विरोध के बीच CEC ज्ञानेश कुमार के तीन बड़े दौरे टले, मेरठ-काशी के बाद छत्तीसगढ़ यात्रा भी स्थगित, SIR विवाद से जुड़ी सियासत तेज

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विरोध के बीच CEC ज्ञानेश कुमार के तीन बड़े दौरे टले, मेरठ-काशी के बाद छत्तीसगढ़ यात्रा भी स्थगित, SIR विवाद से जुड़ी सियासत तेज

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहा राजनीतिक विवाद लगातार सुर्खियों में है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR, मतदाता सूची में बदलाव और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दलों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी बीच मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के प्रस्तावित दौरों के लगातार स्थगित होने से राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है। अब तक उत्तर प्रदेश के मेरठ और काशी के कार्यक्रमों के बाद छत्तीसगढ़ का दो दिवसीय दौरा भी टाल दिया गया है।

छत्तीसगढ़ का दौरा 7 और 8 अक्टूबर को प्रस्तावित था। राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय की ओर से जारी जानकारी में कहा गया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों का दौरा अपरिहार्य कारणों से स्थगित किया गया है। नई तारीख बाद में बताई जाएगी। आधिकारिक तौर पर दौरा स्थगित करने का कारण SIR विवाद या विपक्षी विरोध को नहीं बताया गया है।

हालांकि, दौरे के स्थगित होने का समय ऐसा है जब ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक माहौल काफी गरम है। विपक्षी दल मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और उनके इस्तीफे की मांग उठा रहे हैं। दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग का कहना है कि इस तरह के आधिकारिक दौरों में स्थानीय परिस्थितियों, लॉजिस्टिक व्यवस्था, मौसम, त्योहारों और अन्य आधिकारिक कार्यक्रमों के कारण बदलाव होना असामान्य नहीं है। इसलिए किसी दौरे के स्थगन को सीधे राजनीतिक विरोध से जोड़ना आधिकारिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं है।

मेरठ और काशी के कार्यक्रम पहले ही टल चुके थे

ज्ञानेश कुमार के प्रस्तावित दौरों के स्थगित होने का सिलसिला सितंबर में शुरू हुआ था। उत्तर प्रदेश में उनके मेरठ और काशी जाने का कार्यक्रम बनाया गया था। इन दोनों स्थानों पर युवा मतदाताओं और छात्रों के साथ संवाद से जुड़े कार्यक्रम प्रस्तावित थे।

मेरठ में 25 सितंबर को Gen-Z युवाओं के साथ बातचीत का कार्यक्रम रखा गया था। वहीं 28 सितंबर को काशी में छात्रों के साथ मतदाताओं के लिए डिजिटल माध्यमों और निर्वाचन संबंधी सेवाओं पर संवाद का कार्यक्रम प्रस्तावित था। इन कार्यक्रमों की तैयारियां भी की जा चुकी थीं।

रिपोर्टों के अनुसार मेरठ के कार्यक्रम को लेकर करीब 1.53 करोड़ रुपये का टेंडर भी जारी किया जा चुका था। लेकिन 21 सितंबर को तैयारियां रोकने के निर्देश दिए गए और इसके बाद दोनों कार्यक्रम स्थगित हो गए। इस फैसले के बाद राजनीतिक सवाल उठने लगे कि आखिर ऐसे समय में कार्यक्रम क्यों रोके गए जब उनकी तैयारियां काफी आगे बढ़ चुकी थीं।

हालांकि निर्वाचन आयोग से जुड़े सूत्रों ने इन कार्यक्रमों के स्थगन को SIR विवाद से जोड़ने से इनकार किया। आयोग की ओर से यह कहा गया कि बड़े कार्यक्रमों में स्थानीय परिस्थितियों, मौसम, सामाजिक और शैक्षणिक परिस्थितियों तथा संसाधनों की उपलब्धता जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखना पड़ता है। इसके अलावा CEC के अन्य आधिकारिक कार्यक्रम भी होते हैं, जिसके कारण कार्यक्रमों की तारीख में बदलाव संभव है।

अब छत्तीसगढ़ का दौरा भी टला

छत्तीसगढ़ का दौरा इस पूरे घटनाक्रम में नया अध्याय है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को 7 और 8 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ जाना था। राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय ने उनके दौरे को लेकर आवश्यक प्रोटोकॉल की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं।

दौरे के दौरान ज्ञानेश कुमार के दंतेवाड़ा स्थित दंतेश्वरी माता मंदिर, बस्तर के प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात और कबीरधाम जिले के भोरमदेव मंदिर जाने का कार्यक्रम था। छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें इस यात्रा के दौरान राज्य अतिथि का दर्जा भी दिया था।

दौरे को देखते हुए प्रशासनिक और सुरक्षा तैयारियां की गई थीं। रायपुर प्रशासन, पुलिस और एयरपोर्ट से जुड़े अधिकारियों को भी आवश्यक व्यवस्थाओं के लिए निर्देश दिए गए थे। लेकिन यात्रा शुरू होने से पहले ही इसे स्थगित कर दिया गया।

राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय की ओर से जारी पत्र में दौरा स्थगित करने के लिए सिर्फ अपरिहार्य कारणों का उल्लेख किया गया। पत्र में यह भी बताया गया कि आयोग से संशोधित तारीख मिलने के बाद उसकी जानकारी अलग से दी जाएगी। फिलहाल नई तारीख सार्वजनिक नहीं की गई है।

क्या तीनों दौरों का संबंध SIR विवाद से है?

यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। एक तरफ तीन अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े कार्यक्रमों के स्थगित होने की बात सामने आई है। दूसरी तरफ इन घटनाओं का समय ऐसा है जब निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लेकर विपक्ष लगातार प्रदर्शन कर रहा है।

लेकिन उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में यह नहीं कहा गया है कि मेरठ, काशी या छत्तीसगढ़ का दौरा विपक्षी प्रदर्शन के कारण रद्द किया गया। छत्तीसगढ़ के मामले में आधिकारिक वजह अपरिहार्य कारण बताई गई है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के कार्यक्रमों को लेकर निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने कहा था कि कार्यक्रमों का स्थगन पहले से तय प्रक्रियाओं और अन्य व्यवस्थागत कारणों से संबंधित था।

इसलिए राजनीतिक घटनाक्रम और दौरे स्थगित होने के बीच समय का संबंध जरूर दिखाई देता है, लेकिन दोनों के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध आधिकारिक तौर पर स्थापित नहीं हुआ है। यही वजह है कि इस मामले को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दावे सामने आ रहे हैं।

SIR को लेकर क्यों है विवाद?

SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची की जांच और आवश्यक सुधार करना है। निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची को अपडेट रखने के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं।

मौजूदा विवाद में विपक्षी दलों की मुख्य आपत्ति मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया और उससे जुड़े दस्तावेजों तथा फैसलों को लेकर है। विपक्ष का आरोप है कि प्रक्रिया में ऐसे बदलाव किए गए हैं जिनसे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। विपक्षी नेता निर्वाचन आयोग से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

इसी विवाद में Form-6 भी चर्चा में आया है। यह फॉर्म नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इससे संबंधित प्रक्रिया में जरूरी नियमों का पालन नहीं किया गया। निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों का खंडन किया है और अपने निर्णयों को लेकर अलग पक्ष रखा है।

यह विवाद अब न्यायपालिका तक भी पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और SIR से संबंधित कई याचिकाएं विचाराधीन हैं। अदालत ने तत्काल CEC को निलंबित करने की मांग पर अंतरिम राहत नहीं दी, लेकिन संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर जवाब मांगा है।

विपक्ष का प्रदर्शन और इस्तीफे की मांग

SIR को लेकर विपक्षी दलों ने पिछले दिनों विरोध प्रदर्शन तेज किया है। विपक्ष का एक प्रमुख आरोप यह है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं है। इसी के आधार पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी की जा रही है।

दिल्ली में विपक्षी सांसदों और नेताओं ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किए हैं। कुछ विरोध प्रदर्शनों में पुलिस कार्रवाई और नेताओं को हिरासत में लिए जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। इससे चुनाव आयोग को लेकर राजनीतिक बहस और तीखी हो गई है।

विपक्षी दलों का कहना है कि निर्वाचन आयोग लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है और उसकी निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठना चाहिए। उनका तर्क है कि मतदाता सूची से जुड़े किसी भी बदलाव में व्यापक पारदर्शिता और सभी राजनीतिक पक्षों का विश्वास जरूरी है।

दूसरी ओर, इन आरोपों का अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं निकला है। किसी राजनीतिक दल द्वारा लगाया गया आरोप अपने आप में न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं होता। यही वजह है कि मौजूदा विवाद में आरोप, आयोग का पक्ष और अदालत में चल रही कार्यवाही तीनों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

छत्तीसगढ़ दौरे में क्या था कार्यक्रम?

अगर छत्तीसगढ़ यात्रा की बात करें तो यह पूरी तरह एक आधिकारिक दौरा था। इसमें निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ CEC को राज्य के कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटन स्थलों का दौरा करना था।

दंतेवाड़ा का दंतेश्वरी माता मंदिर, बस्तर का चित्रकोट जलप्रपात और कवर्धा का भोरमदेव मंदिर प्रस्तावित कार्यक्रम में शामिल थे। राज्य प्रशासन ने इसके लिए प्रोटोकॉल व्यवस्था भी तैयार की थी। ज्ञानेश कुमार को राज्य अतिथि घोषित किया गया था।

ऐसे आधिकारिक दौरों में सुरक्षा, परिवहन, स्थानीय प्रशासन और प्रोटोकॉल से जुड़े कई विभागों के बीच समन्वय की जरूरत होती है। इसलिए कार्यक्रम स्थगित होने पर पहले से की गई व्यवस्थाओं को भी रोकना पड़ा।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि संशोधित कार्यक्रम कब बनाया जाएगा। आयोग से नई तारीख मिलने के बाद राज्य प्रशासन को इसकी जानकारी देने की बात कही गई है।

उत्तराखंड, हिमाचल और लद्दाख के कार्यक्रम भी चर्चा में

मेरठ, काशी और छत्तीसगढ़ के अलावा ज्ञानेश कुमार के उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख के प्रस्तावित कार्यक्रमों के भी स्थगित या रद्द होने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार इन कार्यक्रमों की तारीखें सार्वजनिक रूप से अंतिम रूप दिए जाने से पहले ही उन्हें आगे बढ़ाया गया या रोक दिया गया।

इस वजह से उनके दौरों को लेकर एक व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि इन सभी कार्यक्रमों को एक ही कारण से जोड़ा जाना सही नहीं होगा। प्रत्येक कार्यक्रम के स्थगन के पीछे अलग प्रशासनिक या आधिकारिक वजह हो सकती है।

निर्वाचन आयोग की ओर से भी यह कहा गया है कि CEC और आयोग के अधिकारियों के दौरे कई तरह की परिस्थितियों के कारण बदलते रहते हैं। इसलिए केवल दौरे टलने के आधार पर किसी राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

CEC की सुरक्षा भी बढ़ाई गई

इसी बीच ज्ञानेश कुमार की सुरक्षा को लेकर भी खबरें सामने आई हैं। SIR को लेकर बढ़े विरोध प्रदर्शनों और उनके खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों के बीच उनकी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत किए जाने की जानकारी सामने आई है।

रिपोर्टों के अनुसार उनके आवास और निर्वाचन आयोग के मुख्यालय के आसपास अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। आयोग के कार्यालय के बाहर भी सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई है। हालांकि अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की सुरक्षा में वृद्धि व्यापक विरोध प्रदर्शनों की स्थिति को देखते हुए की गई है, इसे केवल CEC की व्यक्तिगत सुरक्षा से जोड़ना आवश्यक नहीं है।

यह घटनाक्रम बताता है कि विवाद अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसके कारण प्रशासनिक और सुरक्षा स्तर पर भी अतिरिक्त तैयारियां करनी पड़ रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट में भी मामला पहुंच चुका है

SIR और निर्वाचन आयोग से जुड़े विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा न्यायपालिका में चल रही कार्यवाही है। याचिकाकर्ताओं ने आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और कुछ फैसलों को लेकर सवाल उठाए हैं।

कुछ याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि आयोग के तीन सदस्यीय ढांचे में महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर मतभेद रहे और कुछ मामलों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठाए गए। इनमें Form-6 से जुड़े बदलावों का मुद्दा भी शामिल है।

हालांकि ये आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। निर्वाचन आयोग ने अपनी तरफ से इन दावों का विरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल निलंबन की मांग को स्वीकार नहीं किया, लेकिन मामले से जुड़े पक्षों को नोटिस जारी कर रिकॉर्ड देखने की प्रक्रिया शुरू की है। अदालत आगे यह देख सकती है कि संबंधित फैसले कानून और आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप लिए गए थे या नहीं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने अभी किसी पक्ष को दोषी ठहरा दिया है। न्यायिक प्रक्रिया में किसी मुद्दे पर रिकॉर्ड मांगना और नोटिस जारी करना अंतिम फैसला नहीं होता।

चुनाव आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण

पूरे विवाद में निर्वाचन आयोग का पक्ष भी समझना जरूरी है। आयोग का कहना है कि चुनाव संबंधी प्रक्रियाओं में मतदाता सूची की शुद्धता और अद्यतन स्थिति बनाए रखना आवश्यक है। आयोग ने SIR से जुड़े आरोपों पर अपना पक्ष रखा है और उसके अनुसार प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक विश्वसनीय बनाना है।

दूसरी तरफ विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में ऐसे लोगों को कठिनाई नहीं होनी चाहिए जो वैध मतदाता हैं। उनका जोर पारदर्शिता, दस्तावेजी प्रक्रिया और सार्वजनिक जांच पर है।

इसलिए विवाद केवल किसी एक अधिकारी के खिलाफ राजनीतिक विरोध का मामला नहीं है। इसके केंद्र में मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया, निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास जैसे व्यापक मुद्दे भी हैं।

लगातार दौरे टलने से क्यों बढ़ी चर्चा?

किसी वरिष्ठ संवैधानिक अधिकारी का दौरा प्रशासनिक कारणों से स्थगित होना अपने आप में असामान्य नहीं है। लेकिन जब एक ही अवधि में कई प्रस्तावित कार्यक्रमों के स्थगित होने की खबर सामने आती है और उसी समय संबंधित अधिकारी को लेकर राजनीतिक विवाद भी चल रहा हो, तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चाएं बढ़ती हैं।

यही स्थिति ज्ञानेश कुमार के मामले में दिखाई दे रही है। मेरठ और काशी के कार्यक्रम सितंबर में स्थगित हुए। इसके बाद छत्तीसगढ़ की 7 और 8 अक्टूबर की यात्रा भी टल गई। साथ ही अन्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रस्तावित कार्यक्रमों में भी बदलाव की खबरें सामने आई हैं।

लेकिन इन घटनाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि निर्वाचन आयोग ने दौरे स्थगित करने को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के दायरे में बताया है। इसलिए जब तक किसी आधिकारिक दस्तावेज या बयान में राजनीतिक विरोध को कारण नहीं बताया जाता, तब तक इसे निश्चित रूप से विरोध प्रदर्शन का परिणाम कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

आगे क्या होगा?

अब सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि ज्ञानेश कुमार के स्थगित दौरों की नई तारीखें कब घोषित होती हैं। छत्तीसगढ़ के मामले में राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि आयोग से संशोधित तारीख मिलने के बाद जानकारी साझा की जाएगी।

इसके साथ ही SIR विवाद पर न्यायिक प्रक्रिया भी आगे बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामलों के दौरान निर्वाचन आयोग को अपने फैसलों और प्रक्रिया से संबंधित रिकॉर्ड तथा स्पष्टीकरण देना होगा। अदालत की आगे की कार्यवाही इस विवाद के कानूनी पहलुओं को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

राजनीतिक स्तर पर भी विपक्ष का विरोध जारी रहने की संभावना है, जबकि निर्वाचन आयोग अपने प्रशासनिक और संवैधानिक कार्यों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा।

लोकतांत्रिक संस्थाओं में भरोसे का सवाल

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा केवल CEC का दौरा स्थगित होना नहीं है। इसके पीछे चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास का सवाल जुड़ा हुआ है।

भारत में निर्वाचन आयोग की भूमिका चुनाव कराने से कहीं व्यापक है। मतदाता सूची तैयार करना, उसका पुनरीक्षण करना, राजनीतिक दलों के साथ चुनावी प्रक्रिया का समन्वय करना और चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करना आयोग की जिम्मेदारियों का हिस्सा है।

इसी वजह से मतदाता सूची में बदलाव या पुनरीक्षण से जुड़ी कोई भी प्रक्रिया राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन जाती है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की नजर ऐसे फैसलों पर रहती है। यदि किसी प्रक्रिया पर विवाद पैदा होता है तो उसका समाधान पारदर्शी तरीके से करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होता है।

मौजूदा स्थिति में एक तरफ विपक्ष ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राजनीतिक विरोध कर रहा है, वहीं निर्वाचन आयोग दौरे स्थगित होने को प्रशासनिक कारणों से जोड़ रहा है। इन दोनों पक्षों के बीच वास्तविक तथ्य और अंतिम कानूनी स्थिति आने वाले समय में अधिक स्पष्ट हो सकती है।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मेरठ और काशी के बाद छत्तीसगढ़ का दौरा भी स्थगित हो चुका है। अन्य प्रस्तावित दौरों में बदलाव की खबरें भी सामने आई हैं। लेकिन आधिकारिक तौर पर इन स्थगनों को SIR विवाद या विपक्षी प्रदर्शन का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं बताया गया है। इसी वजह से मामले को लेकर राजनीतिक अटकलें और आधिकारिक स्पष्टीकरण दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।

आने वाले दिनों में तीन चीजें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहेंगी: स्थगित दौरों की नई तारीखें, SIR और Form-6 से जुड़े मामलों में अदालत की आगे की कार्यवाही और निर्वाचन आयोग तथा विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक टकराव। इन घटनाक्रमों से यह तय होगा कि मौजूदा विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान किस तरह सामने आता है।

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