
अमेरिका में रूस के खिलाफ नए प्रतिबंधों को लेकर तैयार किए गए कानून ने भारत और चीन के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 16 सितंबर 2026 को रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक को मंजूरी दी। इस बिल का नाम दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है और इसे रूस की अर्थव्यवस्था तथा ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
बिल के पक्ष में 262 वोट पड़े, जबकि 159 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। अब यह विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा। यदि राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर करते हैं, तो इसमें दिए गए प्रावधान लागू होने का रास्ता खुल जाएगा। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि बिल अपने आप भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं करता। यह अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में ऐसा टैरिफ लगाने का अधिकार देता है।
इसी घटनाक्रम के बाद अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने भारत और चीन को लेकर सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को रूस से तेल और गैस खरीदने के बजाय दूसरे स्रोतों से ऊर्जा खरीदनी चाहिए। उनके बयान में यह भी कहा गया कि रूस को आर्थिक समर्थन देने वाली ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिका का रुख अब अधिक कड़ा हो रहा है।
रिचर्ड ब्लूमेंथल ने क्या कहा?
रिचर्ड ब्लूमेंथल उन अमेरिकी सांसदों में शामिल हैं जिन्होंने रूस पर प्रतिबंधों को और कड़ा करने के लिए इस विधेयक को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई है। उन्होंने भारत और चीन को सीधे संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें अपने रवैये में बदलाव करना चाहिए और रूस से तेल तथा गैस खरीदने के बजाय दूसरे स्रोत तलाशने चाहिए।
उनका यह बयान अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रूस प्रतिबंध विधेयक पारित होने के बाद आया। ब्लूमेंथल का तर्क है कि रूस से ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाकर मॉस्को की ऊर्जा आय को कम किया जा सकता है। अमेरिकी कानून निर्माताओं के एक वर्ग का मानना है कि रूस की ऊर्जा बिक्री से मिलने वाला राजस्व यूक्रेन युद्ध के दौरान उसकी अर्थव्यवस्था को सहारा देता है।
हालांकि, ब्लूमेंथल का बयान अमेरिकी सरकार की ओर से भारत को तेल खरीद बंद करने का कोई नया औपचारिक आदेश नहीं है। यह एक अमेरिकी सांसद की सार्वजनिक टिप्पणी है। वास्तविक नीति का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि राष्ट्रपति ट्रंप इस कानून के तहत मिलने वाली शक्तियों का इस्तेमाल किस तरह करते हैं।
क्या भारत पर तुरंत लगेगा 100 प्रतिशत टैरिफ?
यह इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। फिलहाल इसका जवाब है, नहीं।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित विधेयक भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ नहीं लगाता। इसके बजाय यह राष्ट्रपति को रूस से तेल या गैस खरीदने वाले कुछ बड़े देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देता है।
विधेयक में रूस के तेल और गैस के पांच सबसे बड़े आयातकों को निशाना बनाने की व्यवस्था का उल्लेख है। इसके तहत राष्ट्रपति संबंधित देशों के अमेरिकी आयात पर भारी टैरिफ लगा सकते हैं। अधिकतम दर 100 प्रतिशत तक जा सकती है। कुछ परिस्थितियों में उन देशों को अपवाद मिल सकता है जो रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं।
इसका अर्थ यह है कि भारत के लिए खतरा संभावित है, लेकिन अभी इसे लागू हो चुका टैरिफ कहना सही नहीं होगा।
बिल को अब राष्ट्रपति ट्रंप की मंजूरी की जरूरत है। इसके बाद भी टैरिफ कब, किन देशों पर और किस दर से लगाया जाएगा, यह अमेरिकी प्रशासन के फैसले पर निर्भर करेगा।
भारत रूस से तेल क्यों खरीदता है?
भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में शामिल है। देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदता है। रूस से मिलने वाला तेल भी इस मिश्रण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूसी ऊर्जा पर कई तरह के प्रतिबंध और सीमाएं लगाए जाने के बाद वैश्विक तेल व्यापार का स्वरूप बदला। इस दौरान रूसी तेल की खरीद के लिए कुछ नए बाजार विकसित हुए और भारत प्रमुख खरीदारों में शामिल रहा।
भारत का तर्क रहा है कि इतनी बड़ी आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा की सुरक्षित, स्थिर और किफायती आपूर्ति जरूरी है। नई दिल्ली यह भी कहती रही है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को एक ही देश पर निर्भर नहीं रखती, बल्कि अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदती है।
17 सितंबर को भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी विधेयक पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विविध स्रोतों से खरीद जारी रखेगा और बदलती बाजार परिस्थितियों के अनुसार फैसले करेगा।
भारत का अमेरिका को जवाब क्या है?
अमेरिकी संसद में बिल पारित होने के बाद भारत ने स्पष्ट किया कि वह अपनी ऊर्जा और आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर निर्णय लेगा।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की है और द्विपक्षीय संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर संभावित प्रभावों को लेकर अपनी चिंताएं स्पष्ट रूप से रखी हैं।
भारत ने यह भी कहा कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। सरकार भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर इस घटनाक्रम से पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपटने की दिशा में काम करेगी।
इस बयान से संकेत मिलता है कि भारत अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी ऊर्जा नीति को अपनी आर्थिक जरूरतों के आधार पर तय करना चाहता है।
अमेरिका की चिंता क्या है?
अमेरिका और उसके सहयोगी देश रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए उसकी ऊर्जा आय को सीमित करना चाहते हैं। रूस तेल और गैस के बड़े निर्यातकों में शामिल है और ऊर्जा से मिलने वाला राजस्व उसकी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि यदि भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार रूसी ऊर्जा की खरीद जारी रखते हैं तो रूस को तेल बेचने से होने वाली आय मिलती रहेगी।
इसी वजह से नए कानून में केवल रूस को सीधे निशाना बनाने के बजाय उन देशों पर भी आर्थिक दबाव डालने का रास्ता बनाया गया है जो रूसी तेल या गैस खरीदते हैं।
सीनेटर ब्लूमेंथल ने पहले भी इस कानून का समर्थन करते हुए कहा था कि रूस की ऊर्जा खरीद को कम करना मॉस्को पर दबाव बढ़ाने का एक तरीका है। उनके कार्यालय की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, विधेयक का उद्देश्य रूस के तेल और गैस से जुड़े खरीदारों पर आर्थिक दबाव डालना और रूस की ऊर्जा आय को प्रभावित करना है।
चीन भी निशाने पर
अमेरिकी कदम का असर केवल भारत पर नहीं है। चीन भी रूस से ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों में शामिल है और इसलिए नए कानून के दायरे में आ सकता है।
अमेरिकी सांसदों के बयानों में भारत और चीन दोनों का उल्लेख किया गया है। ब्लूमेंथल ने दोनों देशों से रूस से तेल और गैस खरीदने के बजाय अन्य स्रोतों की ओर जाने को कहा।
इस तरह अमेरिकी कानून का एक प्रमुख लक्ष्य रूस के बड़े ऊर्जा खरीदारों पर दबाव बनाना है। हालांकि, चीन और भारत की ऊर्जा जरूरतें, व्यापारिक संबंध और रूस के साथ उनके अलग-अलग आर्थिक रिश्ते हैं। इसलिए दोनों देशों पर इस कानून का वास्तविक प्रभाव अलग हो सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर भी असर
रूस से तेल खरीदने का मुद्दा भारत और अमेरिका के बीच केवल ऊर्जा संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका असर दोनों देशों के व्यापक व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर पहले से बातचीत चल रही है। नए अमेरिकी कानून में भारत पर संभावित अतिरिक्त टैरिफ का प्रावधान इस वार्ता को और जटिल बना सकता है।
भारतीय विश्लेषकों ने आशंका जताई है कि अगर अमेरिकी प्रशासन रूसी तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त टैरिफ लागू करता है तो दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत प्रभावित हो सकती है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पक्ष को आशंका है कि इस तरह के टैरिफ से द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है और भारत की ऊर्जा लागत भी बढ़ सकती है।
भारत के लिए तेल महंगा होने का खतरा
अगर रूस से मिलने वाले कच्चे तेल पर भारत की खरीद में बड़ी कमी आती है, तो भारत को अन्य देशों से अतिरिक्त तेल खरीदना पड़ सकता है। इसका असर कीमतों पर निर्भर करेगा।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह ऊर्जा की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करते हुए कीमतों को भी नियंत्रित रखे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कई कारकों से प्रभावित होती हैं, जिनमें युद्ध, उत्पादन, समुद्री परिवहन, प्रतिबंध और मांग शामिल हैं।
Reuters के अनुसार, भारतीय रिफाइनरों ने अमेरिकी टैरिफ की संभावना को लेकर चिंता जताई है और सरकार से संभावित राहत या चरणबद्ध व्यवस्था पर बातचीत करने की अपेक्षा की है। कुछ रिफाइनिंग सूत्रों ने आशंका जताई कि रूस से आपूर्ति कम होने पर लागत बढ़ सकती है।
क्या भारत के पास दूसरे विकल्प हैं?
भारत के पास ऊर्जा आयात के कई स्रोत हैं। भारत पहले से ही अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदता है। इसलिए सिद्धांत रूप से रूसी तेल की हिस्सेदारी को दूसरे स्रोतों से बदला जा सकता है।
लेकिन किसी बड़े तेल खरीदार के लिए सप्लाई बदलना केवल राजनीतिक निर्णय नहीं होता। इसमें कीमत, उपलब्धता, गुणवत्ता, रिफाइनरी की तकनीकी जरूरत, समुद्री परिवहन और भुगतान व्यवस्था जैसे कई पहलू शामिल होते हैं।
रूसी तेल का विकल्प उपलब्ध होना और उसे उसी कीमत तथा शर्तों पर उपलब्ध कराना दो अलग बातें हैं। यही कारण है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा को लेकर विविध स्रोतों की नीति पर जोर देता है।
रूस पर प्रतिबंधों का बड़ा पैकेज
नया अमेरिकी कानून केवल तेल खरीदने वाले देशों से जुड़ा नहीं है। इसमें रूसी अधिकारियों, बैंकों और रूस की ऊर्जा आपूर्ति में मदद करने वाले कथित ‘शैडो फ्लीट’ के टैंकरों पर भी प्रतिबंधों का प्रावधान है।
शैडो फ्लीट शब्द का इस्तेमाल उन जहाजों के नेटवर्क के लिए किया जाता है जिन पर रूस की तेल आपूर्ति और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने के आरोप लगते रहे हैं।
अमेरिकी कानून का उद्देश्य रूस के वित्तीय और ऊर्जा नेटवर्क पर दबाव बढ़ाना है। इसके साथ ईरान से जुड़े कुछ प्रतिबंध प्रावधान भी कानून में शामिल हैं।
सीनेट से पहले ही मिल चुकी है मंजूरी
यह विधेयक केवल हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में ही आगे नहीं बढ़ा है। अमेरिकी सीनेट ने अगस्त 2026 में इसे भारी बहुमत से मंजूरी दी थी।
सीनेट में बिल के पक्ष में 86 और विरोध में 11 वोट पड़े थे। इसके बाद प्रतिनिधि सभा की मंजूरी के साथ कानून बनने की प्रक्रिया का अगला महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रपति की स्वीकृति है।
यानी अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से विधेयक पारित हो चुका है। अब इसकी दिशा राष्ट्रपति ट्रंप के निर्णय पर निर्भर है।
भारत के लिए अभी सबसे बड़ा सवाल क्या?
भारत के सामने फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका नए कानून के तहत मिलने वाली शक्ति का इस्तेमाल किस तरह करता है।
अगर राष्ट्रपति ट्रंप टैरिफ नहीं लगाते या भारत को किसी तरह की छूट मिलती है तो प्रभाव सीमित रह सकता है। अगर भारत पर भारी अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार, ऊर्जा खरीद और दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ता पर पड़ सकता है।
इसीलिए भारतीय सरकार फिलहाल घटनाक्रम पर नजर रख रही है और अमेरिकी पक्ष के साथ बातचीत जारी रखने की कोशिश कर रही है। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि भारत अपने आर्थिक और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।
अमेरिकी बयान और आधिकारिक नीति में फर्क समझना जरूरी
रिचर्ड ब्लूमेंथल की टिप्पणी ने इस मामले को राजनीतिक रूप से काफी चर्चा में ला दिया है, लेकिन उनके बयान और अमेरिकी कानून के बीच अंतर समझना जरूरी है।
ब्लूमेंथल ने भारत और चीन से रूस का तेल खरीदना बंद करने या दूसरे स्रोतों से खरीदने को कहा है। यह उनका सार्वजनिक राजनीतिक बयान है।
दूसरी तरफ, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित कानून राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में रूस के बड़े ऊर्जा खरीदारों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की शक्ति देता है। यह शक्ति अपने आप लागू नहीं होती।
इसलिए फिलहाल यह कहना सही होगा कि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की संभावना का कानूनी रास्ता खुला है, लेकिन भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुआ है।
आगे क्या होगा?
अब बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा। यदि वह इसे मंजूरी देते हैं, तो अमेरिकी प्रशासन के पास रूस के बड़े ऊर्जा खरीदारों के खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ लगाने की वैधानिक शक्ति होगी।
इसके बाद यह महत्वपूर्ण होगा कि भारत और चीन के लिए अमेरिकी प्रशासन क्या नीति अपनाता है। क्या दोनों देशों को कोई छूट मिलती है, क्या टैरिफ चरणबद्ध तरीके से लागू किए जाते हैं या क्या अमेरिकी प्रशासन सीधे कड़े कदम उठाता है, यह आने वाले फैसलों से स्पष्ट होगा।
भारत की तरफ से फिलहाल ऊर्जा सुरक्षा और विविध स्रोतों से खरीद की नीति पर जोर दिया गया है। नई दिल्ली ने यह भी संकेत दिया है कि वह अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम में रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक ऊर्जा बाजार, भारत की तेल जरूरतें और भारत-अमेरिका व्यापार संबंध एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए रिचर्ड ब्लूमेंथल का बयान केवल रूसी तेल खरीद का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे अमेरिकी प्रतिबंध नीति और भारत की ऊर्जा सुरक्षा के बीच चल रहा व्यापक मतभेद भी दिखाई देता है।
फिलहाल भारत के लिए स्थिति यह है कि अमेरिकी कांग्रेस ने ऐसा कानून पारित कर दिया है जो राष्ट्रपति को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों पर भारी टैरिफ लगाने की शक्ति दे सकता है। भारत ने इसका जवाब अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के संकल्प के साथ दिया है। अब अगला बड़ा कदम व्हाइट हाउस से आने वाला फैसला होगा।