फर्जी CBI कोर्ट, वीडियो कॉल पर सुनवाई और गिरफ्तारी की धमकी, झारखंड में शख्स से 1.20 करोड़ की साइबर ठगी

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झारखंड के साहिबगंज जिले से साइबर ठगी का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। साइबर अपराधियों ने खुद को केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI का अधिकारी बताकर एक व्यक्ति को करीब दो महीने तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराए रखा। आरोपियों ने पीड़ित को बताया कि वह एक गंभीर मामले में फंस चुका है और उसके खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई हो सकती है। इसके बाद उसे कानूनी कार्रवाई से बचाने का झांसा देकर अलग-अलग बैंक खातों में करीब 1.20 करोड़ रुपये ट्रांसफर करा लिए गए।

ठगी का तरीका इतना सुनियोजित था कि आरोपियों ने पीड़ित को वीडियो कॉल के जरिए कथित निगरानी में रखा। इतना ही नहीं, उसे असली अदालत जैसा दिखने वाले एक फर्जी कोर्टरूम में भी वीडियो कॉल के माध्यम से पेश कराया गया। वहां उसे CBI केस, गिरफ्तारी, जुर्माने और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया जाता था। करीब दो महीने तक चले इस पूरे घटनाक्रम के बाद जब पीड़ित को शक हुआ कि उसके साथ साइबर ठगी की जा रही है, तब उसने एक रिश्तेदार को इसकी जानकारी दी और पुलिस से संपर्क किया।

पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी है। साहिबगंज पुलिस ने आरोपियों तक पहुंचने और ठगी की रकम के पूरे लेनदेन का पता लगाने के लिए विशेष जांच दल यानी SIT का गठन किया है। पुलिस अब उन बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और अन्य माध्यमों की जांच कर रही है जिनका इस्तेमाल ठगी के लिए किया गया।

खुद को बताया CBI का वरिष्ठ अधिकारी

पीड़ित गौतम चंद्र दास के अनुसार, जून 2026 में उन्हें एक व्यक्ति का फोन आया था। फोन करने वाले ने अपना नाम प्रदीप सिंह बताया और खुद को CBI का वरिष्ठ अधिकारी बताया। उसने गौतम को कहा कि वह एक गंभीर मामले में फंस गए हैं और उनके खिलाफ CBI में केस दर्ज है।

शुरुआत में फोन पर दी गई जानकारी से पीड़ित घबरा गया। आरोपियों ने बातचीत को इस तरह आगे बढ़ाया कि उन्हें विश्वास होने लगा कि वास्तव में किसी केंद्रीय जांच एजेंसी की ओर से उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। इसके बाद गिरफ्तारी और जेल भेजे जाने का डर दिखाकर उन पर लगातार दबाव बनाया गया।

साइबर अपराधियों ने पीड़ित को यह विश्वास दिलाया कि यदि उन्होंने आरोपियों के निर्देशों का पालन नहीं किया तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। इसी डर का फायदा उठाकर उनसे पैसे की मांग शुरू कर दी गई।

वीडियो कॉल के जरिए किया डिजिटल अरेस्ट

आरोपियों ने केवल फोन कॉल तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने वीडियो कॉल के जरिए पीड़ित पर लगातार नजर रखने का नाटक किया। उसे बताया गया कि वह डिजिटल अरेस्ट में है और उसकी हर गतिविधि की निगरानी की जा रही है।

करीब दो महीने तक पीड़ित को इसी मानसिक दबाव में रखा गया। आरोपियों ने उसे बाहर जाने, किसी अन्य व्यक्ति से इस मामले के बारे में बात करने और उनकी अनुमति के बिना कोई कदम उठाने से रोकने की कोशिश की।

डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराधियों द्वारा अपनाया जाने वाला एक ऐसा तरीका है जिसमें ठग खुद को पुलिस, CBI, ED या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ित को गिरफ्तारी का डर दिखाते हैं। इसके बाद वीडियो कॉल या अन्य डिजिटल माध्यमों से उसे लगातार संपर्क में रखा जाता है और कानूनी कार्रवाई से बचाने के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं।

गौतम चंद्र दास भी इसी तरह के जाल में फंस गए।

फर्जी CBI कोर्ट में तीन बार पेशी

इस साइबर ठगी की सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि अपराधियों ने पीड़ित को फर्जी कोर्ट में पेश करने का भी इंतजाम किया। पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने एक ऐसा वीडियो कॉल सेटअप तैयार किया जिसे अदालत जैसा दिखाया गया।

गौतम को कथित CBI कोर्ट के सामने वीडियो कॉल के माध्यम से तीन बार पेश किया गया। इस दौरान उन्हें ऐसा महसूस कराया गया कि उनके खिलाफ किसी वास्तविक कानूनी प्रक्रिया के तहत सुनवाई चल रही है।

फर्जी सुनवाई के दौरान उन्हें गिरफ्तारी, जुर्माने और अन्य कानूनी कार्रवाई की धमकी दी जाती थी। आरोपियों ने उन्हें बताया कि यदि वह मामले को खत्म करवाना चाहते हैं और गिरफ्तारी से बचना चाहते हैं तो उन्हें बताए गए बैंक खातों में पैसे जमा करने होंगे।

इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य पीड़ित को यह विश्वास दिलाना था कि वह किसी वास्तविक सरकारी और न्यायिक कार्रवाई का सामना कर रहा है। इसी डर के कारण वह आरोपियों के निर्देशों का पालन करता रहा।

करीब 10 बार में ट्रांसफर हुए 1.20 करोड़

पुलिस के मुताबिक, साइबर अपराधियों ने पीड़ित से करीब 10 अलग-अलग ट्रांजैक्शन के जरिए कुल 1.20 करोड़ रुपये ट्रांसफर करवाए। रकम अलग-अलग बैंक खातों में भेजी गई।

जांच में सामने आया है कि पहला बड़ा ट्रांजैक्शन 20 जून 2026 को हुआ था। इस दौरान पीड़ित ने 50 लाख रुपये ट्रांसफर किए। इसके बाद भी आरोपियों की मांग जारी रही और अलग-अलग तारीखों पर उससे रकम मंगवाई जाती रही।

आखिरी ट्रांजैक्शन 24 अगस्त को किया गया, जिसमें करीब पांच लाख रुपये भेजे गए। इस तरह लगभग दो महीने के दौरान पीड़ित से कुल 1.20 करोड़ रुपये ठग लिए गए।

यह रकम पीड़ित ने अपनी बेटी की शादी के लिए काफी समय से जमा करके रखी थी। इसलिए इस साइबर अपराध से उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक रूप से भी गहरा झटका लगा है।

बेटी की शादी के लिए जमा किए थे पैसे

गौतम चंद्र दास ने पुलिस को बताया कि उन्होंने इतनी बड़ी रकम अपनी बेटी की शादी के लिए बचाकर रखी थी। उन्होंने मेहनत से पैसा जमा किया था, लेकिन साइबर अपराधियों ने कुछ ही हफ्तों में उन्हें करोड़ों रुपये से वंचित कर दिया।

ठगों ने कथित CBI केस और गिरफ्तारी का डर दिखाकर पीड़ित को इतना दबाव में रखा कि वह बार-बार पैसे भेजता रहा। उन्हें उम्मीद थी कि पैसे देने के बाद मामला खत्म हो जाएगा और वह कानूनी कार्रवाई से बच जाएंगे।

लेकिन रकम भेजने के बावजूद आरोपियों की मांग बंद नहीं हुई। जब लगातार पैसे मांगे जाने लगे और पूरी प्रक्रिया संदिग्ध लगने लगी, तब पीड़ित को अपने साथ हुई धोखाधड़ी का एहसास हुआ।

ठगी का एहसास होने के बाद रिश्तेदार को बताई बात

करीब दो महीने तक आरोपियों के निर्देशों का पालन करने के बाद गौतम को समझ आया कि उनके साथ धोखाधड़ी हो रही है। इसके बाद उन्होंने सबसे पहले अपने एक रिश्तेदार को पूरी घटना के बारे में बताया।

रिश्तेदार से चर्चा करने के बाद उन्हें स्थिति की गंभीरता का अंदाजा हुआ। इसके बाद उन्होंने पुलिस से संपर्क किया और पूरे मामले की जानकारी दी।

शिकायत मिलने के बाद साहिबगंज पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी। पुलिस अधिकारियों ने घटनाक्रम और बैंक लेनदेन से संबंधित जानकारी जुटानी शुरू की।

पुलिस ने गठित की SIT

मामले की गंभीरता को देखते हुए साहिबगंज के पुलिस अधीक्षक अमित कुमार सिंह ने जांच के लिए विशेष जांच दल यानी SIT गठित की है। इस टीम का नेतृत्व मुख्यालय DSP और साइबर सेल के नोडल पदाधिकारी रविकांत साव कर रहे हैं।

SIT में बरहरवा इंस्पेक्टर संतोष राणा, थाना प्रभारी सुमित कुमार सिंह, सब इंस्पेक्टर अनिल कुमार, प्रदीप महतो, साइबर सेल प्रभारी पंकज वर्मा समेत अन्य पुलिस अधिकारियों को शामिल किया गया है।

टीम अब मामले के हर पहलू की जांच कर रही है। पुलिस का मुख्य उद्देश्य ठगी में इस्तेमाल हुए बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की पहचान करना है। इसके साथ ही यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि ठगी की रकम आखिर किन खातों में पहुंची और वहां से आगे कहां भेजी गई।

ट्रांजैक्शन ट्रेल खंगाल रही पुलिस

इतनी बड़ी रकम की साइबर ठगी में बैंक ट्रांजैक्शन का रिकॉर्ड जांच के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है। पुलिस ने उन सभी खातों की जानकारी जुटानी शुरू कर दी है जिनमें पीड़ित से पैसे ट्रांसफर करवाए गए।

जांच टीम यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि बैंक खाते सीधे आरोपियों के नाम पर थे या साइबर अपराधियों ने दूसरे लोगों के खातों का इस्तेमाल किया। इसके अलावा रकम को आगे किन खातों में भेजा गया, इसका भी पता लगाया जा रहा है।

मोबाइल नंबरों और कॉल रिकॉर्ड की जांच भी की जा रही है। आरोपियों ने जिस तरह से लगातार वीडियो कॉल के माध्यम से पीड़ित को संपर्क में रखा, उसके डिजिटल रिकॉर्ड से भी जांच में महत्वपूर्ण सुराग मिलने की उम्मीद है।

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बढ़ रही ठगी

इस मामले ने एक बार फिर डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी की गंभीरता को सामने ला दिया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में साइबर अपराधी सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर लोगों को डराने और पैसे ऐंठने के लिए इसी तरह के तरीके अपना रहे हैं।

ठग अक्सर लोगों को फोन करके बताते हैं कि उनका मोबाइल नंबर, बैंक खाता या पहचान किसी अपराध से जुड़ी हुई है। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार करने या पूछताछ के लिए हिरासत में लेने की धमकी दी जाती है।

वीडियो कॉल के जरिए उन्हें कथित अधिकारी के सामने बैठने को कहा जाता है और कई बार फर्जी दस्तावेज या फर्जी कोर्ट की स्क्रीन दिखाकर विश्वास पैदा किया जाता है। इसके बाद केस खत्म करने, जांच में सहयोग करने या गिरफ्तारी से बचने के नाम पर रकम मांगी जाती है।

गौतम चंद्र दास के मामले में भी इसी तरह का तरीका अपनाए जाने का आरोप है।

फर्जी कोर्ट ने बढ़ाया पीड़ित का डर

आरोपियों द्वारा फर्जी कोर्टरूम तैयार करना इस मामले की सबसे गंभीर बातों में से एक है। सामान्य व्यक्ति के लिए कोर्ट जैसी व्यवस्था देखकर यह मान लेना आसान हो सकता है कि सामने चल रही कार्रवाई वास्तविक है।

पीड़ित को तीन बार कथित CBI कोर्ट में वीडियो कॉल के जरिए पेश कराया गया। वहां कानूनी प्रक्रिया जैसा माहौल बनाया गया और उसे लगातार यह विश्वास दिलाया गया कि उसके खिलाफ वास्तविक मामला चल रहा है।

अपराधियों ने इसी डर का फायदा उठाया और पीड़ित को पैसे भेजने के लिए मजबूर किया। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी कोर्ट तैयार करने और वीडियो कॉल संचालित करने में कितने लोग शामिल थे।

जांच के दायरे में पूरा साइबर नेटवर्क

पुलिस केवल एक या दो आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश नहीं कर रही है, बल्कि पूरे नेटवर्क का पता लगाने पर ध्यान दे रही है। इतने बड़े स्तर की ठगी में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग भूमिका होने की आशंका रहती है।

कुछ लोग फर्जी पहचान के साथ फोन कर सकते हैं, कुछ बैंक खातों की व्यवस्था कर सकते हैं और कुछ लोग रकम को एक खाते से दूसरे खाते में भेजने का काम कर सकते हैं। इसी वजह से पुलिस बैंकिंग और डिजिटल रिकॉर्ड को जोड़कर पूरे नेटवर्क की जानकारी जुटा रही है।

SIT यह भी पता लगाने की कोशिश करेगी कि आरोपियों ने पीड़ित की निजी जानकारी कहां से हासिल की थी। यदि उन्हें पहले से उसकी आर्थिक स्थिति या बैंकिंग गतिविधियों की जानकारी थी, तो यह भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

लोगों को सतर्क रहने की जरूरत

इस घटना से एक बार फिर यह संदेश मिलता है कि फोन या वीडियो कॉल पर किसी भी व्यक्ति के सरकारी अधिकारी होने के दावे पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए। CBI, पुलिस या किसी अन्य सरकारी एजेंसी के नाम का इस्तेमाल करके डर पैदा करना साइबर ठगों का आम तरीका बन चुका है।

यदि कोई व्यक्ति वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी की धमकी देता है या किसी मामले को खत्म करने के लिए पैसे मांगता है, तो घबराने के बजाय संबंधित विभाग या स्थानीय पुलिस से आधिकारिक माध्यम से संपर्क करना चाहिए।

किसी भी परिस्थिति में अज्ञात व्यक्ति द्वारा बताए गए बैंक खाते में बड़ी रकम ट्रांसफर नहीं करनी चाहिए। साथ ही OTP, बैंक पासवर्ड, PIN या अन्य संवेदनशील जानकारी साझा करने से भी बचना जरूरी है।

करोड़ों की ठगी के बाद पुलिस की चुनौती

साहिबगंज में 1.20 करोड़ रुपये की यह ठगी पुलिस के लिए भी गंभीर चुनौती है। इतनी बड़ी रकम कई खातों के जरिए आगे भेजी गई हो सकती है। इसलिए पैसे की पूरी ट्रेल का पता लगाने में समय लग सकता है।

पुलिस की SIT बैंकिंग रिकॉर्ड, मोबाइल नंबरों और डिजिटल गतिविधियों की जांच के आधार पर आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। यदि समय रहते रकम के कुछ हिस्से को फ्रीज या रिकवर किया जा सका तो पीड़ित को राहत मिल सकती है।

हालांकि, इस तरह के मामलों में रकम कई खातों में तेजी से ट्रांसफर कर दी जाती है। इसलिए जांच एजेंसियों के लिए जल्द कार्रवाई करना बेहद जरूरी होता है।

फिलहाल साहिबगंज पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और SIT पूरे घटनाक्रम की पड़ताल कर रही है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि कथित CBI अधिकारी कौन थे, फर्जी कोर्ट में कौन-कौन लोग शामिल थे, रकम किन बैंक खातों में गई और इस पूरे साइबर नेटवर्क का संचालन कहां से किया जा रहा था।

साहिबगंज की यह घटना बताती है कि साइबर अपराधी अब केवल फोन पर धमकी देकर ठगी नहीं कर रहे, बल्कि फर्जी अधिकारी, वीडियो कॉल, डिजिटल अरेस्ट और नकली अदालत जैसी पूरी व्यवस्था तैयार करके लोगों को विश्वास में ले रहे हैं। करीब दो महीने तक चले इस मामले में बेटी की शादी के लिए बचाई गई 1.20 करोड़ रुपये की रकम गंवाने वाले पीड़ित के सामने अब पुलिस जांच से ही उम्मीद है।

पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ यह साफ होने की उम्मीद है कि इस संगठित साइबर ठगी के पीछे कौन लोग हैं और रकम का इस्तेमाल किस तरह किया गया। फिलहाल SIT बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और ट्रांजैक्शन की कड़ियों को जोड़कर आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।

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