
देश की राजनीति इस समय दो बड़े राज्यों तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल को लेकर बेहद गर्म हो चुकी है। दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद नई सरकार के गठन को लेकर असमंजस और राजनीतिक तनाव की स्थिति बनी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों राज्यों में राज्यपालों की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में आ गई है। तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी TVK सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत से दूर होने के कारण सरकार गठन का मामला अटक गया है। वहीं पश्चिम बंगाल में भी सत्ता परिवर्तन के संकेतों के बीच राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
तमिलनाडु में इस बार विधानसभा चुनाव ने राज्य की दशकों पुरानी राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। पिछले कई वर्षों से DMK और AIADMK के बीच घूमती राजनीति में पहली बार एक नई ताकत के रूप में TVK उभरी। अभिनेता थलपति विजय की पार्टी ने अपने पहले ही चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए 108 सीटें जीत लीं। हालांकि बहुमत के लिए 118 सीटों की जरूरत थी, इसलिए पार्टी स्पष्ट बहुमत से पीछे रह गई।
नतीजों के बाद विजय ने सरकार बनाने का दावा पेश किया। कांग्रेस समेत कुछ दलों ने समर्थन का संकेत भी दिया, लेकिन संख्या अभी भी बहुमत तक नहीं पहुंच पाई। विजय ने राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर से मुलाकात कर सरकार बनाने की अनुमति मांगी, लेकिन राज्यपाल ने स्पष्ट समर्थन पत्रों की मांग करते हुए उन्हें दोबारा बहुमत साबित करने के लिए कहा। यही फैसला अब पूरे विवाद की जड़ बन गया है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सबसे बड़ी पार्टी को पहले सरकार बनाने का मौका देने की परंपरा रही है। कई मामलों में राज्यपालों ने बहुमत से दूर होने के बावजूद सबसे बड़े दल को आमंत्रित किया है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों में ऐसे उदाहरण पहले सामने आ चुके हैं। वहां फ्लोर टेस्ट के जरिए बहुमत साबित करने का मौका दिया गया था।
तमिलनाडु में भी विपक्षी दल और कई संवैधानिक विशेषज्ञ यही मांग कर रहे हैं कि विजय को विधानसभा में बहुमत साबित करने का अवसर मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में असली शक्ति सदन के भीतर तय होती है, न कि राजभवन में। फ्लोर टेस्ट ही यह तय करता है कि किसके पास बहुमत है।
दूसरी ओर राज्यपाल के समर्थकों का कहना है कि बिना पर्याप्त संख्या के सरकार बनाने की अनुमति देना राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकता है। उनका मानना है कि यदि कोई दल स्पष्ट बहुमत साबित करने की स्थिति में नहीं है, तो राज्यपाल को सावधानी बरतने का अधिकार है।
तमिलनाडु में राजनीतिक हलचल लगातार बढ़ती जा रही है। विभिन्न दल अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं। रिसॉर्ट पॉलिटिक्स की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। AIADMK और DMK दोनों अपने-अपने स्तर पर नए समीकरण तलाशने में जुटे हैं। वहीं विजय लगातार छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों से समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय का उभार तमिलनाडु की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव का संकेत है। फिल्मों में लोकप्रियता हासिल करने के बाद उन्होंने राजनीति में जिस तरह की एंट्री की है, उसने पारंपरिक दलों को चुनौती दे दी है। युवाओं और शहरी मतदाताओं का बड़ा समर्थन उन्हें मिला है। यही कारण है कि पहली बार चुनाव लड़ने के बावजूद उनकी पार्टी सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई।
वहीं पश्चिम बंगाल में भी हालात कम दिलचस्प नहीं हैं। राज्य में लंबे समय से ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का दबदबा रहा है, लेकिन इस बार चुनाव परिणामों ने सत्ता समीकरण बदल दिए। भाजपा ने राज्य में शानदार प्रदर्शन किया और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई। इसके बाद राज्यपाल आर.एन. रवि की भूमिका अचानक चर्चा में आ गई।
सूत्रों के अनुसार बंगाल में सरकार गठन की प्रक्रिया को लेकर कई संवैधानिक सवाल उठ रहे हैं। ममता बनर्जी ने चुनाव नतीजों और राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर नाराजगी जताई है। वहीं भाजपा सरकार गठन की तैयारी में जुट गई है। ऐसे में राज्यपाल की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों राज्यों में राज्यपालों के सामने अलग-अलग प्रकार की मजबूरियां हैं। तमिलनाडु में राज्यपाल पर सबसे बड़ी पार्टी को मौका देने का दबाव है, जबकि बंगाल में राजनीतिक तनाव और सत्ता परिवर्तन की स्थिति को संभालने की चुनौती है।
भारतीय संविधान में राज्यपाल को कुछ विवेकाधीन अधिकार जरूर दिए गए हैं, लेकिन इन अधिकारों की सीमा हमेशा बहस का विषय रही है। कई बार विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के दबाव में काम करते हैं। हालांकि संवैधानिक पद होने के कारण राज्यपालों से निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है।
तमिलनाडु और बंगाल के मौजूदा घटनाक्रम ने फिर से यह बहस शुरू कर दी है कि आखिर त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल की भूमिका क्या होनी चाहिए। क्या उन्हें सबसे बड़ी पार्टी को मौका देना चाहिए या फिर केवल स्पष्ट बहुमत वाले गठबंधन को ही सरकार बनाने देना चाहिए।
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि बहुमत का परीक्षण सदन में होना चाहिए। इसलिए यदि कोई दल सरकार बनाने का दावा करता है, तो उसे फ्लोर टेस्ट के जरिए अपनी ताकत साबित करने का अवसर मिलना चाहिए।
राजनीतिक जानकार यह भी मानते हैं कि दोनों राज्यों की स्थिति केवल सरकार गठन का मामला नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता की भी परीक्षा है। यदि राज्यपालों के फैसले पक्षपातपूर्ण दिखाई देते हैं, तो इससे राजनीतिक विवाद और बढ़ सकता है।
तमिलनाडु में विजय के समर्थक लगातार यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें सरकार बनाने का मौका दिया जाए। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से ट्रेंड कर रहा है। वहीं बंगाल में भाजपा समर्थक नई सरकार के गठन को लेकर उत्साहित दिखाई दे रहे हैं।
देशभर की नजर अब इन दोनों राज्यों पर टिकी हुई है। आने वाले कुछ दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं। तमिलनाडु में यदि विजय बहुमत जुटाने में सफल हो जाते हैं, तो राज्यपाल पर उन्हें आमंत्रित करने का दबाव और बढ़ जाएगा। वहीं बंगाल में भाजपा सरकार गठन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम आने वाले समय में भारतीय राजनीति की दिशा तय कर सकता है। एक तरफ दक्षिण भारत में नई राजनीतिक ताकत उभर रही है, तो दूसरी तरफ पूर्वी भारत में सत्ता परिवर्तन की तस्वीर दिखाई दे रही है।
फिलहाल दोनों राज्यों में सियासी हलचल चरम पर है। जनता भी यह देखने के लिए उत्सुक है कि आखिर संवैधानिक प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की राजनीति आने वाले दिनों में देश की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी बन सकती है।