
बॉलीवुड में लंबे समय तक टिके रिश्ते आज के दौर में किसी मिसाल से कम नहीं माने जाते हैं। चकाचौंध, शोहरत और लगातार बदलती प्राथमिकताओं के बीच अगर कोई शादी दशकों तक मजबूती से खड़ी रहे, तो उसके पीछे सिर्फ प्यार ही नहीं बल्कि समझ, त्याग और सही सलाह भी अहम भूमिका निभाती है। अभिनेता गोविंदा और उनकी पत्नी सुनीता आहूजा की शादी भी ऐसी ही मिसालों में गिनी जाती है। हाल ही में सुनीता आहूजा ने अपनी निजी जिंदगी से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा साझा किया, जिसमें उन्होंने बताया कि उनकी सास निर्मला देवी की सीख ने उनकी शादी को कैसे मजबूत बनाया।
सुनीता आहूजा ने खुलकर स्वीकार किया कि शादी के शुरुआती साल उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं थे। गोविंदा उस दौर में करियर की ऊंचाइयों पर थे, काम का दबाव था, फैंस की भीड़ थी और समय की कमी हमेशा बनी रहती थी। ऐसे माहौल में एक नई-नवेली बहू के लिए खुद को ढालना चुनौतीपूर्ण था। सुनीता का कहना है कि उस वक्त उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि एक सुपरस्टार की पत्नी होने के साथ-साथ परिवार की जिम्मेदारियों को कैसे संतुलित किया जाए।
इसी दौर में उनकी सास निर्मला देवी ने उन्हें एक ऐसी सलाह दी, जो आज भी उनके दिल के बेहद करीब है। सास ने उनसे कहा था—“खाना बनाओ, सास को प्यार करो, घर को संभालो… गोविंदा अपने आप खुश रहेगा।” सुनने में यह सलाह साधारण लग सकती है, लेकिन इसके पीछे रिश्तों की गहरी समझ छिपी हुई थी। यह बात सुनीता को धीरे-धीरे समझ में आई कि पति की खुशी सिर्फ बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि घर के माहौल से भी जुड़ी होती है।
सुनीता आहूजा ने बताया कि उस सलाह ने उनकी सोच बदल दी। उन्होंने यह महसूस किया कि शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं होती, बल्कि दो परिवारों का मेल होती है। सास के साथ रिश्ते को मजबूत करना, घर की जिम्मेदारियों को अपनाना और पति के कामकाजी तनाव को समझना—इन सबने उनके वैवाहिक जीवन को स्थिरता दी।
उन्होंने यह भी कहा कि गोविंदा जितने हंसमुख और मस्तीभरे पर्दे पर दिखते हैं, निजी जिंदगी में उतने ही भावुक और परिवार से जुड़े इंसान हैं। अगर घर का माहौल शांत और प्यार भरा हो, तो वह खुद को ज्यादा सुरक्षित और खुश महसूस करते हैं। यही वजह है कि सुनीता ने धीरे-धीरे घर और परिवार को अपनी प्राथमिकता बनाना शुरू किया।
सुनीता के मुताबिक, सास निर्मला देवी सिर्फ एक पारिवारिक मार्गदर्शक नहीं थीं, बल्कि उनके लिए भावनात्मक सहारा भी बनीं। जब भी सुनीता को किसी बात को लेकर उलझन होती, वह सास से खुलकर बात कर पाती थीं। यही संवाद और भरोसा उनके रिश्ते की नींव बना। उन्होंने माना कि आज के दौर में सास-बहू के रिश्ते को अक्सर नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है, लेकिन उनके अनुभव बिल्कुल अलग रहे।
इस बातचीत में सुनीता ने यह भी कहा कि शादी में समझौता कोई कमजोरी नहीं होती। कई बार महिलाओं को लगता है कि समझौता करना अपने सपनों से समझौता करना है, लेकिन सही संतुलन बनाना ही असली समझदारी है। उन्होंने माना कि करियर, पहचान और आत्मसम्मान जरूरी हैं, लेकिन परिवार की भावनाओं को समझना भी उतना ही अहम है।
गोविंदा और सुनीता की शादी लंबे समय तक मीडिया की नजरों से दूर रही। एक समय ऐसा भी था जब गोविंदा ने अपनी शादी को सार्वजनिक नहीं किया था। उस दौर में सुनीता को कई तरह की भावनात्मक चुनौतियों से गुजरना पड़ा। लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं खोया। उनका कहना है कि उस समय भी उनकी सास की सीख और परिवार का साथ उनके काम आया।
सुनीता ने यह भी साझा किया कि शादी में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है। गुस्से, मतभेद और गलतफहमियां हर रिश्ते का हिस्सा होती हैं, लेकिन उन्हें कैसे संभाला जाए, यही रिश्ते की उम्र तय करता है। उन्होंने कहा कि अगर घर में बुजुर्गों का अनुभव और सही मार्गदर्शन मिले, तो कई बड़ी समस्याएं खुद-ब-खुद छोटी लगने लगती हैं।
आज जब सुनीता आहूजा अपने वैवाहिक जीवन के अनुभव साझा करती हैं, तो वह इसे किसी “परफेक्ट स्टोरी” के रूप में पेश नहीं करतीं। बल्कि वह इसे सीखों से भरी एक यात्रा मानती हैं। उनका मानना है कि रिश्ते को निभाने के लिए सिर्फ प्यार ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों में भी अपनापन जरूरी होता है—चाहे वह साथ बैठकर खाना खाना हो या परिवार के हर सदस्य को महत्व देना।
कुल मिलाकर, सुनीता आहूजा की यह बात सिर्फ एक स्टार वाइफ की कहानी नहीं है, बल्कि हर उस महिला के लिए एक संदेश है, जो शादी और परिवार के बीच संतुलन तलाश रही है। “खाना बनाओ, सास को प्यार करो” जैसी साधारण दिखने वाली सलाह में दरअसल रिश्तों की गहरी समझ छिपी है। यही समझ गोविंदा और सुनीता की शादी की मजबूती का सबसे बड़ा राज बन गई।