‘ढाई करोड़ रुपये पाकिस्तान से आए हैं…’ टेरर फंडिंग के नाम पर रिटायर्ड अफसर को बनाया डिजिटल अरेस्ट का शिकार, ऐसे हुआ साइबर फ्रॉड का खेल

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लखनऊ में साइबर ठगी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें अपराधियों ने कानून और आतंकवाद से जुड़े मामले का डर दिखाकर एक रिटायर्ड परिवहन विभाग के अधिकारी को अपने जाल में फंसाने की कोशिश की। ठगों ने पीड़ित को फोन कर बताया कि उनके नाम से जुड़े बैंक खाते और दस्तावेज एक बेहद गंभीर जांच के दायरे में हैं। कथित तौर पर उन्हें यह भी बताया गया कि पाकिस्तान से करोड़ों रुपये की रकम आई है और उसका संबंध टेरर फंडिंग से हो सकता है।

इस तरह की बात सुनते ही सामान्य व्यक्ति घबरा सकता है, खासकर तब जब फोन करने वाला खुद को पुलिस, एटीएस, सीबीआई या किसी दूसरी जांच एजेंसी का अधिकारी बताए। साइबर अपराधियों ने इसी डर का फायदा उठाया। बातचीत को इस तरह आगे बढ़ाया गया कि पीड़ित को लगे कि मामला वास्तविक है और यदि उसने कथित अधिकारियों के निर्देशों का पालन नहीं किया तो उसे तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है।

यह घटना साइबर अपराध के उस खतरनाक तरीके की ओर इशारा करती है, जिसे आम तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा जाता है। इसमें अपराधी वास्तव में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं करते, बल्कि फोन या वीडियो कॉल के जरिए उसे लगातार निगरानी और कानूनी कार्रवाई के डर में रखते हैं। पीड़ित को परिवार से बात न करने, कॉल न काटने और जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने तक के निर्देश दिए जा सकते हैं।

शुरुआत एक डरावने फोन कॉल से होती है

ऐसे मामलों में अपराधियों की पहली कोशिश पीड़ित को यह विश्वास दिलाने की होती है कि फोन किसी सामान्य व्यक्ति का नहीं बल्कि किसी सरकारी अधिकारी का है। इसके लिए वे पुलिस की वर्दी, फर्जी आईडी कार्ड, सरकारी कार्यालय जैसे दिखने वाले बैकग्राउंड और आधिकारिक भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं।

लखनऊ के इस मामले में भी रिटायर्ड अधिकारी को कथित तौर पर ऐसी ही कहानी सुनाई गई। उन्हें बताया गया कि उनके नाम या मोबाइल नंबर का इस्तेमाल एक बड़े वित्तीय नेटवर्क में हुआ है। बातचीत को आतंकवाद और पाकिस्तान से जोड़ दिया गया ताकि पीड़ित पर मनोवैज्ञानिक दबाव और बढ़ जाए।

‘ढाई करोड़ रुपये पाकिस्तान से आए हैं’ जैसी बात सुनकर किसी भी व्यक्ति को लगेगा कि मामला बेहद गंभीर है। साइबर अपराधियों का मकसद भी यही होता है कि पीड़ित सोचने-समझने की स्थिति में न रहे और तुरंत उनके निर्देशों का पालन करने लगे।

वास्तव में किसी सरकारी जांच में यदि किसी व्यक्ति का नाम सामने आता भी है तो कानूनी प्रक्रिया फोन पर डराकर पैसे ट्रांसफर कराने की नहीं होती। लेकिन साइबर ठग इसी जानकारी की कमी का फायदा उठाते हैं।

आतंकवाद का नाम लेकर बनाया मानसिक दबाव

डिजिटल-अरेस्ट स्कैम में अपराधी अक्सर सामान्य साइबर अपराध या बैंक फ्रॉड की बजाय आतंकवाद, मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स और देश की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों का नाम लेते हैं। इसका कारण साफ है—इन शब्दों से जुड़ा डर बहुत ज्यादा होता है।

लखनऊ के मामले में भी पीड़ित को कथित तौर पर टेरर फंडिंग से जोड़कर डराया गया। उन्हें ऐसा महसूस कराने की कोशिश की गई कि मामला सिर्फ बैंक खाते या पैसों से संबंधित नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है।

यही वह चरण होता है जहां पीड़ित अपनी सामान्य सोच खो सकता है। उसे लगता है कि अगर उसने फोन काट दिया या परिवार को बताया तो शायद पुलिस घर पहुंच जाएगी। अपराधी इसी डर को आगे बढ़ाते हुए पीड़ित को अपने नियंत्रण में रखते हैं।

ऐसे मामलों में ठग अक्सर कहते हैं कि जांच गोपनीय है और किसी को बताने पर मामला और बिगड़ जाएगा। पीड़ित को परिवार से संपर्क करने से रोकना भी इसी रणनीति का हिस्सा होता है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ असल में क्या होता है?

‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई वास्तविक कानूनी प्रक्रिया नहीं है। भारतीय कानून में किसी व्यक्ति को केवल वीडियो कॉल पर बैठाकर पुलिस या जांच एजेंसी द्वारा गिरफ्तार रखने जैसी व्यवस्था नहीं है। साइबर अपराधियों ने इस शब्द को अपनी ठगी की रणनीति का हिस्सा बना लिया है।

ठग वीडियो कॉल शुरू करते हैं और खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई अधिकारी, ईडी अधिकारी, आरबीआई कर्मचारी या अदालत से जुड़ा व्यक्ति बताते हैं। कई बार पीड़ित को फर्जी दस्तावेज भी दिखाए जाते हैं।

इसके बाद कहा जाता है कि व्यक्ति किसी आपराधिक मामले में संदिग्ध है। फोन काटने या किसी और से बात करने पर गिरफ्तारी की धमकी दी जाती है। इस तरह पीड़ित घंटों या कई दिनों तक अपराधियों की निगरानी में रहता है।

हाल के वर्षों में ऐसे मामलों में अपराधियों ने तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ाया है। लखनऊ में ही एक अलग मामले में एक रिटायर्ड एफसीआई कर्मचारी और उनकी पत्नी को कथित तौर पर लगभग 18 दिनों तक व्हाट्सऐप वीडियो कॉल के जरिए ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा गया और उनसे 42 लाख रुपये से अधिक की रकम ट्रांसफर कराई गई। पुलिस के अनुसार, ठगों ने एटीएस, एनआईए और सीबीआई अधिकारियों की पहचान का इस्तेमाल किया था।

फर्जी अधिकारी बनकर बढ़ाया जाता है डर

साइबर अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी कहानी होती है। वे पीड़ित को एक साथ कई फर्जी पहचान दिखा सकते हैं। पहले कोई व्यक्ति खुद को पुलिस अधिकारी बताता है। कुछ देर बाद कॉल किसी दूसरे कथित अधिकारी को ट्रांसफर कर दी जाती है। फिर कोई व्यक्ति खुद को एटीएस या सीबीआई से जुड़ा बताता है।

पीड़ित को लगता है कि वास्तव में कई सरकारी एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं।

कई बार वीडियो कॉल के दौरान पीछे पुलिस का लोगो, फाइलें, कंप्यूटर या वर्दी पहने लोग दिखाई देते हैं। इससे फर्जी व्यवस्था और वास्तविक लगने लगती है। अपराधी पीड़ित की व्यक्तिगत जानकारी भी पहले से जुटा सकते हैं, जिससे बातचीत के दौरान उनका भरोसा और मजबूत हो जाता है।

उदाहरण के लिए, यदि ठग पीड़ित का नाम, उम्र, बैंक का नाम, आधार से जुड़ी कुछ जानकारी या पुराने पते जैसी बातें सही बता दे तो पीड़ित को लग सकता है कि सामने वाला वास्तव में सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंच रखने वाला अधिकारी है।

डर के साथ जोड़ी जाती है गोपनीयता की शर्त

साइबर ठग सिर्फ गिरफ्तारी का डर नहीं दिखाते। वे पीड़ित को यह भी समझाते हैं कि मामला ‘गोपनीय जांच’ का हिस्सा है। इसलिए परिवार, बैंक कर्मचारी या किसी वकील तक को इसकी जानकारी न देने के लिए कहा जाता है।

यही बात साइबर अपराधियों को सबसे ज्यादा फायदा देती है।

अगर पीड़ित अपने परिवार से तुरंत बात कर ले, तो अक्सर परिवार वाले उसे समझा सकते हैं कि फोन करने वाला व्यक्ति फर्जी हो सकता है। बैंक कर्मचारी भी बड़े और असामान्य लेनदेन को देखकर सवाल उठा सकते हैं। लेकिन जब पीड़ित खुद को अकेला समझता है, तब ठगों का नियंत्रण मजबूत हो जाता है।

इसलिए साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार लोगों को सलाह देते हैं कि किसी भी कथित कानूनी कार्रवाई को लेकर फोन आने पर अकेले निर्णय न लें।

बुजुर्ग और रिटायर्ड लोग क्यों बनते हैं निशाना?

डिजिटल-अरेस्ट गिरोह अक्सर ऐसे लोगों को निशाना बनाते हैं जो कानून की ऑनलाइन प्रक्रियाओं और डिजिटल बैंकिंग की जटिलताओं से पूरी तरह परिचित नहीं होते। रिटायर्ड अधिकारी, बुजुर्ग और ऐसे लोग जिनके पास लंबे समय से जमा बचत है, अपराधियों के लिए आकर्षक लक्ष्य हो सकते हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि केवल बुजुर्ग ही ऐसे अपराध का शिकार होते हैं। डिजिटल ठगी के मामलों में युवा और तकनीकी रूप से जागरूक लोग भी फंसते हैं। लेकिन वरिष्ठ नागरिकों के मामले में अपराधी अक्सर उम्र और कानूनी कार्रवाई के डर को हथियार बना लेते हैं।

हाल के कई मामलों में बुजुर्ग पीड़ितों को आतंकवादी गतिविधियों, मनी लॉन्ड्रिंग या फर्जी बैंक खातों से जोड़ने की धमकी दी गई है। लखनऊ में अगस्त 2026 में सामने आए एक मामले में 70 वर्षीय रिटायर्ड एफसीआई कर्मचारी और उनकी पत्नी को पुलवामा हमले से जुड़े कथित मामले में फंसाने की धमकी देकर 42.09 लाख रुपये की ठगी का आरोप लगा था।

असली पुलिस फोन पर पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहती

इस तरह की घटनाओं से सबसे महत्वपूर्ण सीख यही है कि कोई भी वास्तविक जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर ‘जमानत’, ‘वेरिफिकेशन’, ‘मनी ट्रेल क्लियरेंस’ या किसी अन्य बहाने से किसी निजी बैंक खाते में पैसा जमा करने का निर्देश नहीं देती।

अगर कोई खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर कहे कि आपका पैसा जांच के लिए दूसरे खाते में भेजना होगा, तो यह बड़ा खतरे का संकेत है।

इसी तरह ‘सेफ अकाउंट’, ‘वेरिफिकेशन अकाउंट’ या ‘सरकारी जांच खाता’ जैसी बातें भी ठगी की पहचान हो सकती हैं। साइबर अपराधी अक्सर इन शब्दों का इस्तेमाल करके पीड़ित को भरोसा दिलाते हैं कि वह अपना पैसा खो नहीं रहा बल्कि जांच पूरी होने के बाद वापस पा लेगा।

वास्तव में पैसा ट्रांसफर होने के बाद उसे अलग-अलग खातों, वॉलेट, फर्जी कंपनियों या दूसरे माध्यमों से आगे भेज दिया जाता है। इससे रकम की वास्तविक दिशा का पता लगाना पुलिस के लिए मुश्किल हो सकता है।

लखनऊ में साइबर अपराध का बड़ा नेटवर्क भी जांच के घेरे में

लखनऊ और उत्तर प्रदेश में साइबर अपराध के कई बड़े नेटवर्क हाल के महीनों में सामने आए हैं। सितंबर 2026 में लखनऊ पुलिस की कार्रवाई से जुड़े एक बड़े साइबर फ्रॉड नेटवर्क की जांच में ईडी भी शामिल हुई। रिपोर्टों के अनुसार, इस कथित नेटवर्क को लेकर लगभग 100 करोड़ रुपये के साइबर फ्रॉड की जांच की जा रही है और मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू की भी पड़ताल हो रही है। पुलिस ने पहले एक कथित अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर ऑपरेशन पर कार्रवाई की थी, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारी और डिजिटल उपकरणों की बरामदगी की बात सामने आई थी।

ऐसे मामलों से साफ है कि साइबर ठगी अब सिर्फ किसी एक ठग के फोन कॉल तक सीमित नहीं रही। इसके पीछे कॉलिंग, बैंक खातों, फर्जी दस्तावेजों, डिजिटल संचार और रकम को आगे बढ़ाने वाले अलग-अलग स्तरों वाला नेटवर्क हो सकता है।

ठगी के बाद क्या करना चाहिए?

अगर किसी व्यक्ति को ऐसा फोन आता है और वह गलती से ठगों के निर्देश पर पैसा ट्रांसफर कर देता है, तो सबसे महत्वपूर्ण है कि वह शर्म या डर की वजह से चुप न रहे।

तुरंत बैंक से संपर्क कर लेनदेन की जानकारी देनी चाहिए और साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करनी चाहिए। भारत में साइबर फ्रॉड की शिकायत के लिए हेल्पलाइन नंबर 1930 का इस्तेमाल किया जा सकता है। जितनी जल्दी शिकायत की जाए, रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने या फ्रीज कराने की संभावना उतनी बेहतर हो सकती है।

फोन नंबर, व्हाट्सऐप चैट, स्क्रीनशॉट, बैंक ट्रांजेक्शन, यूपीआई विवरण, कॉल रिकॉर्ड और अपराधियों द्वारा भेजे गए दस्तावेजों को सुरक्षित रखना भी जांच में मदद कर सकता है।

सबसे जरूरी बात यह है कि पीड़ित को तुरंत परिवार या किसी भरोसेमंद व्यक्ति को जानकारी देनी चाहिए।

डरिए नहीं, जांच कीजिए

लखनऊ के इस मामले की कहानी यह बताती है कि साइबर अपराधी अब सिर्फ लालच देकर पैसा नहीं ठगते। वे डर को भी एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

कभी कहा जाता है कि आपके नाम से ड्रग्स भेजी गई है, कभी किसी बैंक खाते में मनी लॉन्ड्रिंग का पैसा मिलने की बात कही जाती है और कभी पाकिस्तान या आतंकवादी संगठन से संबंध होने का आरोप लगाकर व्यक्ति को डराया जाता है।

ऐसे मामलों में अपराधियों का लक्ष्य यह होता है कि पीड़ित सवाल पूछना बंद कर दे और केवल निर्देशों का पालन करे।

इसलिए यदि कोई फोन करके कहे कि आपके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज है, तो सबसे पहले शांत रहें। फोन करने वाले की पहचान पर भरोसा करके कोई पैसा ट्रांसफर न करें। किसी भी दस्तावेज या बैंक जानकारी को साझा करने से पहले स्वतंत्र रूप से संबंधित विभाग से संपर्क करें।

कानून का डर दिखाकर फोन पर पैसा मांगना साइबर ठगी का बड़ा संकेत है। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई सामान्य कानूनी प्रक्रिया नहीं है। यही जानकारी अगर लोगों तक समय रहते पहुंच जाए तो कई परिवार अपनी वर्षों की जमा पूंजी बचा सकते हैं।

लखनऊ के रिटायर्ड अधिकारी से जुड़ा यह मामला भी इसी बड़े खतरे की याद दिलाता है कि साइबर ठग अब तकनीक के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। आतंकवाद और पाकिस्तान जैसे संवेदनशील मुद्दों का नाम लेकर पैदा किया गया डर उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। ऐसे में घबराने के बजाय सत्यापन करना, परिवार से बात करना और जरूरत पड़ने पर तुरंत पुलिस व साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।

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