
गोरखपुर नगर निगम के गोदाम में बड़ी संख्या में पड़ी अनयूज़्ड हैंडकार्ट्स ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। करीब तीन साल पहले नगर निगम ने लगभग 100 हैंडकार्ट खरीदे थे, जो सफाई व्यवस्था को मज़बूत करने और शहर में कूड़ा प्रबंधन को सुधारने के उद्देश्य से प्रस्तावित किए गए थे। लेकिन इन हैंडकार्ट्स को न तो कभी फील्ड में इस्तेमाल किया गया और न ही किसी सफाई कर्मचारी को सौंपा गया। तीन साल बाद भी यह सारी सामग्री गोदाम में ही पड़ी धूल खा रही है, और अब शहर में इस बात की चर्चा है कि क्या इन्हें बंदरगाह में सड़ने के बजाय कहीं ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे OLX पर बेचने की योजना तो नहीं बन रही।
यह विवाद तब और बढ़ गया जब शहर के कुछ स्थानीय लोगों ने गोदाम के अंदर पड़े इन हैंडकार्ट्स की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। इन तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि हैंडकार्ट्स एकदम नई हैं, उनमें किसी प्रकार का उपयोग का निशान भी नहीं है। इससे नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे—आखिर लाखों रुपये खर्च कर खरीदी गई इस सामग्री को उपयोग में क्यों नहीं लाया गया?
3 साल पहले क्यों खरीदी गई थीं हैंडकार्ट्स?
नगर निगम ने यह हैंडकार्ट्स उस समय खरीदी थीं जब शहर को “स्वच्छ भारत मिशन” की रैंकिंग सुधारने की दिशा में कई कदम उठाए जा रहे थे। सफाईकर्मियों को बेहतर उपकरण देने, कूड़ा ढुलाई को तेज़ और ज़्यादा व्यवस्थित करने, तथा शहर में संकरी गलियों में भी सफाई कार्य को सुचारु रूप से चलाने के उद्देश्य से यह खरीदारी की गई थी। उस समय बताया गया था कि नई हैंडकार्ट्स आने से काम की गति बढ़ेगी और पुरानी खराब गाड़ियों को बदला जा सकेगा।
लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट साबित हुई। न तो यह हैंडकार्ट्स कभी किसी वार्ड में नजर आईं, न ही इन्हें किसी सफाई ठेकेदार को सौंपा गया। सूत्र बताते हैं कि कई बार इस मुद्दे को बैठकों में उठाया गया, लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई या स्पष्ट जवाब नहीं मिला।
गोदाम में क्यों पड़ी रहीं हैंडकार्ट्स?
कई स्थानीय कर्मचारियों का कहना है कि इन हैंडकार्ट्स के वितरण को लेकर अंदरूनी स्तर पर भ्रम बना रहा। कुछ का कहना था कि हैंडकार्ट्स का डिजाइन सफाई कर्मचारियों के लिए सुविधाजनक नहीं है, कुछ ने वजन का मुद्दा उठाया, जबकि कुछ आरोप यह लगाए कि खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं थी, इसलिए इन्हें फील्ड में नहीं भेजा गया।
एक अन्य दावे के अनुसार, नगर निगम ने इन हैंडकार्ट्स के साथ खरीदे गए कवर या डस्टबिन अटैचमेंट नहीं मंगवाए, जिससे यह अधूरी हो गईं और उपयोग योग्य नहीं रहीं। गोदाम के एक स्रोत ने बताया कि कई बार इन्हें बाहर निकालने की योजना बनी, पर हर बार मामला टलता रहा।
स्थानीय जनता में सवाल – ‘क्या इन्हें बेचने की योजना है?’
जब सोशल मीडिया पर फोटो वायरल हुई, तो कई लोग मजाक में पूछने लगे—
“लगता है नगर निगम अब हैंडकार्ट्स को OLX पर बेच देगा।”
“सरकार की संपत्ति का ऐसा उपयोग होगा, यह नहीं सोचा था।”
“सफाई के लिए खरीदा और गोदाम में सड़ने दिया—कितना बड़ा नुकसान है जनता के पैसों का।”
हालांकि यह सिर्फ व्यंग्य था, लेकिन इसने मुद्दे को जनता के बीच केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। कई लोगों ने यह भी सवाल उठाए कि जब शहर की सफाई व्यवस्था हर साल शिकायतों के घेरे में रहती है, तो फिर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग क्यों नहीं किया जाता।
नगर निगम का क्या कहना है?
नगर निगम प्रशासन की ओर से आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन निगम के एक अधिकारी का कहना है कि इन हैंडकार्ट्स को जल्द ही उपयोग में लाने की योजना है और इन्हें वार्डों में वितरित किया जाएगा। कुछ अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों में सफाई व्यवस्था में प्राइवेट एजेंसियों को ठेका दिया गया, जो अपने उपकरण इस्तेमाल करती थीं, इसलिए निगम के अपने उपकरणों की आवश्यकता कम हो गई।
लेकिन यहां यह भी सवाल उठता है—यदि उपकरणों की जरूरत नहीं थी, तो खरीद क्यों की गई? और यदि खरीद की गई थी, तो इनका उपयोग क्यों नहीं हुआ?
जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी?
हैंडकार्ट खरीदने में लाखों रुपये खर्च हुए थे। यह सीधे-सीधे जनता के टैक्स का पैसा था। ऐसे में, यदि यह सामग्री उपयोग में नहीं आती और गोदाम में बेकार पड़ी रहती है, तो यह आर्थिक नुकसान है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि अगर यह उपकरण समय पर इस्तेमाल किए जाते, तो शहर की सफाई व्यवस्था और बेहतर हो सकती थी।
यह मामला केवल गोरखपुर का नहीं, बल्कि पूरे देश में स्थानीय निकायों के भीतरवाले प्रशासनिक ढांचे पर सवाल उठाता है। कई शहरों में ऐसी खरीद के बाद उपयोग न होने के उदाहरण मिलते रहे हैं। इससे व्यवस्था की खामियां उजागर होती हैं और यह संकेत मिलता है कि योजनाओं का क्रियान्वयन आधा-अधूरा है।
लोगों से उठी मांग – जांच होनी चाहिए
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने टिप्पणी की कि इस मामले की जांच होनी चाहिए—
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कब खरीदी गई?
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किस कंपनी से और किस कीमत पर खरीदी गई?
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तीन साल तक वितरण क्यों नहीं हुआ?
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कोई जिम्मेदार अधिकारी क्यों नहीं बताता कि ये बेकार क्यों पड़ी हैं?
कुछ स्थानीय पार्षदों ने भी इस मामले पर सवाल उठाए हैं और उन्होंने नगर निगम से इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।
क्या अब इनका उपयोग होगा?
सूत्रों के मुताबिक, अब जब मामला सामने आ चुका है और चर्चा तेज़ है, नगर निगम इन्हें जल्द ही फील्ड में भेज सकता है। कूड़ा प्रबंधन के तहत कई नए वार्डों में हैंडकार्ट्स की जरूरत बताई जा रही है। संभावना है कि आने वाले दिनों में इन्हें विभिन्न सफाई कर्मचारियों के बीच बांटा जाए।
लेकिन क्या यह केवल विवाद शांत करने के लिए होगा या वास्तव में शहर की सफाई व्यवस्था में सुधार लाएगा—यह देखना दिलचस्प होगा।