
भारत निर्वाचन आयोग यानी ECI ने Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर अपने तीन सदस्यीय आयोग के भीतर मतभेद की खबरों पर स्पष्टीकरण दिया है। आयोग ने कहा है कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ दोनों चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, की मंजूरी इसमें शामिल थी। आयोग का कहना है कि किसी मुद्दे पर आंतरिक स्तर पर सवाल, सुझाव या अलग-अलग राय सामने आना सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन अंतिम निर्णय आयोग की सामूहिक मंजूरी से लिए गए।
यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर कई बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं। रिपोर्ट में मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, वोटर डेटा के प्रबंधन तथा SIR की प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दों पर आंतरिक स्तर पर सवाल उठाए जाने की बात कही गई थी।
आयोग के बयान के बाद यह मामला राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। विपक्षी दलों ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, जबकि बीजेपी नेताओं ने आयोग के स्पष्टीकरण का समर्थन करते हुए विपक्ष के आरोपों पर प्रतिक्रिया दी है। ऐसे में पूरे विवाद को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि SIR क्या है, कथित आपत्तियों में क्या कहा गया और चुनाव आयोग ने उनका क्या जवाब दिया।
क्या है SIR?
SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक व्यवस्थित और अद्यतन करना है। चुनाव आयोग समय-समय पर मतदाता सूची को अपडेट करता है, ताकि नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़े जा सकें और ऐसे नामों को हटाया जा सके जो मृत्यु, स्थानांतरण, डुप्लीकेशन या अन्य कानूनी कारणों से सूची में नहीं होने चाहिए।
SIR सामान्य चुनावी रोल अपडेट से अधिक व्यापक प्रक्रिया है। इसमें मतदाता सूची की गहन समीक्षा की जाती है और पात्र मतदाताओं से संबंधित दस्तावेजों तथा विवरणों की जांच की जाती है।
यही वजह है कि SIR का असर बड़ी संख्या में मतदाताओं पर पड़ सकता है और इस प्रक्रिया में पारदर्शिता तथा उचित प्रक्रिया का सवाल राजनीतिक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
सितंबर 2026 में एक विस्तृत रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, ने पिछले 10 महीनों में कई मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों या प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में ऐसे कम से कम 14 मौकों का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, SIR के दौरान लिए गए कुछ प्रशासनिक कदमों तथा चुनावी डेटा की सुरक्षा और निगरानी से था।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों आयुक्तों की कुछ आपत्तियां इस बात को लेकर थीं कि कुछ प्रक्रियाओं या कदमों के बारे में उन्हें पर्याप्त जानकारी या मंजूरी प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया। इन दावों ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए।
हालांकि चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों की व्याख्या अलग तरीके से की है।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
ECI ने कहा कि किसी भी बहु-सदस्यीय संस्था में अंतिम निर्णय से पहले अलग-अलग अधिकारी या सदस्य अपनी राय, सवाल और सुझाव दे सकते हैं। आयोग के मुताबिक, यह आंतरिक जांच और संतुलन की सामान्य प्रक्रिया है।
23 सितंबर को जारी अपने आधिकारिक स्पष्टीकरण में चुनाव आयोग ने कहा कि उसके सभी आधिकारिक आदेश, निर्णय और प्रशासनिक निर्देश निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत जारी किए गए। आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक वर्ष के दौरान लिए गए फैसलों, सुधारों और पहलों को पूर्ण आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी प्राप्त थी।
ECI के अनुसार, SIR से जुड़े फैसले भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा थे। आयोग ने कहा कि किसी सदस्य की ओर से ड्राफ्ट स्तर पर कोई सवाल या सुझाव दिया जाना अंतिम फैसले में असहमति के बराबर नहीं माना जा सकता।
आयोग का तर्क है कि विचार-विमर्श और अंतिम निर्णय दो अलग-अलग चरण हैं। किसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन अंतिम आदेश तीनों आयुक्तों की मंजूरी के बाद ही जारी किए गए।
26 सितंबर की बैठक में भी आया स्पष्टीकरण
विवाद बढ़ने के बाद 26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी, ने नई दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन में पूर्ण आयोग की बैठक की। इसके बाद आयोग की ओर से फिर कहा गया कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।
आयोग ने इस दौरान SIR और Form 6 से जुड़े कुछ प्रक्रियात्मक मुद्दों पर भी स्पष्टीकरण दिया। दिल्ली और महाराष्ट्र में मतदाताओं के दावों और आपत्तियों से संबंधित कुछ समय-सीमाओं में भी बदलाव किए गए।
इस बैठक का महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि इससे पहले सामने आई रिपोर्टों में आयोग के भीतर कथित मतभेदों की चर्चा थी। पूर्ण आयोग की बैठक के बाद ECI ने सार्वजनिक रूप से यह संदेश दिया कि अंतिम निर्णयों में तीनों आयुक्तों की सामूहिक मंजूरी थी।
दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। एक तरफ चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। दूसरी तरफ भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मौकों पर प्रक्रियाओं को लेकर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं।
रिपोर्ट में बताया गया कि कुछ आपत्तियां मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने से संबंधित थीं। कुछ मामलों में वोटर डेटा और चुनावी रोल से जुड़े डिजिटल सिस्टम की निगरानी तथा अधिकारों को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।
इसलिए विवाद का मुख्य बिंदु यह है कि क्या किसी आयुक्त की ओर से किसी प्रक्रिया या प्रारंभिक कदम पर आपत्ति दर्ज करना आयोग के अंतिम फैसले में असहमति माना जाए या नहीं।
ECI का कहना है कि केवल आंतरिक टिप्पणियों और सवालों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आयोग ने अलग-अलग फैसले लिए या उसके अंतिम आदेशों में विभाजन था।
SIR को लेकर राजनीतिक विवाद क्यों बढ़ा?
मतदाता सूची में बदलाव सीधे चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा विषय है। इसलिए SIR को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण रही है।
विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल पूछे हैं। कांग्रेस नेताओं ने विशेष रूप से चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए CEC ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने SIR तथा चुनावी प्रक्रिया से संबंधित अलग-अलग आरोप लगाए हैं। इन आरोपों को राजनीतिक दावों के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि स्थापित तथ्य के रूप में। दूसरी तरफ बीजेपी नेताओं ने चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण का समर्थन किया है और विपक्ष के आरोपों पर सवाल उठाए हैं।
इस पूरे विवाद में यह अंतर महत्वपूर्ण है कि आयोग के आधिकारिक बयान में SIR के फैसलों को सर्वसम्मत बताया गया है, जबकि कुछ मीडिया रिपोर्टों में आंतरिक आपत्तियों का दस्तावेजी विवरण सामने रखा गया है।
चुनाव आयोग ने आंतरिक टिप्पणियों को कैसे समझाया?
ECI ने अपने बयान में कहा कि किसी संस्थान में अलग-अलग विचार सामने आना अपने आप में असामान्य नहीं है। आयोग के मुताबिक, अधिकारी और आयुक्त किसी प्रस्ताव के अंतिम रूप लेने से पहले सुझाव दे सकते हैं, कानूनी सवाल उठा सकते हैं या किसी प्रक्रिया में सुधार की बात कर सकते हैं।
आयोग ने कहा कि ऐसे सुझावों का उद्देश्य प्रक्रिया को मजबूत करना और मतदाता अधिकारों की रक्षा करना हो सकता है। इसलिए किसी आंतरिक नोट या टिप्पणी को सीधे अंतिम निर्णय के खिलाफ मतदान या औपचारिक असहमति के रूप में देखना उचित नहीं है।
ECI ने यह भी कहा कि हाल के महीनों में उसने लगभग 40 नई पहल और कई चुनावी सुधार लागू किए हैं और इन फैसलों को पूर्ण आयोग की मंजूरी मिली है।
Form 6 को लेकर भी चर्चा
विवाद में Form 6 से संबंधित प्रक्रिया भी चर्चा में आई। Form 6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए किया जाता है।
आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि Form 6 से संबंधित फैसले भी निर्धारित प्रक्रिया और आयोग की मंजूरी के तहत लिए गए। SIR के संदर्भ में नए मतदाताओं के पंजीकरण और दस्तावेजों की जांच का मुद्दा महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी पात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल होना उसके मतदान के अधिकार से जुड़ा है।
इसी कारण चुनावी रोल में नाम जोड़ने या हटाने की हर प्रक्रिया में कानूनी आधार और उचित प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण रहता है।
चुनावी डेटा की सुरक्षा पर भी सवाल
रिपोर्टों में चुनावी डेटा और डिजिटल सिस्टम के प्रबंधन को लेकर भी सवालों का उल्लेख किया गया। चुनाव आयोग ने इस संबंध में कहा कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म, जिनमें ECINet भी शामिल है, सुरक्षा प्रोटोकॉल और ऑडिट नियंत्रण के तहत संचालित होते हैं।
ECI के मुताबिक, अनधिकृत बदलाव या डेटा से छेड़छाड़ रोकने के लिए सुरक्षा जांच और ऑडिट सिस्टम लागू हैं। आयोग ने यह भी कहा कि Electoral Registration Officers और District Election Officers अपने-अपने वैधानिक अधिकारों के तहत मतदाता सूची से संबंधित काम करते हैं।
इसका मतलब है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का पूरा तंत्र केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय से संचालित होने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें विभिन्न स्तरों के अधिकारी और निर्धारित कानूनी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।
विवाद में अब सबसे अहम सवाल क्या है?
फिलहाल इस पूरे मामले में दो अलग-अलग पहलू सामने हैं।
पहला, चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि SIR समेत उसके अंतिम फैसले तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए। आयोग यह भी कह रहा है कि आंतरिक चर्चा के दौरान अलग-अलग विचार या आपत्तियां होना सामान्य प्रक्रिया है।
दूसरा, प्रकाशित रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कई मामलों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में इन आपत्तियों को मतदाता सूची, नाम जोड़ने-हटाने और चुनावी डेटा से जुड़े मुद्दों से जोड़ा गया है।
इसलिए विवाद का केंद्र यह नहीं है कि आयोग में कभी कोई सवाल या टिप्पणी हुई या नहीं। मुख्य प्रश्न यह है कि उन टिप्पणियों का अंतिम निर्णयों पर क्या प्रभाव पड़ा और क्या वे केवल आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा थीं या कुछ मामलों में वास्तविक संस्थागत असहमति का संकेत थीं।
आगे क्या होगा?
SIR को लेकर राजनीतिक और कानूनी चर्चा आगे भी जारी रहने की संभावना है। मतदाता सूची से जुड़े किसी भी व्यापक पुनरीक्षण में पारदर्शिता, पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने और गलत तरीके से नाम हटने की स्थिति में प्रभावी शिकायत एवं अपील व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है।
चुनाव आयोग ने अपने हालिया स्पष्टीकरण में कहा है कि वह संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। वहीं विपक्षी दलों की ओर से आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठाए गए सवाल राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं।
ऐसे में फिलहाल सबसे स्पष्ट तथ्य यही है कि चुनाव आयोग ने SIR से जुड़े अंतिम फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है, जबकि प्रकाशित रिपोर्टों में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में आपत्तियां दर्ज किए जाने का विवरण सामने आया है। इन दोनों बातों के बीच अंतर को समझे बिना पूरे विवाद को एकतरफा निष्कर्ष में बदलना उचित नहीं होगा।
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