बेतिया GMCH में स्ट्रेचर नहीं मिला तो बीमार बेटी को गोद में लेकर भटकती रही मां, वीडियो वायरल होने से उठे सवाल

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बिहार के बेतिया स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (GMCH) से सामने आया एक वीडियो इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो में एक मां अपनी 11 साल की बीमार बेटी को गोद में उठाकर अस्पताल परिसर में इधर-उधर घूमती दिखाई दे रही है। परिवार का आरोप है कि बच्ची को अस्पताल के अंदर इलाज के लिए ले जाने के दौरान उन्हें स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद बच्ची की मां ने उसे अपनी गोद में उठाया और अस्पताल के अलग-अलग हिस्सों में इलाज की तलाश करती रही। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं, मरीजों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं और स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार, वायरल वीडियो में दिखाई दे रही बच्ची की पहचान सयाना खातून के रूप में बताई गई है। वह पश्चिमी चंपारण जिले के चनपटिया थाना क्षेत्र के महना गांव की रहने वाली बताई गई है। बच्ची के पिता का नाम नजीर अंसारी बताया गया है। परिवार के मुताबिक, बच्ची की तबीयत खराब होने के बाद उसे इलाज के लिए बेतिया के GMCH लाया गया था। परिवार को उम्मीद थी कि बड़े सरकारी अस्पताल में पहुंचने के बाद बच्ची को तत्काल चिकित्सकीय सहायता मिलेगी और उसे संबंधित विभाग या डॉक्टर तक पहुंचाने में अस्पताल का स्टाफ मदद करेगा।

लेकिन परिवार की ओर से सामने आए आरोपों के अनुसार, अस्पताल पहुंचने के बाद बच्ची को ले जाने के लिए स्ट्रेचर नहीं मिला। बच्ची की हालत को देखते हुए परिवार के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि उसे अस्पताल के भीतर किस तरह एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाए। इसी स्थिति में उसकी मां ने बच्ची को अपनी गोद में उठा लिया। वीडियो में महिला अपनी बीमार बेटी को लेकर अस्पताल परिसर में चलती हुई दिखाई देती है। इस दृश्य ने सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया और देखते ही देखते वीडियो वायरल हो गया।

इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं पर बहस शुरू कर दी है। अस्पताल में इलाज के लिए डॉक्टर, नर्स, दवाइयां और जांच सुविधाएं जितनी महत्वपूर्ण हैं, उतना ही जरूरी मरीजों को सुरक्षित तरीके से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने की व्यवस्था भी है। गंभीर रूप से बीमार मरीज, छोटे बच्चे, बुजुर्ग या ऐसे लोग जो खुद चलने की स्थिति में नहीं होते, उनके लिए स्ट्रेचर और व्हीलचेयर जैसी सुविधाएं बेहद आवश्यक होती हैं। ऐसे में किसी मां को अपनी बीमार बच्ची को खुद गोद में लेकर अस्पताल में घूमना पड़े तो यह स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय बन जाता है।

हालांकि इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। वीडियो में मां को बच्ची को गोद में लेकर अस्पताल में जाते हुए देखा जा सकता है, लेकिन स्ट्रेचर क्यों नहीं मिला, उस समय कितने स्ट्रेचर उपलब्ध थे, अस्पताल के कर्मचारियों ने क्या कदम उठाया और बच्ची को किस विभाग में ले जाया जा रहा था, इन सभी सवालों का पूरा जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकता है। इसलिए स्ट्रेचर नहीं मिलने के आरोप को फिलहाल परिवार की ओर से लगाए गए आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

अस्पताल प्रशासन ने भी मामले का संज्ञान लिया है। GMCH के अस्पताल अधीक्षक अनिल कुमार ने वायरल वीडियो की जानकारी होने की बात कही है। प्रशासन की ओर से मामले की जांच कराने का आश्वासन दिया गया है। अस्पताल प्रशासन ने कर्मचारियों की कमी को भी ऐसी स्थिति की संभावित वजहों में शामिल बताया है। यदि वास्तव में उस समय पर्याप्त कर्मचारी मौजूद नहीं थे और इसी वजह से बच्ची को सहायता नहीं मिल सकी, तो यह अस्पताल की मानव संसाधन व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा होगा। वहीं यदि जांच में किसी कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय किए जाने की जरूरत होगी।

बेतिया GMCH पश्चिमी चंपारण क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य केंद्र है। आसपास के ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों से बड़ी संख्या में लोग यहां इलाज कराने पहुंचते हैं। सरकारी अस्पताल होने के कारण आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की निर्भरता भी ऐसे संस्थानों पर अधिक रहती है। कई परिवार निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च वहन नहीं कर पाते और इसलिए जिला स्तर के सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों को अपनी पहली प्राथमिकता बनाते हैं। ऐसे में इन अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता का महत्व और बढ़ जाता है।

स्ट्रेचर को अक्सर अस्पताल की सामान्य सुविधा समझा जाता है, लेकिन मरीज की स्थिति को देखते हुए इसका महत्व काफी अधिक हो सकता है। यदि किसी मरीज को तेज दर्द हो, वह बेहोश हो, चलने की स्थिति में न हो या बच्चा गंभीर रूप से बीमार हो, तो उसे गोद में उठाकर ले जाना सुरक्षित तरीका नहीं माना जा सकता। ऐसे मरीजों को उचित सहायता के साथ स्थानांतरित करना जरूरी होता है। इसलिए अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में स्ट्रेचर, व्हीलचेयर और उन्हें संचालित करने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ का होना मरीजों की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है।

इस घटना में सबसे ज्यादा भावुक करने वाला पहलू मां और बेटी की तस्वीर है। एक मां अपनी बीमार बच्ची को गोद में लेकर अस्पताल के अंदर घूमती रही। किसी भी माता-पिता के लिए अपने बच्चे की तबीयत खराब देखना बेहद तनावपूर्ण स्थिति होती है। ऐसी परिस्थिति में परिवार अस्पताल से मदद की उम्मीद करता है। अगर उसे खुद बच्चे को उठाकर अलग-अलग जगह जाना पड़े, तो उसकी परेशानी और मानसिक दबाव और बढ़ सकता है। वायरल वीडियो ने इसी मानवीय पहलू को लोगों के सामने ला दिया।

परिवार के लिए यह स्थिति इसलिए भी कठिन रही होगी क्योंकि अस्पताल पहुंचने के बाद उन्हें इलाज की प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी की जरूरत रही होगी। किसी बड़े अस्पताल में पहली बार आने वाले परिजन कई बार यह नहीं समझ पाते कि किस काउंटर पर जाना है, किस विभाग में मरीज को दिखाना है और जांच या भर्ती की प्रक्रिया क्या है। ऐसी स्थिति में सहायता डेस्क और अस्पताल के कर्मचारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि मरीज बच्चा हो और उसकी हालत खराब हो तो यह सहायता और भी जरूरी हो जाती है।

घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। लोगों ने वीडियो साझा करते हुए अस्पताल प्रशासन से जवाब मांगा और मरीजों के लिए बेहतर सुविधाओं की मांग की। कुछ लोगों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की आलोचना की, जबकि कुछ ने मामले की वास्तविकता सामने आने तक जांच का इंतजार करने की बात कही। सोशल मीडिया की यही दोहरी भूमिका ऐसे मामलों में दिखाई देती है। एक ओर वीडियो किसी समस्या को व्यापक स्तर पर सामने ला सकता है, वहीं दूसरी ओर अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकालने का जोखिम भी रहता है।

इसलिए इस घटना की जांच निष्पक्ष तरीके से होना जरूरी है। जांच के दौरान सबसे पहले यह देखा जाना चाहिए कि बच्ची किस समय अस्पताल पहुंची थी और उस समय उसकी स्थिति क्या थी। इसके बाद यह पता लगाया जा सकता है कि उसे किस विभाग में ले जाना था और अस्पताल में उस समय कितने स्ट्रेचर उपलब्ध थे। यदि स्ट्रेचर उपलब्ध थे तो उन्हें मरीज को क्यों नहीं दिया गया, इसकी जानकारी भी महत्वपूर्ण होगी। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों को घटना की जानकारी थी या नहीं।

अस्पताल की ड्यूटी व्यवस्था की समीक्षा भी इस मामले में उपयोगी हो सकती है। यदि अस्पताल में मरीजों की संख्या अधिक थी और कर्मचारियों की संख्या कम थी, तो स्टाफ पर काम का दबाव अधिक हो सकता है। लेकिन मरीजों की बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था बनाए रखना अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि किसी सरकारी अस्पताल में लगातार कर्मचारियों की कमी है, तो यह केवल एक दिन की समस्या नहीं मानी जा सकती। ऐसे में राज्य स्तर पर मानव संसाधन की आवश्यकता का आकलन करना और पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति करना जरूरी हो सकता है।

बच्ची की बीमारी और उसकी मेडिकल स्थिति भी इस घटना को समझने में महत्वपूर्ण होगी। वीडियो में बच्ची को मां की गोद में देखा जा रहा है, लेकिन केवल वीडियो के आधार पर उसकी बीमारी की गंभीरता का अनुमान लगाना उचित नहीं है। अस्पताल में आने के बाद उसे किस तरह का उपचार मिला, उसे डॉक्टर ने कब देखा और उसकी आगे की स्थिति क्या रही, इस बारे में पूरी जानकारी सामने आना जरूरी है। यदि इलाज में किसी प्रकार की देरी हुई हो तो उसकी वजह की भी जांच की जानी चाहिए।

इस घटना का एक और महत्वपूर्ण पहलू मरीज की गरिमा और सुरक्षा से जुड़ा है। अस्पताल में पहुंचने वाला व्यक्ति चाहे किसी भी आर्थिक या सामाजिक पृष्ठभूमि से आता हो, उसे सम्मानजनक और सुरक्षित चिकित्सा सहायता मिलना जरूरी है। गरीब या ग्रामीण परिवारों के लिए सरकारी अस्पताल अक्सर सबसे महत्वपूर्ण विकल्प होते हैं। ऐसे परिवारों के लिए अस्पताल की व्यवस्था जितनी सरल और सहायता-आधारित होगी, उनके लिए इलाज की प्रक्रिया उतनी ही आसान होगी।

सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ एक वास्तविक चुनौती है। कई बड़े अस्पतालों में एक ही दिन में बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं। इससे पंजीकरण, जांच, दवा वितरण, भर्ती और वार्ड व्यवस्था पर दबाव पड़ता है। लेकिन भीड़ के बीच भी आपातकालीन और गंभीर मरीजों की पहचान कर उन्हें प्राथमिकता देना जरूरी होता है। बच्चों और चलने में असमर्थ मरीजों के लिए अलग सहायता व्यवस्था भी अस्पताल की कार्यप्रणाली को बेहतर बना सकती है।

यदि अस्पताल में स्ट्रेचर की संख्या पर्याप्त नहीं है, तो अस्पताल प्रशासन को यह पता लगाना चाहिए कि रोजाना कितने मरीजों को इसकी आवश्यकता पड़ती है। उसी आधार पर स्ट्रेचर की संख्या बढ़ाई जा सकती है। इसके अलावा स्ट्रेचर को एक स्थान पर रखने के बजाय अस्पताल के अलग-अलग महत्वपूर्ण हिस्सों में उपलब्ध रखना भी उपयोगी हो सकता है। इमरजेंसी, ओपीडी, जांच केंद्र और वार्ड के बीच मरीजों की आवाजाही को ध्यान में रखते हुए इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए।

केवल स्ट्रेचर उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं है। उसे समय पर मरीज तक पहुंचाना और इस्तेमाल करने के लिए स्टाफ उपलब्ध होना भी जरूरी है। कई बार संसाधन अस्पताल में मौजूद होते हैं, लेकिन मरीज या परिवार को यह पता नहीं होता कि उन्हें कैसे प्राप्त किया जाए। इसलिए अस्पताल में स्पष्ट दिशा-निर्देश और सहायता कर्मियों की मौजूदगी भी जरूरी है। यदि कोई परिवार परेशानी में हो तो उसे खुद व्यवस्था तलाशने के बजाय अस्पताल का कर्मचारी मार्गदर्शन दे सके।

बेतिया GMCH की घटना से यह सवाल भी उठता है कि सरकारी अस्पतालों में मरीज सहायता प्रणाली को कितना मजबूत बनाया गया है। अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ के अलावा अटेंडेंट, हेल्प डेस्क कर्मचारी और अन्य सपोर्ट स्टाफ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डॉक्टर और नर्स मरीज का इलाज करते हैं, लेकिन मरीज को जांच कक्ष, वार्ड या अन्य विभाग तक पहुंचाने जैसी जिम्मेदारियों के लिए अलग सहायता व्यवस्था की जरूरत होती है।

अस्पताल प्रशासन की ओर से कर्मचारियों की कमी का उल्लेख किया गया है। यदि यही घटना की वास्तविक वजह साबित होती है, तो समस्या का समाधान केवल किसी एक कर्मचारी को जिम्मेदार ठहराने से नहीं होगा। इसके लिए अस्पताल में आवश्यक पदों की संख्या, वर्तमान कर्मचारियों की संख्या और मरीजों की औसत संख्या का आकलन करना होगा। इसके आधार पर अतिरिक्त कर्मचारियों की आवश्यकता तय की जा सकती है।

वहीं यदि जांच में सामने आता है कि पर्याप्त कर्मचारी और स्ट्रेचर उपलब्ध थे, लेकिन परिवार को सहायता नहीं मिली, तो यह प्रबंधन या कर्मचारी स्तर की लापरवाही का मामला हो सकता है। ऐसी स्थिति में जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाना जरूरी होगा।

इस मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही की जरूरत को भी सामने रखा है। किसी अस्पताल में कोई घटना सामने आने के बाद केवल जांच की घोषणा करना पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए। जांच के परिणाम भी सामने आने चाहिए और यदि कमी पाई जाती है तो सुधार के कदमों की जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए। इससे लोगों का सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों पर भरोसा मजबूत हो सकता है।

वायरल वीडियो के कारण यह मामला तेजी से लोगों तक पहुंचा है। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल होना अपने आप में किसी आरोप की पुष्टि नहीं करता। ऐसे मामलों में प्रशासनिक जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होते हैं। अस्पताल की सीसीटीवी फुटेज, ड्यूटी रजिस्टर, स्ट्रेचर की उपलब्धता, संबंधित कर्मचारियों की तैनाती और मरीज की मेडिकल रिकॉर्ड जैसी जानकारियां वास्तविक स्थिति समझने में मदद कर सकती हैं।

यदि घटना के समय अस्पताल में सीसीटीवी कैमरे सक्रिय थे, तो जांच अधिकारी यह भी देख सकते हैं कि मां और बच्ची अस्पताल के किस हिस्से से आईं और कितनी देर तक परिसर में रहीं। इससे घटना की टाइमलाइन तैयार करने में मदद मिल सकती है। हालांकि इस तरह के रिकॉर्ड का उपयोग संबंधित नियमों और कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए।

बच्ची के परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति भी इस घटना को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले परिवारों के लिए बड़े अस्पताल की प्रक्रिया कई बार जटिल होती है। उन्हें स्थानीय भाषा या प्रशासनिक प्रक्रिया की जानकारी सीमित हो सकती है। इसलिए अस्पतालों में मरीजों और उनके परिजनों के लिए सरल और स्पष्ट सहायता व्यवस्था होना जरूरी है।

यह घटना बिहार के स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूद व्यापक चुनौतियों पर भी चर्चा का अवसर देती है। राज्य में सरकारी अस्पतालों के माध्यम से बड़ी आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों के मरीजों के लिए जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज महत्वपूर्ण केंद्र हैं। ऐसे संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं, मानव संसाधन और मरीज प्रबंधन को मजबूत करना स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए जरूरी है।

हालांकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी एक घटना के आधार पर पूरे बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था या पूरे GMCH की कार्यप्रणाली को खराब कहना उचित नहीं होगा। अस्पतालों में रोजाना हजारों मरीजों का इलाज होता है और अधिकांश प्रक्रियाएं सामान्य रूप से चलती हैं। लेकिन किसी एक मरीज को भी बुनियादी सुविधा न मिलने की शिकायत सामने आती है तो उसे गंभीरता से लेना जरूरी है, क्योंकि ऐसी घटनाएं व्यवस्था में मौजूद किसी कमी की ओर संकेत कर सकती हैं।

इस घटना के बाद अस्पताल प्रशासन के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। पहली जिम्मेदारी है कि बच्ची के मामले में वास्तविक घटनाक्रम की जांच की जाए। दूसरी जिम्मेदारी है कि यदि कोई कमी सामने आती है तो उसे दूर किया जाए। यदि स्ट्रेचर की कमी है तो संसाधन बढ़ाए जाएं। यदि कर्मचारी कम हैं तो अतिरिक्त स्टाफ की व्यवस्था की जाए। यदि कर्मचारियों को मरीज सहायता की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है तो उन्हें आवश्यक निर्देश और प्रशिक्षण दिया जाए।

मरीजों की सुरक्षा को लेकर अस्पतालों में स्पष्ट व्यवस्था होना आवश्यक है। गंभीर मरीज को अस्पताल के भीतर अकेले या परिजनों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। मरीज की स्थिति के अनुसार उसे स्ट्रेचर, व्हीलचेयर या अन्य उपयुक्त सहायता उपलब्ध कराना अस्पताल की मरीज-केंद्रित व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए। खासकर बच्चों के मामलों में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है।

बेतिया की घटना ने एक मां की मजबूरी को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बना दिया है। मां का अपनी बेटी को गोद में उठाकर अस्पताल में घूमना एक ऐसा दृश्य है जिसने लोगों को भावनात्मक रूप से प्रभावित किया। लेकिन इस तस्वीर से आगे बढ़कर यह देखना जरूरी है कि ऐसी स्थिति पैदा क्यों हुई। क्या यह संसाधनों की कमी थी, कर्मचारियों की कमी थी, व्यवस्था में तालमेल की समस्या थी या किसी स्तर पर लापरवाही हुई? यही जांच का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

परिवार के लिए इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उनकी बेटी का इलाज है। अस्पताल की किसी भी प्रशासनिक समस्या के बीच मरीज की चिकित्सा जरूरत प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि बच्ची को समय पर इलाज मिल गया और उसकी स्थिति स्थिर है, तो यह राहत की बात होगी। लेकिन यदि इलाज में देरी या अन्य समस्या सामने आती है तो उसे भी जांच में शामिल किया जाना चाहिए।

सरकारी अस्पतालों में मरीजों का भरोसा बनाए रखना बेहद जरूरी है। जब लोग सरकारी अस्पताल में पहुंचते हैं तो वे उम्मीद करते हैं कि वहां उन्हें कम से कम आवश्यक चिकित्सा और सहायता सुविधाएं मिलेंगी। यदि किसी घटना के कारण यह भरोसा कमजोर होता है तो उसका असर बड़ी आबादी पर पड़ सकता है। इसलिए प्रशासन को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और पारदर्शिता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए।

बेतिया GMCH के इस मामले से एक और संदेश निकलता है कि अस्पतालों में केवल अत्याधुनिक उपकरणों की उपलब्धता ही स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता तय नहीं करती। मरीज को अस्पताल के गेट से लेकर डॉक्टर के कमरे और फिर वार्ड तक सुरक्षित तरीके से पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। छोटी लगने वाली सुविधाएं मरीज के अनुभव में बड़ा अंतर पैदा कर सकती हैं।

यदि किसी बच्चे की हालत ऐसी है कि वह खुद चल नहीं सकता, तो उसे गोद में लेकर लंबे समय तक चलना मां या परिवार के लिए भी जोखिमपूर्ण हो सकता है। बच्ची को गलत तरीके से उठाने से चोट लगने की आशंका भी हो सकती है। इसलिए ऐसे मरीजों के लिए स्ट्रेचर या व्हीलचेयर जैसी सुविधा केवल सुविधा नहीं बल्कि सुरक्षा का हिस्सा है।

इस घटना के बाद अस्पताल प्रशासन की जांच रिपोर्ट का इंतजार रहेगा। जांच यह स्पष्ट कर सकती है कि वीडियो में दिखाई गई परिस्थिति के पीछे वास्तविक कारण क्या था। यदि परिवार की शिकायत सही पाई जाती है तो प्रशासन को आवश्यक सुधार करना चाहिए। यदि शिकायत में कुछ तथ्य अलग निकलते हैं, तो वह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए ताकि अफवाहों की जगह वास्तविक जानकारी सामने आए।

कुल मिलाकर, बेतिया GMCH में 11 साल की बीमार बच्ची को उसकी मां द्वारा गोद में उठाकर अस्पताल में घूमने का वीडियो सामने आने के बाद बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं। परिवार का आरोप है कि बच्ची को अस्पताल के भीतर ले जाने के लिए स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद मां ने खुद अपनी बेटी को गोद में उठाया और अस्पताल परिसर में इलाज की तलाश करती रही। वीडियो वायरल होने के बाद अस्पताल प्रशासन ने मामले का संज्ञान लिया और जांच की बात कही। अस्पताल अधीक्षक अनिल कुमार ने कर्मचारियों की कमी को ऐसी स्थिति की संभावित वजहों में शामिल बताया है।

बच्ची की पहचान सयाना खातून के रूप में बताई गई है। वह पश्चिमी चंपारण जिले के चनपटिया थाना क्षेत्र के महना गांव की रहने वाली बताई गई है। उसके पिता का नाम नजीर अंसारी बताया गया है। परिवार बच्ची को इलाज के लिए बेतिया GMCH लेकर पहुंचा था। घटना ने यह सवाल जरूर उठाया है कि अस्पताल में गंभीर या चलने में असमर्थ मरीजों के लिए कितनी प्रभावी सहायता व्यवस्था मौजूद है।

फिलहाल वायरल वीडियो के आधार पर स्ट्रेचर नहीं मिलने के आरोप को अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि और प्रशासनिक जांच के परिणाम सामने आना बाकी हैं। लेकिन घटना ने अस्पतालों में बुनियादी मरीज सुविधाओं की अहमियत को जरूर सामने ला दिया है। स्ट्रेचर, व्हीलचेयर, सहायता कर्मचारी और स्पष्ट मरीज मार्गदर्शन जैसी सुविधाएं किसी भी बड़े सरकारी अस्पताल के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

अब जरूरत इस बात की है कि मामले की जांच केवल एक वायरल वीडियो तक सीमित न रहे। अस्पताल प्रशासन को यह देखना चाहिए कि उस दिन की ड्यूटी व्यवस्था कैसी थी, कितने स्ट्रेचर उपलब्ध थे, मरीजों की संख्या कितनी थी, संबंधित कर्मचारियों की तैनाती कहां थी और बच्ची को सहायता देने की प्रक्रिया में कोई चूक हुई या नहीं। यदि कोई कमी सामने आती है तो उसका स्थायी समाधान किया जाना चाहिए।

स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य केवल मरीज को डॉक्टर तक पहुंचाना नहीं, बल्कि पूरी उपचार प्रक्रिया को सुरक्षित, सम्मानजनक और मरीज-केंद्रित बनाना है। एक बीमार बच्चे को अस्पताल के अंदर सही जगह तक पहुंचाना भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए बेतिया GMCH की यह घटना एक मां की परेशानी की कहानी होने के साथ-साथ सरकारी अस्पतालों में मरीज सहायता व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत की ओर भी ध्यान खींचती है।

आखिरकार, किसी भी अस्पताल की असली सफलता केवल बड़े भवन, आधुनिक मशीनों या विशेषज्ञ डॉक्टरों से नहीं मापी जाती। यह भी देखा जाता है कि जब कोई परेशान परिवार अस्पताल के दरवाजे पर पहुंचता है तो उसे कितनी जल्दी और कितनी संवेदनशीलता के साथ मदद मिलती है। बेतिया GMCH से सामने आया यह मामला इसी बुनियादी सवाल को सामने रखता है। उम्मीद है कि जांच के बाद वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी और यदि व्यवस्था में कोई कमी पाई जाती है तो उसे दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे, ताकि भविष्य में किसी मां को अपनी बीमार संतान को गोद में लेकर अस्पताल में इलाज के लिए भटकने की मजबूरी न हो।

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