
मध्य प्रदेश के सतना संभाग में आयोजित एक प्रशासनिक बैठक के दौरान स्वास्थ्य जागरूकता से जुड़ा एक अनोखा घटनाक्रम देखने को मिला। बैठक के दौरान कई अधिकारियों को बार-बार वॉशरूम जाते देखकर संभागायुक्त (कमिश्नर) शैलेंद्र सिंह को संदेह हुआ कि कहीं यह मधुमेह (डायबिटीज) का संकेत तो नहीं है। इसके बाद उन्होंने तत्काल स्वास्थ्य विभाग की टीम को बुलाकर बैठक में मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों का मौके पर ही ब्लड शुगर परीक्षण कराने के निर्देश दिए। जांच के दौरान 16 अधिकारियों और कर्मचारियों के ब्लड शुगर स्तर सामान्य से अधिक पाए गए, जिसके बाद उन्हें विस्तृत चिकित्सकीय जांच कराने और नियमित उपचार शुरू करने की सलाह दी गई।
जानकारी के अनुसार, यह घटना मैहर जिले के कलेक्ट्रेट कार्यालय में आयोजित एक समीक्षा बैठक के दौरान हुई। बैठक के बीच कमिश्नर शैलेंद्र सिंह ने देखा कि कई अधिकारी थोड़े-थोड़े अंतराल पर वॉशरूम जा रहे हैं। चिकित्सकीय जानकारी के आधार पर उन्होंने इसे मधुमेह के संभावित लक्षणों में से एक माना और बिना देर किए स्वास्थ्य विभाग से तत्काल जांच दल बुलाने के निर्देश दिए। कुछ ही देर में मेडिकल टीम आवश्यक उपकरणों के साथ बैठक स्थल पर पहुंची और उपस्थित अधिकारियों तथा कर्मचारियों की रैंडम ब्लड शुगर जांच शुरू की।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए गए परीक्षण में कुल 16 अधिकारियों और कर्मचारियों का ब्लड शुगर स्तर सामान्य सीमा से अधिक पाया गया। हालांकि इनमें से सभी को मधुमेह का रोगी घोषित नहीं किया गया है। चिकित्सकों ने स्पष्ट किया कि प्रारंभिक स्क्रीनिंग केवल संभावित जोखिम का संकेत देती है। अंतिम पुष्टि के लिए फास्टिंग ब्लड शुगर, पोस्ट प्रांडियल (PP), HbA1c और अन्य आवश्यक जांच कराना जरूरी होगा। जिन लोगों की रिपोर्ट सामान्य से अधिक आई, उन्हें जल्द से जल्द विस्तृत जांच कराने और चिकित्सकीय परामर्श लेने की सलाह दी गई।
कमिश्नर शैलेंद्र सिंह ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारी अक्सर अत्यधिक कार्यभार, अनियमित दिनचर्या, तनाव, लंबे समय तक बैठकर काम करने और असंतुलित खानपान के कारण अपने स्वास्थ्य की अनदेखी कर देते हैं। उन्होंने कहा कि समय रहते बीमारी का पता चल जाए तो उसका प्रभावी उपचार संभव है। उनका उद्देश्य किसी कर्मचारी की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि सभी को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना था। उन्होंने अधिकारियों से नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराने, संतुलित आहार अपनाने और शारीरिक गतिविधि बढ़ाने की अपील भी की।
चिकित्सकों के अनुसार, बार-बार पेशाब आना, अत्यधिक प्यास लगना, लगातार थकान महसूस होना, वजन में अचानक बदलाव और धुंधला दिखाई देना मधुमेह के सामान्य लक्षण हो सकते हैं। हालांकि केवल इन लक्षणों के आधार पर किसी व्यक्ति को मधुमेह का रोगी नहीं माना जा सकता। इसकी पुष्टि केवल चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही की जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय पर मधुमेह का पता चल जाए और जीवनशैली में सुधार किया जाए, तो बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी कार्यालयों, निजी संस्थानों और बड़े कार्यस्थलों पर समय-समय पर स्वास्थ्य जांच शिविर आयोजित करना लाभदायक हो सकता है। इससे कर्मचारियों में मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य गैर-संचारी रोगों की शुरुआती पहचान संभव होती है। प्रारंभिक अवस्था में बीमारी का पता चलने पर उपचार अपेक्षाकृत आसान होता है और गंभीर जटिलताओं की संभावना भी कम हो जाती है।
इस पहल की कई अधिकारियों और कर्मचारियों ने सराहना भी की। उनका कहना था कि व्यस्त कार्यशैली के कारण वे नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं करा पाते और इस तरह की पहल उन्हें अपनी स्वास्थ्य स्थिति जानने का अवसर देती है। वहीं स्वास्थ्य विभाग ने भी भविष्य में सरकारी कार्यालयों में नियमित स्वास्थ्य जांच शिविर आयोजित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
फिलहाल जिन 16 अधिकारियों और कर्मचारियों की प्रारंभिक रिपोर्ट में ब्लड शुगर का स्तर अधिक पाया गया है, उन्हें विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण कराने और विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेने की सलाह दी गई है। प्रशासन का कहना है कि यह पहल किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई का हिस्सा नहीं, बल्कि कर्मचारियों के स्वास्थ्य संरक्षण और जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से की गई थी। यह घटना इस बात का भी संदेश देती है कि व्यस्त जीवनशैली के बीच नियमित स्वास्थ्य जांच और समय पर चिकित्सकीय परामर्श गंभीर बीमारियों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।