
भारत में मतदाता सूची को लेकर चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया के बीच सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान फॉर्म-6 को लेकर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 के किसी भी संशोधित प्रारूप को मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि रिकॉर्ड सामने आने के बाद वह यह देखना चाहेगी कि आखिर इस फॉर्म में बदलाव किस स्तर पर और किसके आदेश से किया गया।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि SIR प्रक्रिया के दौरान नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑनलाइन फॉर्म-6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़े जाने को लेकर पिछले कुछ समय से विवाद चल रहा है। चुनाव आयोग का कहना रहा है कि मूल फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया, बल्कि SIR की जरूरतों के तहत एक अतिरिक्त घोषणा या Annexure D जोड़ा गया था। दूसरी ओर, इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाने वालों का तर्क है कि यदि किसी वैधानिक फॉर्म के इस्तेमाल की प्रक्रिया में अतिरिक्त अनिवार्य शर्त जोड़ी जाती है, तो उसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट की सोमवार की सुनवाई इसी व्यापक विवाद के बीच हुई। अदालत के सामने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और चुनाव आयोग द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों को चुनौती देने वाली याचिका भी थी। सुनवाई के दौरान फॉर्म-6 का मुद्दा सामने आया तो CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी संशोधित फॉर्म-6 को अदालत ने मंजूरी नहीं दी है। उन्होंने रिकॉर्ड पेश होने पर यह देखने की बात कही कि फॉर्म में बदलाव आखिर किसने किया।
क्या है फॉर्म-6 और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
फॉर्म-6 चुनावी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण वैधानिक फॉर्म है। इसका इस्तेमाल पात्र नागरिकों द्वारा मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। यानी कोई व्यक्ति पहली बार मतदाता के तौर पर पंजीकरण कराना चाहता है तो उसके लिए फॉर्म-6 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यही वजह है कि फॉर्म-6 में किसी भी अतिरिक्त शर्त या प्रक्रिया को लेकर विवाद केवल प्रशासनिक बदलाव का मामला नहीं रह जाता। इसका सीधा संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण और मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने की प्रक्रिया से जुड़ता है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि आवेदन करने वाले व्यक्ति से कौन-कौन सी जानकारी मांगी जा सकती है और वह जानकारी किस कानूनी आधार पर अनिवार्य की गई है।
SIR के दौरान इसी फॉर्म के साथ एक अतिरिक्त घोषणा को लेकर विवाद शुरू हुआ। इस घोषणा में नए मतदाता से यह जानकारी मांगी गई कि उसका या उसके माता-पिता का नाम पिछली गहन मतदाता सूची से जुड़ा या मैप किया गया था या नहीं। पहले इस्तेमाल किए जा रहे फॉर्म-6 में इस तरह की जानकारी उसी तरीके से अनिवार्य नहीं थी।
SIR के दौरान क्या जोड़ा गया था?
SIR यानी Special Intensive Revision का उद्देश्य मतदाता सूची की व्यापक समीक्षा करना है। इस प्रक्रिया में मतदाताओं के विवरण की जांच और सूची को अपडेट करने की कवायद की जाती है। नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े मामलों में अतिरिक्त जानकारी की जरूरत को लेकर चुनाव आयोग ने एक घोषणा पत्र की व्यवस्था की।
चुनाव आयोग का पक्ष यह रहा कि उसने फॉर्म-6 को बदला नहीं है। आयोग के अनुसार मौजूदा फॉर्म-6 अपनी जगह कायम रहा और उसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा पत्र लगाया गया। आयोग ने इसे SIR के लिए निर्धारित अतिरिक्त आवश्यकता के रूप में बताया।
इस अतिरिक्त घोषणा में नए मतदाता से पिछली SIR से जुड़े मतदाता रिकॉर्ड में स्वयं या माता-पिता अथवा कुछ मामलों में परिवार के पुराने रिकॉर्ड से संबंध के बारे में जानकारी देने की व्यवस्था की गई। इसका उद्देश्य चुनाव आयोग के अनुसार मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान पात्रता और पुराने रिकॉर्ड के बीच संबंध स्थापित करना था।
लेकिन विवाद इस बात पर पैदा हुआ कि क्या ऐसी अतिरिक्त जानकारी को अनिवार्य बनाने के लिए केवल चुनाव आयोग के निर्देश पर्याप्त थे या फिर वैधानिक नियमों में औपचारिक बदलाव की जरूरत थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्यों अहम है?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि अदालत ने साफ किया कि उसने संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी थी। यह स्पष्टीकरण उस समय आया जब अदालत को बताया गया कि SIR के दौरान इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 से संबंधित बदलाव या अतिरिक्त घोषणा को पहले के न्यायिक फैसले से समर्थन मिलने की बात कही गई थी।
CJI सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी संशोधित फॉर्म-6 को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है। उन्होंने यह भी कहा कि जब रिकॉर्ड अदालत के सामने आएगा तो यह देखा जाएगा कि फॉर्म में बदलाव किसने किया। इससे मामले का अगला महत्वपूर्ण चरण रिकॉर्ड और निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच से जुड़ सकता है।
यहां यह समझना जरूरी है कि अदालत की टिप्पणी को अभी किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि किसी विशेष अधिकारी ने निश्चित रूप से गैरकानूनी काम किया है। अदालत ने रिकॉर्ड देखने और निर्णय प्रक्रिया को समझने की जरूरत पर जोर दिया है।
यही वजह है कि आगे की सुनवाई में चुनाव आयोग द्वारा लिए गए फैसलों से जुड़े दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
चुनाव आयोग और फॉर्म-6 पर क्या रहा है विवाद?
फॉर्म-6 विवाद के केंद्र में मूल फॉर्म और उसके साथ लगाए गए अतिरिक्त घोषणा पत्र के बीच अंतर है। चुनाव आयोग ने लगातार यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि मूल वैधानिक फॉर्म में बदलाव नहीं किया गया है। आयोग के अनुसार SIR के आदेशों के तहत अतिरिक्त घोषणा की आवश्यकता रखी गई थी।
दूसरी ओर, इस व्यवस्था पर आपत्ति उठाने वाले पक्ष का कहना रहा कि यदि ऑनलाइन सिस्टम में फॉर्म-6 के साथ अतिरिक्त घोषणा को अनिवार्य रूप से जोड़ा गया, तो व्यवहार में यह मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है। इसलिए इस तरह की व्यवस्था के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
सितंबर में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, ने फॉर्म-6 से जुड़ी प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्टों के अनुसार उनका तर्क था कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव निर्धारित नियमों में संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग की ओर से इस पर अलग व्याख्या सामने आई। आयोग ने कहा कि फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया था और अतिरिक्त घोषणा को अलग आवश्यकता के रूप में लागू किया गया था। यही अंतर अब कानूनी विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
बिहार SIR के फैसले से भी जुड़ा मामला
फॉर्म-6 विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू बिहार में SIR से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले से जुड़ा है। चुनाव आयोग की ओर से यह कहा गया था कि SIR से संबंधित अतिरिक्त घोषणा को अदालत के फैसले से समर्थन मिला था। हालांकि, बाद में इस दावे पर सवाल उठे कि जिस समय संबंधित फॉर्म-6 घोषणा लागू की गई, उस समय तक सुप्रीम कोर्ट के पास उस विशेष बदलाव की समीक्षा करने का अवसर ही नहीं था।
यही वजह है कि सोमवार की सुनवाई में CJI की टिप्पणी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उसने किसी संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी। अब यह देखना होगा कि संबंधित रिकॉर्ड में क्या निर्णय लिए गए थे और किस आधार पर अतिरिक्त घोषणा को लागू किया गया।
इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने अभी अंतिम रूप से यह तय कर दिया है कि चुनाव आयोग की पूरी SIR प्रक्रिया अवैध है। वर्तमान चरण में अदालत संबंधित रिकॉर्ड और पक्षों की दलीलों को सुन रही है।
‘गैरकानूनी काम हुआ तो नतीजे भुगतने पड़ेंगे’
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने यह भी संकेत दिया कि यदि किसी स्तर पर गैरकानूनी काम हुआ है तो उसके परिणाम हो सकते हैं। हालांकि, इस टिप्पणी का अर्थ किसी व्यक्ति के खिलाफ तत्काल दोष सिद्ध होना नहीं है।
अदालत का रुख यह दर्शाता है कि यदि रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी करके कोई निर्णय लिया गया, तो उसके कानूनी प्रभावों पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि पहले रिकॉर्ड सामने आना जरूरी है।
इस संदर्भ में अदालत के लिए यह पता लगाना महत्वपूर्ण हो सकता है कि संबंधित निर्णय व्यक्तिगत स्तर पर लिया गया था, चुनाव आयोग के बहुमत से लिया गया था या सभी चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिया गया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग से फैसलों का रिकॉर्ड पेश करने को कहा।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं?
सुप्रीम कोर्ट के सामने जिस याचिका पर सुनवाई हुई, उसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग से जुड़े कुछ अधिकारियों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर कई फैसलों को चुनौती दी है और आरोप लगाया है कि कुछ निर्णय एकतरफा तरीके से लिए गए।
याचिका में स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल गठित करने की मांग भी की गई है। इसमें सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच और साइबर सुरक्षा तथा सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों की सहायता लेने की मांग का उल्लेख है।
याचिका में कुछ अधिकारियों के खिलाफ Representation of the People Act, 1950 की धारा 32 के तहत कार्रवाई की मांग भी की गई है। यह धारा चुनावी सूची तैयार करने, संशोधित करने या सुधारने से जुड़े कुछ आधिकारिक कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए दंडात्मक प्रावधानों से संबंधित है। हालांकि, इन आरोपों पर अभी अदालत का अंतिम निर्णय नहीं आया है।
सुनवाई के दौरान वकील ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने चुनाव आयोग के कामकाज और SIR प्रक्रिया को लेकर अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने फॉर्म-6 में जोड़ी गई अतिरिक्त शर्तों का उदाहरण देते हुए इस मामले को चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के कामकाज से जोड़कर प्रस्तुत किया।
उन्होंने यह तर्क रखा कि फॉर्म-6 में नई शर्तें जोड़ी गईं और इसका प्रभाव बड़ी संख्या में मतदाताओं पर पड़ सकता है। सुनवाई के दौरान उन्होंने विभिन्न राज्यों में SIR से जुड़े आंकड़ों का भी उल्लेख किया।
CJI सूर्यकांत ने इस दौरान यह संकेत दिया कि अदालत मामले से पूरी तरह अवगत है और अपना अध्ययन करके सुनवाई कर रही है। अदालत ने याचिका में मांगी गई राहतों को लेकर भी सवाल उठाए और यह टिप्पणी की कि याचिका में मांगी गई प्रार्थनाएं व्यापक और एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। इसके बावजूद अदालत ने नोटिस जारी किया और मामले को संबंधित अन्य याचिका के साथ जोड़ दिया।
ECI ने बाद में क्या कदम उठाया?
फॉर्म-6 विवाद के बीच चुनाव आयोग ने सितंबर के अंत में उन राज्यों में अतिरिक्त SIR घोषणा को हटाने का निर्णय लिया जहां SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। रिपोर्टों के अनुसार ECINET पोर्टल और संबंधित मुख्य निर्वाचन अधिकारी पोर्टलों से अतिरिक्त घोषणा हटाई गई और ऐसे राज्यों में गैर-SIR अवधि के दौरान नियमों के अनुसार लागू वैधानिक फॉर्म इस्तेमाल करने की व्यवस्था की गई।
हालांकि जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया जारी थी, वहां अतिरिक्त घोषणा की व्यवस्था बनी रही। चुनाव आयोग ने यह अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि अतिरिक्त घोषणा SIR प्रक्रिया से संबंधित थी और सामान्य अवधि में नियमों के अनुसार निर्धारित फॉर्म इस्तेमाल किए जाएंगे।
इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि फॉर्म-6 विवाद केवल अदालत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चुनावी प्रशासन की वास्तविक प्रक्रिया में भी इसका असर पड़ा।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट की सोमवार की सुनवाई के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि संबंधित रिकॉर्ड अदालत के सामने कब और किस रूप में पेश किए जाते हैं। अदालत यह देखना चाहती है कि फॉर्म-6 से जुड़ी व्यवस्था किस निर्णय के तहत लागू हुई और उसके पीछे कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई।
इसके अलावा अदालत यह भी देख सकती है कि फॉर्म-6 के मूल प्रारूप और अतिरिक्त घोषणा के बीच कानूनी अंतर क्या है तथा SIR के दौरान अतिरिक्त घोषणा को लागू करने का अधिकार किस नियम या आदेश से प्राप्त हुआ।
यदि अदालत के सामने प्रस्तुत रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि कोई बदलाव बिना आवश्यक प्रक्रिया के किया गया था, तो उसके कानूनी परिणामों पर आगे विचार किया जा सकता है। वहीं यदि चुनाव आयोग यह स्थापित करता है कि मूल फॉर्म में कोई बदलाव नहीं हुआ और अतिरिक्त घोषणा पहले से जारी SIR निर्देशों के तहत अलग दस्तावेज के रूप में लागू की गई थी, तो विवाद का कानूनी स्वरूप अलग हो सकता है।
यानी फिलहाल मामला किसी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा है।
मतदाताओं के लिए इसका क्या मतलब है?
फॉर्म-6 विवाद का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया से जुड़ा है। इसलिए इस मामले में अदालत की जांच केवल चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों के बीच प्रशासनिक विवाद नहीं है। इसका संबंध इस बात से भी है कि किसी पात्र नागरिक को मतदाता सूची में शामिल होने के लिए कौन-सी जानकारी देनी होगी और वह जानकारी किस कानूनी आधार पर मांगी जा सकती है।
मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियादी व्यवस्था का हिस्सा होती है। इसलिए उसके निर्माण और संशोधन की प्रक्रिया में पारदर्शिता, निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और संस्थागत जिम्मेदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
हालांकि, इस मामले में किसी भी पक्ष के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने अभी रिकॉर्ड मंगाने और संबंधित पक्षों का जवाब जानने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
SIR विवाद का व्यापक संदर्भ
SIR को लेकर पहले से ही राजनीतिक और कानूनी बहस चल रही है। एक तरफ चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को अधिक व्यवस्थित और सत्यापित करने की प्रक्रिया के रूप में देखता है, वहीं दूसरी ओर कुछ राजनीतिक दल और याचिकाकर्ता इससे जुड़े दस्तावेज, पात्रता और प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
फॉर्म-6 का विवाद इसी बड़े SIR विवाद का एक हिस्सा बन गया है। इसमें अब न्यायिक जांच का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई अतिरिक्त घोषणा का कानूनी आधार क्या था और क्या इसे लागू करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने कम से कम इतना स्पष्ट कर दिया है कि अदालत ने संशोधित फॉर्म-6 को अपनी ओर से मंजूरी नहीं दी थी। अब रिकॉर्ड की जांच के बाद यह स्पष्ट हो सकता है कि संबंधित व्यवस्था किस निर्णय और किस प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत लागू हुई।
निष्कर्ष
SIR और फॉर्म-6 को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट की सोमवार की सुनवाई ने एक नया महत्वपूर्ण मोड़ ला दिया है। CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी थी और अदालत संबंधित रिकॉर्ड देखकर यह समझना चाहती है कि फॉर्म में बदलाव किसने किया और किस प्रक्रिया के तहत किया गया।
हालांकि अदालत ने फिलहाल किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी घोषित नहीं किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ तत्काल निलंबन जैसी अंतरिम राहत भी अदालत ने नहीं दी, लेकिन चुनाव आयोग, CEC और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया गया है और मामले में जवाब मांगा गया है।
अब अगला महत्वपूर्ण चरण रिकॉर्ड और जवाबों का सामने आना होगा। इसके बाद अदालत यह तय कर सकती है कि फॉर्म-6 से जुड़ी प्रक्रिया में वास्तव में क्या हुआ, किस स्तर पर निर्णय लिया गया और क्या निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया।
इस पूरे विवाद में सबसे अहम बात यही है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े किसी भी बदलाव की वैधता केवल उसके प्रशासनिक इस्तेमाल से तय नहीं होती, बल्कि उसके कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया का पालन भी महत्वपूर्ण होता है। सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सुनवाई इसी प्रश्न की जांच की दिशा में आगे बढ़ रही है।