मकर संक्रांति की खुशियां मातम में बदलीं, पतंग के धारदार मांझे ने काट दी मासूम की जीवन डोर

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मकर संक्रांति का पर्व आमतौर पर खुशियों, रंग-बिरंगी पतंगों और उत्साह से भरा होता है। यह त्योहार सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक माना जाता है और देश के कई हिस्सों में इसे बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन गुजरात के सूरत शहर में यही खुशियां उस वक्त मातम में बदल गईं, जब पतंग उड़ाने के दौरान इस्तेमाल होने वाले धारदार मांझे ने एक मासूम बच्चे की जान ले ली। यह हादसा न सिर्फ एक परिवार के लिए असहनीय पीड़ा बन गया, बल्कि समाज के लिए भी एक गंभीर चेतावनी साबित हुआ है।

घटना सूरत के जहांगीरपुरा इलाके की बताई जा रही है। मकर संक्रांति के मौके पर इलाके में हर तरफ पतंगें उड़ रही थीं। बच्चे, युवा और बुजुर्ग—सभी त्योहार के रंग में रंगे हुए थे। इसी दौरान एक बच्चा सड़क के किनारे से गुजर रहा था, तभी अचानक पतंग की बेहद धारदार डोर उसके गले में फंस गई। मांझे की धार इतनी तेज थी कि कुछ ही पलों में बच्चे की गर्दन गंभीर रूप से कट गई। आसपास मौजूद लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले ही स्थिति बेहद भयावह हो चुकी थी।

स्थानीय लोगों ने तुरंत बच्चे को अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने बच्चे को मृत घोषित कर दिया। इस दर्दनाक घटना के बाद पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। मकर संक्रांति का त्योहार, जो कुछ देर पहले तक हंसी और उल्लास से भरा था, अचानक सन्नाटे में बदल गया।

इस हादसे का एक सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है, जिसमें पूरी घटना साफ तौर पर दिखाई देती है। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे पतंग की डोर अचानक बच्चे के गले में लिपटती है और कुछ ही सेकंड में हालात बेकाबू हो जाते हैं। यह फुटेज सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों में गुस्सा और चिंता दोनों बढ़ गई हैं।

पतंग उड़ाने में इस्तेमाल होने वाला मांझा पहले भी कई हादसों का कारण बन चुका है। खासतौर पर कांच या केमिकल से लेपित मांझा बेहद खतरनाक माना जाता है। इसकी धार इतनी तेज होती है कि यह न सिर्फ इंसानों बल्कि पक्षियों और जानवरों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती है। इसके बावजूद हर साल मकर संक्रांति के दौरान ऐसे मांझे का इस्तेमाल चोरी-छिपे किया जाता है।

प्रशासन की ओर से हर साल त्योहार से पहले चेतावनी दी जाती है कि धारदार मांझे के इस्तेमाल पर रोक है। कई जगहों पर इसके खिलाफ कार्रवाई भी की जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नियमों का पालन पूरी सख्ती से नहीं हो पाता। सूरत की यह घटना इसी लापरवाही का नतीजा मानी जा रही है।

इस हादसे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या त्योहारों की खुशी इंसानी जान से ज्यादा अहम हो सकती है? एक मासूम की जान जाना यह साबित करता है कि थोड़ी सी लापरवाही कितनी बड़ी त्रासदी में बदल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि पतंग उड़ाना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन खतरनाक मांझे का इस्तेमाल पूरी तरह बंद होना चाहिए।

बच्चे के परिवार के लिए यह नुकसान कभी न भर पाने वाला है। जिन माता-पिता ने त्योहार के दिन खुशी की उम्मीद की थी, उनके लिए यह दिन जिंदगी का सबसे दर्दनाक दिन बन गया। परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है और पूरे मोहल्ले में शोक का माहौल है।

इस घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि पतंग किसने उड़ाई थी और धारदार मांझा कहां से आया। साथ ही, इलाके में मांझा बेचने वालों पर भी नजर रखी जा रही है। प्रशासन का कहना है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सामाजिक संगठनों और आम लोगों ने भी इस घटना के बाद आवाज उठाई है। लोगों का कहना है कि केवल हादसे के बाद कार्रवाई करने से कुछ नहीं होगा। जरूरी है कि त्योहार से पहले ही जागरूकता अभियान चलाए जाएं, ताकि लोग समझ सकें कि खतरनाक मांझा न सिर्फ दूसरों बल्कि उनके अपने परिवार के लिए भी जानलेवा हो सकता है।

हर साल मकर संक्रांति पर इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। सूरत का यह हादसा याद दिलाता है कि अगर समय रहते सख्ती और जागरूकता नहीं लाई गई, तो ऐसी त्रासदियां दोहराती रहेंगी। बच्चों, राहगीरों और जानवरों की सुरक्षा के लिए यह बेहद जरूरी है कि समाज और प्रशासन मिलकर जिम्मेदारी निभाएं।

कुल मिलाकर, मकर संक्रांति की यह घटना सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। पतंगों की खुशी तभी सार्थक है, जब वह किसी की जान न ले। इस हादसे से सीख लेते हुए अगर खतरनाक मांझे पर पूरी तरह रोक लगाई जाए और लोग खुद भी सतर्क रहें, तभी भविष्य में ऐसी दर्दनाक घटनाओं को रोका जा सकता है।

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