
भारत में स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए पिछले एक दशक में बड़े स्तर पर प्रयास किए गए हैं। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने खासतौर पर कम आय वाले परिवारों और महिलाओं तक LPG कनेक्शन पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जुलाई 2026 तक इस योजना के तहत 10.5 करोड़ से अधिक महिलाओं को डिपॉजिट-फ्री LPG कनेक्शन दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद ग्रामीण भारत की बड़ी आबादी आज भी लकड़ी, उपले और दूसरे ठोस ईंधनों से खाना बना रही है।
ऐसे में एक अहम सवाल उठता है कि अगर घर में LPG कनेक्शन मौजूद है, तो फिर रसोई में लकड़ी का चूल्हा क्यों जल रहा है? Council on Energy, Environment and Water यानी CEEW की नई स्टडी इस सवाल का काफी महत्वपूर्ण जवाब देती है। रिपोर्ट के मुताबिक समस्या सिर्फ LPG कनेक्शन की उपलब्धता की नहीं है, बल्कि नियमित रूप से सिलेंडर भरवाने की क्षमता, डिलीवरी व्यवस्था और स्थानीय परिस्थितियों से भी जुड़ी हुई है।
LPG कनेक्शन है, लेकिन इस्तेमाल पूरी तरह नहीं
CEEW ने छह राज्यों—असम, झारखंड, महाराष्ट्र, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड—के 2,222 ग्रामीण परिवारों से सर्वे के जरिए जानकारी जुटाई। सर्वे नवंबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच किया गया था। इसमें खाना पकाने वाले परिवार के सदस्य से ईंधन के इस्तेमाल और उसकी कीमत को लेकर सवाल किए गए।
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि सर्वे में शामिल 73% ग्रामीण परिवारों ने बताया कि उन्होंने पिछले तीन महीनों में LPG का इस्तेमाल किया था। पहली नजर में यह आंकड़ा बताता है कि LPG की पहुंच काफी बढ़ चुकी है।
लेकिन जब नियमित और पूरी तरह LPG इस्तेमाल की बात आती है तो तस्वीर बदल जाती है। सिर्फ 23% परिवारों ने बताया कि वे खाना पकाने के लिए विशेष रूप से LPG का ही इस्तेमाल करते हैं।
इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में परिवार LPG और दूसरे ईंधनों दोनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसे ‘fuel stacking’ कहा जाता है। यानी घर में LPG मौजूद है, लेकिन हर दिन और हर तरह का खाना LPG पर नहीं पकाया जाता। जरूरत पड़ने पर लकड़ी, उपले या दूसरे ठोस ईंधन का इस्तेमाल भी किया जाता है।
आधे परिवारों के लिए लकड़ी अभी भी प्रमुख ईंधन
CEEW की स्टडी में करीब 50% ग्रामीण परिवारों ने लकड़ी को अपना प्राथमिक खाना पकाने वाला ईंधन बताया। वहीं 48% परिवारों में LPG प्रमुख ईंधन था। यह आंकड़ा बताता है कि ग्रामीण भारत में LPG और पारंपरिक ईंधन अभी भी एक-दूसरे के समानांतर चल रहे हैं।
यानी किसी परिवार के पास LPG कनेक्शन होना इस बात की गारंटी नहीं है कि वहां लकड़ी का चूल्हा पूरी तरह बंद हो गया है।
कई ग्रामीण परिवार खास मौकों पर या कुछ खास तरह के खाना पकाने के लिए लकड़ी के चूल्हे का इस्तेमाल करते हैं। इसके पीछे आर्थिक कारण भी हो सकता है और आदत या स्थानीय संस्कृति भी। CEEW के अनुसार गैर-LPG उपयोगकर्ताओं में लागत सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रही। इसके अलावा लकड़ी की आसानी से उपलब्धता और पारंपरिक चूल्हे पर पकाए गए भोजन को लेकर पसंद भी भूमिका निभाती है।
सबसे बड़ी समस्या है LPG का रीफिल
LPG कनेक्शन लेने के समय एक बार की लागत और सिलेंडर को बार-बार भरवाने की लागत में बड़ा अंतर है। कनेक्शन मिलने के बाद भी परिवार को हर बार सिलेंडर खत्म होने पर पैसे खर्च करने पड़ते हैं।
यही लगातार होने वाला खर्च गरीब और निम्न आय वाले परिवारों के लिए मुश्किल बन सकता है।
CEEW की रिपोर्ट के अनुसार LPG का इस्तेमाल लंबे समय तक जारी रखने में सबसे बड़ी बाधाओं में रीफिल की कीमत शामिल है। पहले किए गए CEEW के सर्वे का हवाला देते हुए रिपोर्ट बताती है कि गैर-विशेष LPG उपयोगकर्ताओं में 78% ने LPG की लागत को नियमित इस्तेमाल में बड़ी बाधा माना था।
ग्रामीण परिवारों के लिए यह समस्या इसलिए भी बड़ी है क्योंकि LPG सिलेंडर के लिए एक साथ अपेक्षाकृत बड़ी रकम जुटानी पड़ती है। दूसरी तरफ लकड़ी कई जगहों पर आसपास ही उपलब्ध हो जाती है और उसके लिए तत्काल नकद भुगतान की जरूरत नहीं पड़ती।
इसलिए अगर किसी परिवार के पास सीमित पैसे हैं और उसे सिलेंडर भरवाने या घर की दूसरी जरूरी जरूरतों में से किसी एक को चुनना हो, तो वह LPG का इस्तेमाल कम कर सकता है।
400 रुपये का सिलेंडर मिले तो क्या बदलेगा?
CEEW के सर्वे में LPG की कीमत और परिवारों की भुगतान करने की इच्छा के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आया।
सर्वे में कम से कम 80% प्रतिभागियों ने कहा कि अगर 14.2 किलोग्राम LPG सिलेंडर का रीफिल लगभग 400 रुपये में उपलब्ध हो, तो वे खाना पकाने के लिए केवल LPG इस्तेमाल करने की ओर बढ़ेंगे। तीनों अध्ययन समूहों में लोगों की औसत या मध्य भुगतान इच्छा करीब 500 रुपये रही।
यह आंकड़ा बताता है कि बहुत से परिवार LPG का इस्तेमाल करना चाहते हैं, लेकिन कीमत उनके लिए निर्णायक बाधा है।
CEEW के अध्ययन में जुलाई 2026 के संदर्भ में PMUY के लिए प्रभावी सब्सिडी वाली कीमत 642 रुपये बताई गई है। यानी सर्वे में सामने आया 400 रुपये का स्तर मौजूदा प्रभावी कीमत से काफी नीचे है। CEEW ने इसी अंतर को कम करने के लिए PMUY सिलेंडर पर लगभग 200 रुपये अतिरिक्त सब्सिडी की जरूरत का सुझाव दिया है।
हालांकि यहां यह समझना भी जरूरी है कि यह लोगों द्वारा सर्वे में बताई गई भुगतान करने की इच्छा है। इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि वास्तविक बाजार परिस्थितियों में हर परिवार सचमुच उसी कीमत पर तुरंत अपना व्यवहार बदल देगा। CEEW ने भी इस सीमा को स्पष्ट किया है।
सिलेंडर गांव तक पहुंचना भी बड़ी चुनौती
सिर्फ सिलेंडर की कीमत ही समस्या नहीं है। अगर LPG सिलेंडर समय पर उपलब्ध ही न हो तो परिवार को वैकल्पिक ईंधन की जरूरत पड़ेगी।
CEEW के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में LPG इस्तेमाल करने वाले परिवारों में सिर्फ 47% को घर तक सिलेंडर की डिलीवरी मिलती है। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में लोगों को सिलेंडर लेने के लिए खुद व्यवस्था करनी पड़ सकती है।
दूरदराज के गांवों में गैस एजेंसी तक पहुंचने के लिए परिवहन का खर्च और समय भी जुड़ सकता है। अगर परिवार के किसी सदस्य को सिलेंडर लेने के लिए काफी दूर जाना पड़े, तो LPG की वास्तविक लागत सिर्फ सिलेंडर की कीमत तक सीमित नहीं रहती।
यही वजह है कि CEEW ने ग्रामीण क्षेत्रों में LPG की नियमित डिलीवरी को भी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।
लकड़ी क्यों बनी हुई है आसान विकल्प?
ग्रामीण भारत के कई हिस्सों में लकड़ी आज भी स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध हो सकती है। कई परिवार इसे खुद इकट्ठा करते हैं या स्थानीय स्रोतों से प्राप्त करते हैं। ऐसे में इसके लिए LPG सिलेंडर की तरह एक साथ बड़ी रकम खर्च नहीं करनी पड़ती।
यहीं LPG और लकड़ी के बीच आर्थिक अंतर दिखाई देता है।
LPG साफ और सुविधाजनक ईंधन है, लेकिन उसका हर रीफिल नकद खर्च मांगता है। दूसरी ओर, लकड़ी स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिहाज से अधिक प्रदूषण पैदा कर सकती है, लेकिन कई परिवारों के लिए उसका तत्काल आर्थिक बोझ कम महसूस होता है।
यानी यह केवल ‘लोग LPG क्यों नहीं चुन रहे’ का सवाल नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या साफ ईंधन गरीब परिवार के लिए हर महीने लगातार वहन करने लायक है।
चूल्हे पर खाना पकाने की आदत भी एक वजह
CEEW की स्टडी ने यह भी संकेत दिया कि आर्थिक कारणों के अलावा व्यवहार और पसंद भी भूमिका निभाते हैं।
कुछ परिवारों में लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। कुछ लोग मानते हैं कि लकड़ी के चूल्हे पर पकाए गए खाने का स्वाद अलग होता है। कुछ खास व्यंजन भी पारंपरिक चूल्हे पर बनाए जाते हैं।
इसलिए LPG कनेक्शन देने से केवल ईंधन की उपलब्धता की समस्या हल होती है। व्यवहार बदलने के लिए लगातार जागरूकता, सुविधा और आर्थिक प्रोत्साहन की भी जरूरत पड़ सकती है।
अगर LPG महंगी है या सिलेंडर समय पर नहीं पहुंचता, तो परिवार के पास पारंपरिक चूल्हे पर वापस जाने का विकल्प मौजूद रहता है।
उज्ज्वला योजना की सफलता को कैसे देखना चाहिए?
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने भारत में LPG कनेक्शन के विस्तार को तेज किया है। इसका एक बड़ा फायदा यह हुआ कि बड़ी संख्या में कम आय वाले परिवारों को औपचारिक LPG कनेक्शन मिला। जुलाई 2026 तक योजना के तहत 105 मिलियन से ज्यादा महिलाओं को कनेक्शन दिए जाने की जानकारी CEEW ने दी है।
लेकिन CEEW का अध्ययन यह बताता है कि अब नीति का अगला चरण केवल कनेक्शन की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकता।
किसी परिवार के पास कनेक्शन है या नहीं, यह ‘access’ बताता है। लेकिन वह परिवार हर महीने LPG पर खाना पकाता है या नहीं, यह ‘sustained use’ यानी निरंतर इस्तेमाल बताता है।
यही दोनों चीजें अलग-अलग हैं।
अगर कनेक्शन तो मिल गया, लेकिन सिलेंडर दोबारा भरवाना महंगा है, तो परिवार कनेक्शन रखने के बावजूद लकड़ी का इस्तेमाल जारी रख सकता है।
एक परिवार को साल में कितने सिलेंडर चाहिए?
CEEW की रिपोर्ट के अनुसार PMUY लाभार्थी औसतन करीब 4.8 सिलेंडर प्रति वर्ष इस्तेमाल करते हैं, जबकि किसी सामान्य परिवार को पूरी तरह LPG पर निर्भर रहने के लिए लगभग 7 से 8 14.2 किलोग्राम सिलेंडरों की जरूरत हो सकती है।
यह अंतर भी बताता है कि कनेक्शन और वास्तविक इस्तेमाल में कितना बड़ा गैप है।
यदि किसी परिवार के पास साल भर में चार-पांच सिलेंडर ही आते हैं, तो बाकी समय खाना पकाने के लिए उसे दूसरे ईंधन की जरूरत पड़ सकती है। खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां परिवार बड़ा हो सकता है और खाना दिन में कई बार बनता है, वहां LPG की खपत अधिक हो सकती है।
इसलिए केवल कनेक्शनों की संख्या देखकर स्वच्छ ईंधन की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल है।
इसका असर स्वास्थ्य पर भी पड़ता है
लकड़ी, उपले और अन्य ठोस ईंधनों को जलाने से घर के अंदर धुआं और सूक्ष्म कण पैदा हो सकते हैं। लंबे समय तक ऐसे धुएं के संपर्क में रहना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
खाना बनाने की जिम्मेदारी पारंपरिक रूप से महिलाओं पर अधिक होने के कारण कई ग्रामीण महिलाओं का ऐसे धुएं से संपर्क भी ज्यादा हो सकता है। इसलिए स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन सिर्फ सुविधा या ऊर्जा नीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा है।
CEEW ने भी स्वच्छ हवा और खाना पकाने के तरीके के बीच संबंध पर जोर दिया है। संस्था के अनुसार अगर परिवार नियमित रूप से साफ ईंधन का इस्तेमाल नहीं कर पाते, तो वे प्रदूषण पैदा करने वाले ईंधनों के संपर्क में बने रहते हैं।
समाधान सिर्फ सब्सिडी नहीं, पूरी व्यवस्था में बदलाव
CEEW की स्टडी से यह स्पष्ट होता है कि ग्रामीण रसोई को पूरी तरह LPG आधारित बनाने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा।
पहला मुद्दा कीमत का है। अगर रीफिल गरीब परिवार की आय के मुकाबले बहुत महंगा है, तो वह नियमित इस्तेमाल नहीं कर पाएगा।
दूसरा मुद्दा डिलीवरी का है। दूरदराज के परिवारों तक सिलेंडर आसानी से और समय पर पहुंचना चाहिए।
तीसरा मुद्दा व्यवहार का है। लोगों को LPG के नियमित इस्तेमाल के स्वास्थ्य और सुविधा संबंधी फायदे समझाने होंगे।
चौथा मुद्दा यह है कि नीति में सिर्फ कनेक्शन संख्या को सफलता का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि परिवार साल में कितनी बार LPG रीफिल करा रहा है और क्या वह वास्तव में दूसरे प्रदूषणकारी ईंधनों पर निर्भरता कम कर रहा है।
CEEW ने ग्रामीण क्षेत्रों में दूरदराज और कम मात्रा वाले ग्राहकों तक डिलीवरी करने वाले वितरकों के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन या अलग कमीशन मॉडल पर भी विचार करने की बात कही है। इससे ग्रामीण डिलीवरी नेटवर्क मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
आखिर ग्रामीण रसोई में चूल्हा क्यों जल रहा है?
इस सवाल का जवाब एक शब्द में नहीं दिया जा सकता।
चूल्हा इसलिए जल रहा है क्योंकि LPG कनेक्शन मिलने के बाद भी उसका नियमित इस्तेमाल हर परिवार के लिए आर्थिक रूप से आसान नहीं है। कई जगहों पर सिलेंडर की डिलीवरी भी चुनौती है। दूसरी तरफ लकड़ी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो सकती है और कई परिवारों के लिए उसका तत्काल नकद खर्च कम होता है।
यानी समस्या LPG की पहुंच की तुलना में उसकी ‘सतत पहुंच और उपयोग’ की है।
CEEW के आंकड़े इस अंतर को साफ तौर पर दिखाते हैं—73% ग्रामीण परिवारों ने हाल के महीनों में LPG इस्तेमाल किया, लेकिन सिर्फ 23% पूरी तरह LPG पर निर्भर थे। करीब आधे परिवारों के लिए लकड़ी अभी भी प्रमुख ईंधन बनी हुई है।
इससे साफ है कि भारत की स्वच्छ रसोई की अगली चुनौती नए कनेक्शन बांटना भर नहीं है। अब असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि जिन परिवारों के पास LPG कनेक्शन है, वे उसे नियमित रूप से भरवा भी सकें और लगातार इस्तेमाल भी कर सकें।
अगर सिलेंडर की कीमत परिवार की क्षमता के भीतर लाई जाती है, डिलीवरी गांव के दरवाजे तक आसान होती है और लोगों को पारंपरिक ईंधन के स्वास्थ्य नुकसान के बारे में लगातार जागरूक किया जाता है, तभी ग्रामीण रसोई में LPG का इस्तेमाल वास्तव में स्थायी रूप से बढ़ सकता है।
इसलिए CEEW की स्टडी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि ‘कनेक्शन’ स्वच्छ ईंधन की यात्रा का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। ग्रामीण भारत की रसोई को धुएं से मुक्त करने के लिए LPG का सस्ता, भरोसेमंद और नियमित इस्तेमाल सुनिश्चित करना उतना ही जरूरी है जितना कि हर घर तक कनेक्शन पहुंचाना।