्पष्ट है कि युवा चेहरों को टिकट देने की रणनीति किसी एक शहर तक सीमित नहीं थी। प्रमुख शहरी निकायों में दोनों राष्ट्रीय दलों ने युवा मतदाताओं के साथ-साथ युवा उम्मीदवारों को भी आकर्षित करने की कोशिश की।

सिर्फ वोटर नहीं, अब उम्मीदवार भी बन रही Gen-Z

राजस्थान के इन चुनावों में Gen-Z की भूमिका केवल वोट डालने तक सीमित नहीं रही। अब इसी पीढ़ी के युवा निर्वाचित प्रतिनिधि बनकर नगर निकायों में पहुंच रहे हैं।

यह बदलाव स्थानीय राजनीति के लिहाज से खास है क्योंकि नगर निगम और नगर पालिकाओं के काम का सीधा संबंध लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से होता है। सड़क, सफाई, नालियां, पानी, स्ट्रीट लाइट, स्थानीय बाजार, सार्वजनिक स्थान और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दे इन्हीं संस्थाओं के कामकाज से जुड़े होते हैं।

युवा उम्मीदवारों की जीत ऐसे समय हुई है जब देशभर में Gen-Z की राजनीतिक भागीदारी को लेकर चर्चा बढ़ रही है। सोशल मीडिया, डिजिटल संचार और नई तरह की राजनीतिक भाषा के बीच युवा मतदाता लगातार एक महत्वपूर्ण चुनावी समूह बन रहे हैं।

अब राजस्थान के निकाय चुनाव में कुछ युवा उसी व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं जिसके कामकाज पर वे पहले मतदाता के तौर पर नजर रखते थे।

फैज की प्राथमिकता सफाई और सड़क

फैज हसन ने जीत के बाद जिन मुद्दों को प्राथमिकता दी, उनमें सफाई और सड़क निर्माण प्रमुख हैं। यह स्थानीय निकाय चुनाव की राजनीति का पारंपरिक लेकिन बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शहरों में खराब सफाई व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, टूटी सड़कें और जल निकासी जैसी समस्याएं सीधे नागरिकों को प्रभावित करती हैं। इसलिए किसी युवा पार्षद के लिए इन मुद्दों पर काम करना उसके कार्यकाल की शुरुआती परीक्षा भी हो सकता है।

फैज ने जनता के भरोसे को अपनी जिम्मेदारी से जोड़ते हुए कहा कि वह चुनाव के दौरान किए गए वादों पर काम शुरू करेंगे। इससे यह संकेत मिलता है कि वह अपने कार्यकाल की शुरुआत वार्ड की बुनियादी सुविधाओं से करना चाहते हैं।

नेहा की जीत में 101 वोटों का अंतर

थानागाजी नगरपालिका के वार्ड 6 में नेहा शर्मा और कांग्रेस उम्मीदवार के बीच मुकाबला करीबी रहा। नेहा ने 101 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।

स्थानीय निकाय चुनावों में इतनी कम उम्र के उम्मीदवार का जीतना और वह भी सीमित अंतर से जीत हासिल करना यह दिखाता है कि कई वार्डों में चुनाव बेहद स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करते हैं। बड़े राजनीतिक मुद्दों के साथ-साथ उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान, जनसंपर्क और वार्ड के लोगों के साथ उसका संबंध भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

नेहा ने चुनाव से पहले लोगों के बीच जाकर प्रचार किया और उन्हें अपने पक्ष में मतदान के लिए तैयार करने की कोशिश की। उनके परिवार के अनुसार, उन्होंने इसके लिए लगातार मेहनत की।

जयपुर में एक और युवा चेहरा सुमन भाटी

Gen-Z की इस नई राजनीतिक तस्वीर में केवल फैज और नेहा ही नहीं हैं। जयपुर के वार्ड 72 से 22 वर्षीय सुमन भाटी ने भी जीत दर्ज की है।

सुमन ने अपने क्षेत्र की स्थानीय जरूरतों को लेकर चुनाव अभियान चलाया था। उन्होंने बताया कि उनके इलाके में कई कच्ची बस्तियां हैं और वहां रहने वाले लोगों से उन्होंने कई वादे किए थे।

जीत के बाद सुमन ने कहा कि वह अपने वार्ड में तीन सार्वजनिक लाइब्रेरी विकसित करने और महिलाओं के लिए सिविल डिफेंस की कक्षाएं आयोजित करने पर ध्यान देंगी। उनका कहना है कि उनका लक्ष्य पूरे वार्ड का विकास करना है।

यहां एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि सुमन के परिवार का राजनीति से कुछ जुड़ाव रहा है। उनके पति रमेश राजस्थान विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से जुड़े रहे हैं और NSUI के प्रवक्ता भी रह चुके हैं।

लाइब्रेरी से लेकर सिविल डिफेंस तक का एजेंडा

सुमन भाटी के वादे बताते हैं कि युवा पार्षदों का स्थानीय एजेंडा केवल सड़क और नाली तक सीमित नहीं है। सार्वजनिक लाइब्रेरी, महिलाओं के लिए प्रशिक्षण और सामुदायिक सुविधाओं जैसे मुद्दे भी उनके राजनीतिक एजेंडे में जगह बना रहे हैं।

यह बदलाव स्थानीय राजनीति में नई प्राथमिकताओं का संकेत हो सकता है। खासकर युवा प्रतिनिधि शिक्षा, डिजिटल सुविधाओं, रोजगार और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को नगर निकाय के काम से जोड़ने की कोशिश कर सकते हैं।

हालांकि, चुनावी वादों को जमीन पर लागू करना निर्वाचित प्रतिनिधियों के सामने अगली बड़ी चुनौती होगी। नगर निकायों के पास उपलब्ध बजट, प्रशासनिक अधिकार और राज्य सरकार के साथ समन्वय यह तय करेंगे कि ये वादे कितनी तेजी से पूरे हो सकते हैं।

राजस्थान में युवा उम्मीदवारों की संख्या क्यों बढ़ी?

राजस्थान के निकाय चुनाव में युवा उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में टिकट मिलने के पीछे कई राजनीतिक कारण हो सकते हैं। राज्य में 35 वर्ष तक के मतदाताओं की संख्या चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। चुनाव से पहले उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 18 से 25 वर्ष के मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 14.7 प्रतिशत थी, जबकि 26 से 35 वर्ष के मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 25.4 प्रतिशत बताई गई थी।

इसका मतलब है कि युवा मतदाता एक बड़ा चुनावी समूह हैं। राजनीतिक दलों के लिए ऐसे मतदाताओं से जुड़ने का एक तरीका यह भी है कि उन्हें उम्मीदवार के रूप में सामने लाया जाए।

लेकिन केवल उम्र के आधार पर टिकट देना पर्याप्त नहीं होता। उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, संगठन से जुड़ाव, सामाजिक संपर्क और चुनाव प्रचार की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

फैज, नेहा और सुमन की जीत से कम से कम इतना जरूर दिखाई देता है कि कुछ युवा उम्मीदवारों ने मतदाताओं का भरोसा हासिल करने में सफलता पाई है।

स्थानीय राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव के संकेत

राजस्थान के निकाय चुनावों के नतीजों को अगर व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो बीजेपी ने 309 शहरी स्थानीय निकायों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में बढ़त बनाई है। उपलब्ध परिणामों के अनुसार बीजेपी 148 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी रही, जबकि कांग्रेस 104 में आगे रही। 10 निकायों में दोनों बराबरी पर रहे।

इस बड़े राजनीतिक मुकाबले के बीच Gen-Z उम्मीदवारों की जीत अलग तरह की कहानी कहती है। एक तरफ राज्य की राजनीति में बीजेपी और कांग्रेस का पारंपरिक मुकाबला जारी है, तो दूसरी तरफ इन्हीं दलों के भीतर नई पीढ़ी के नेताओं के लिए जगह बन रही है।

अगर आने वाले वर्षों में ये युवा प्रतिनिधि अपने वार्डों में प्रभावी काम करने में सफल रहते हैं, तो संभव है कि इनमें से कुछ चेहरे भविष्य में नगर निकाय से आगे की राजनीति में भी दिखाई दें।

अब असली परीक्षा पांच साल के काम की

चुनाव जीतना किसी भी उम्मीदवार के राजनीतिक सफर की शुरुआत होती है। खासकर नगर निकाय के पार्षद के लिए जीत के बाद असली चुनौती अपने वार्ड की समस्याओं को प्रशासन के सामने उठाने और उपलब्ध संसाधनों के भीतर उनका समाधान कराने की होती है।

फैज हसन के सामने जयपुर के वार्ड 71 में सफाई और सड़क से जुड़े वादे पूरे करने की चुनौती होगी। नेहा शर्मा को थानागाजी के वार्ड 6 में अपने मतदाताओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होगा। वहीं सुमन भाटी ने सार्वजनिक लाइब्रेरी और महिलाओं के लिए सिविल डिफेंस कक्षाओं जैसे अपेक्षाकृत अलग मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात कही है।

इन युवा पार्षदों का प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण रहेगा क्योंकि उनके काम को केवल स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि Gen-Z की राजनीतिक भागीदारी के उदाहरण के रूप में भी देखा जा सकता है।

क्या Gen-Z बदलेगी राजस्थान की राजनीति?

राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में 21 और 22 साल के उम्मीदवारों की जीत निश्चित रूप से एक दिलचस्प राजनीतिक संकेत है। हालांकि, इसे अभी राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव का प्रमाण कहना जल्दबाजी होगी।

स्थानीय निकाय चुनाव विधानसभा या लोकसभा चुनाव से अलग होते हैं। यहां उम्मीदवार और वार्ड का स्थानीय समीकरण बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए फैज, नेहा और सुमन की जीत को उनके संबंधित क्षेत्रों में मतदाताओं के फैसले के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।

फिर भी यह बदलाव नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अब युवा केवल चुनावी रैलियों में भीड़ या सोशल मीडिया पर समर्थक की भूमिका में नहीं हैं। वे खुद टिकट मांग रहे हैं, चुनाव लड़ रहे हैं और जीतकर निर्वाचित संस्थाओं में पहुंच रहे हैं।

राजस्थान के इन चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस ने जिस तरह 21 से 29 वर्ष के दर्जनों उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, उससे यह साफ है कि दोनों दलों को युवा पीढ़ी की राजनीतिक क्षमता और उसके वोटिंग प्रभाव का एहसास है।

फैज हसन, नेहा शर्मा और सुमन भाटी की जीत इस बदलाव का शुरुआती चेहरा बनकर सामने आई है। अब आने वाले पांच साल यह तय करेंगे कि ये युवा प्रतिनिधि केवल चुनावी आंकड़ों में Gen-Z की जीत के उदाहरण बने रहते हैं या वास्तव में स्थानीय शासन के कामकाज में नई सोच और नई कार्यशैली लेकर आते हैं।

राजस्थान के लिए यह प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नगर निकाय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से सीधे जुड़े होते हैं। अगर युवा पार्षद सफाई, सड़क, शिक्षा, सुरक्षा, पानी और स्थानीय बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों पर प्रभावी काम कर पाते हैं, तो उनकी सफलता आने वाले समय में दूसरे युवाओं को भी राजनीति में आने के लिए प्रेरित कर सकती है।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि राजस्थान की स्थानीय राजनीति में Gen-Z ने केवल दस्तक नहीं दी है, बल्कि कुछ सीटों पर जीत हासिल करके सदन तक पहुंच भी बना ली है। 21 साल के फैज हसन और 21 साल चार महीने की नेहा शर्मा की जीत इसी नई राजनीतिक पीढ़ी की शुरुआत का संकेत देती है।
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