
मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के रुख में भारत को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जिस नेता ने 2023 के राष्ट्रपति चुनाव में ‘इंडिया आउट’ अभियान के जरिए सत्ता हासिल की थी और भारत के साथ रिश्तों को लेकर कड़ा रुख अपनाया था, वही मुइज्जू अब भारत की खुलकर तारीफ कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने भारत की मदद से बन रहे थिलामाले ब्रिज का निरीक्षण किया और इस परियोजना को मालदीव और भारत के बीच मजबूत तथा लंबे समय से चले आ रहे संबंधों का प्रतीक बताया।
मुइज्जू ने इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत सरकार और मालदीव में भारत के उच्चायुक्त जी. बालासुब्रमण्यम का आभार जताया। उन्होंने कहा कि ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट में भारत ने जिस प्राथमिकता और प्रतिबद्धता के साथ सहयोग किया है, वह दोनों देशों के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है। यह बयान उस समय आया है जब कुछ साल पहले तक मुइज्जू की राजनीति भारत से दूरी और चीन के साथ नजदीकी बढ़ाने के संदेश पर आधारित मानी जाती थी।
‘इंडिया आउट’ से भारत की तारीफ तक
मोहम्मद मुइज्जू 2023 में मालदीव के राष्ट्रपति बने थे। उनके चुनाव अभियान में ‘इंडिया आउट’ एक प्रमुख राजनीतिक नारा था। इस अभियान के तहत मालदीव में मौजूद भारतीय सैन्य कर्मियों की भूमिका और भारत के साथ देश के करीबी संबंधों पर सवाल उठाए गए थे।
राष्ट्रपति बनने के बाद मुइज्जू ने भारत के बजाय चीन के साथ अपने संबंधों को प्राथमिकता देने का संकेत दिया। उनकी पहली विदेश यात्रा भी चीन की थी। वहां उन्होंने चीन को मालदीव का करीबी सहयोगी और विकास साझेदार बताया था। दोनों देशों ने अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए कई समझौते भी किए।
लेकिन करीब तीन साल के भीतर परिस्थितियों में काफी बदलाव आया है। अब मुइज्जू भारत के साथ विकास परियोजनाओं की तारीफ कर रहे हैं और भारत को मालदीव की आर्थिक तथा बुनियादी ढांचा संबंधी जरूरतों में महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहे हैं।
थिलामाले ब्रिज बना बदलाव का प्रतीक
मुइज्जू ने 30 अगस्त को राष्ट्रीय इंजीनियर्स दिवस के अवसर पर थिलामाले ब्रिज के नए जुड़े हिस्से का निरीक्षण किया। उन्होंने माले से विलिमाले तक बने नए कनेक्शन पर पैदल चलकर परियोजना की प्रगति देखी।
इस मौके पर भारतीय उच्चायुक्त जी. बालासुब्रमण्यम और परियोजना से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। मुइज्जू ने कहा कि यह परियोजना मालदीव और भारत के बीच मजबूत और स्थायी मित्रता का प्रतीक है।
मालदीव के राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, मुइज्जू ने ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट को भारत सरकार की ओर से दी गई विशेष प्राथमिकता की सराहना की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत सरकार और भारतीय उच्चायुक्त के प्रति आभार भी व्यक्त किया।
यह बयान इसलिए खास है क्योंकि कुछ साल पहले मुइज्जू का राजनीतिक संदेश भारत से दूरी बनाने पर केंद्रित था। अब भारत के सहयोग से तैयार हो रहे एक बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को वह दोनों देशों की दोस्ती की मिसाल बता रहे हैं।
क्या है ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट?
ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट यानी GMCP मालदीव की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक है। करीब 6.7 किलोमीटर लंबी इस परियोजना के जरिए राजधानी माले को विलिमाले, गुलहिफाल्हू और थिलाफुशी से जोड़ा जाना है।
इस परियोजना में पुलों, सड़कों और कॉजवे का नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। इसके पूरा होने के बाद मालदीव की राजधानी को एयरपोर्ट और प्रमुख औद्योगिक तथा बंदरगाह क्षेत्रों से बेहतर तरीके से जोड़ा जा सकेगा।
परियोजना के माले-विलिमाले हिस्से का मुख्य ढांचा अब एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुका है। हालांकि पूरे प्रोजेक्ट को पूरा होने में अभी और समय लगेगा और बाकी हिस्सों पर काम जारी है। मुइज्जू ने उम्मीद जताई है कि मौजूदा गति बनी रही तो पूरा प्रोजेक्ट लगभग एक साल के भीतर पूरा किया जा सकता है।
भारत ने कितनी मदद की?
GMCP में भारत की आर्थिक और तकनीकी भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है। इस परियोजना को भारत की ओर से 500 मिलियन डॉलर के वित्तीय पैकेज के जरिए समर्थन दिया जा रहा है।
इसमें भारत के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक की ओर से 400 मिलियन डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट और भारत सरकार की ओर से 100 मिलियन डॉलर का अनुदान शामिल है। परियोजना का निर्माण भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी अफकॉन्स को दिया गया है।
इस तरह यह सिर्फ एक पुल बनाने की परियोजना नहीं है, बल्कि भारत और मालदीव के बीच आर्थिक तथा विकास साझेदारी का बड़ा उदाहरण है। भारत की वित्तीय सहायता और भारतीय कंपनी की तकनीकी विशेषज्ञता के कारण परियोजना आगे बढ़ रही है।
मुइज्जू के रुख में बदलाव क्यों आया?
मुइज्जू को लंबे समय तक चीन के प्रति झुकाव रखने वाला नेता माना जाता रहा है। सत्ता में आने के बाद उन्होंने चीन के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश की। उनकी पहली विदेश यात्रा चीन की थी और दोनों देशों ने कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के समझौते किए।
लेकिन मालदीव की आर्थिक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण बनी रहीं। भारी कर्ज और वित्तीय दबाव के बीच बड़े पैमाने पर नई वित्तीय सहायता हासिल करना आसान नहीं था। इसी बीच भारत ने मालदीव को आर्थिक संकट से निपटने में महत्वपूर्ण मदद दी।
2024 में भारत ने मालदीव को तत्काल वित्तीय राहत उपलब्ध कराने में भूमिका निभाई। इसके बाद मुइज्जू का भारत को लेकर रुख धीरे-धीरे बदलता दिखाई दिया। अक्टूबर 2024 में भारत यात्रा के दौरान उन्होंने भारत की मदद के लिए आभार जताया और मालदीव को भारत का सच्चा दोस्त बनाए रखने की बात कही।
आर्थिक संकट ने बदली रणनीति?
मालदीव की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर काफी निर्भर है और देश के लिए विदेशी मुद्रा तथा वित्तीय स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय कई देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना उसके लिए जरूरी है।
मुइज्जू ने शुरुआत में चीन के साथ संबंधों को प्राथमिकता देने की कोशिश की, लेकिन भारत के साथ पहले से मौजूद आर्थिक और विकास साझेदारी को पूरी तरह नजरअंदाज करना मुश्किल साबित हुआ।
भारत मालदीव को केवल वित्तीय सहायता ही नहीं देता, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, शिक्षा, क्षमता निर्माण, कनेक्टिविटी और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग करता है। मालदीव के विदेश मंत्रालय ने भी कई मौकों पर भारत की विकास सहायता और सामुदायिक परियोजनाओं की सराहना की है।
यही वजह है कि मुइज्जू सरकार ने भारत के साथ सहयोग को फिर से प्राथमिकता देना शुरू किया है।
भारत ने कभी संबंध तोड़े नहीं
मुइज्जू के सत्ता में आने के बाद भारत-मालदीव संबंधों में तनाव जरूर बढ़ा था, लेकिन भारत ने मालदीव के साथ विकास परियोजनाओं को पूरी तरह रोकने का रास्ता नहीं अपनाया। कई परियोजनाएं राजनीतिक बदलाव के बावजूद जारी रहीं।
GMCP इसका प्रमुख उदाहरण है। यह परियोजना मुइज्जू के सत्ता में आने से पहले शुरू हुई थी, लेकिन सरकार बदलने के बाद भी भारत ने अपनी प्रतिबद्धता जारी रखी। इससे यह संदेश गया कि भारत-मालदीव विकास संबंध केवल किसी एक सरकार या नेता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संस्थागत साझेदारी पर आधारित हैं।
भारत की यही नीति अब मुइज्जू के बदले हुए रुख के पीछे महत्वपूर्ण कारणों में से एक मानी जा रही है।
मुइज्जू ने मोदी का विशेष रूप से किया धन्यवाद
थिलामाले ब्रिज के निरीक्षण के दौरान मुइज्जू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशेष भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत सरकार, खासकर प्रधानमंत्री मोदी ने इस परियोजना को विशेष प्राथमिकता दी है।
उन्होंने भारत सरकार और भारतीय उच्चायुक्त जी. बालासुब्रमण्यम का भी आभार जताया। मुइज्जू के अनुसार, परियोजना में दोनों देशों की तकनीकी टीमों के संयुक्त प्रयासों से महत्वपूर्ण प्रगति संभव हुई है।
मुइज्जू का यह सार्वजनिक धन्यवाद उनके पुराने राजनीतिक रुख से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। इसी कारण उनका बयान भारत-मालदीव संबंधों में बदलाव का प्रतीक माना जा रहा है।
2024 में भी भारत की मदद स्वीकार की
मुइज्जू का भारत के प्रति बदलता रुख अचानक नहीं आया है। 2024 में मालदीव गंभीर वित्तीय दबाव का सामना कर रहा था। उस समय भारत ने वित्तीय सहायता के जरिए मालदीव को राहत देने में भूमिका निभाई।
भारत और मालदीव के बीच मुद्रा विनिमय व्यवस्था के तहत भारत ने महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई। 2026 में भी मालदीव के वित्त मंत्रालय और केंद्रीय बैंक से जुड़े प्रयासों में भारत की सहायता जारी रही। अप्रैल 2026 में मालदीव ने भारत के साथ 400 मिलियन डॉलर की पिछली मुद्रा स्वैप सुविधा का निपटारा किया और भारत की ओर से 30 अरब भारतीय रुपये की नई स्वैप सुविधा को स्वीकार किया।
इससे पता चलता है कि दोनों देशों के आर्थिक संबंध केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं हैं।
भारत-मालदीव संबंधों में आया नया दौर
मुइज्जू सरकार और भारत के बीच अब संबंध पहले की तुलना में काफी अधिक व्यावहारिक दिखाई दे रहे हैं। दोनों देश विकास, व्यापार, कनेक्टिविटी, समुद्री सुरक्षा और लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं।
2024 में दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक और समुद्री सुरक्षा साझेदारी का विजन भी तैयार किया था। इसमें बुनियादी ढांचा, व्यापार, पर्यटन, डिजिटल तकनीक, सुरक्षा, स्वास्थ्य और समुद्री सहयोग जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं।
भारत के लिए मालदीव का रणनीतिक महत्व भी काफी ज्यादा है। हिंद महासागर में स्थित मालदीव समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत के लिए मालदीव के साथ स्थिर और मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना रणनीतिक प्राथमिकता है।
चीन के साथ रिश्ते भी बने रहेंगे
मुइज्जू के भारत के प्रति बदलते रुख का मतलब यह नहीं है कि मालदीव चीन से पूरी तरह दूरी बना रहा है। मालदीव चीन के साथ भी अपने आर्थिक और राजनीतिक संबंध बनाए रखना चाहता है।
मुइज्जू की रणनीति अब संभवतः दोनों देशों के बीच संतुलन बनाने की है। चीन से निवेश और आर्थिक सहयोग हासिल करना और भारत से विकास, कनेक्टिविटी तथा वित्तीय सहयोग लेना मालदीव के लिए व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
हालांकि, भारत के साथ संबंधों को लेकर मुइज्जू के मौजूदा बयान यह जरूर दिखाते हैं कि उनकी सरकार अब नई दिल्ली के साथ टकराव की राजनीति के बजाय सहयोग को अधिक महत्व दे रही है।
भारत के लिए क्या मायने रखता है?
भारत के लिए मुइज्जू का बदला हुआ रुख कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। 2023 के बाद भारत और मालदीव के संबंधों में जिस तरह तनाव पैदा हुआ था, उसके बाद अब दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग बढ़ना नई दिल्ली के लिए सकारात्मक संकेत है।
भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति में मालदीव का महत्वपूर्ण स्थान है। भारत लगातार पड़ोसी देशों में विकास परियोजनाओं और आर्थिक सहयोग के जरिए अपनी साझेदारी मजबूत करने की कोशिश करता रहा है।
थिलामाले ब्रिज जैसी परियोजनाएं इसी नीति का हिस्सा हैं। ऐसी परियोजनाओं से भारत की भूमिका केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आम लोगों के जीवन और आर्थिक विकास से भी जुड़ती है।
मालदीव के लिए पुल कितना महत्वपूर्ण है?
थिलामाले ब्रिज मालदीव के लिए सिर्फ भारत के साथ दोस्ती का प्रतीक नहीं है। यह देश के भीतर कनेक्टिविटी को बदलने वाली परियोजना भी है।
माले, विलिमाले, गुलहिफाल्हू और थिलाफुशी के बीच बेहतर संपर्क से लोगों की आवाजाही आसान होगी। इससे व्यापार, रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता है।
मालदीव जैसे द्वीपीय देश में अलग-अलग द्वीपों को सड़क और पुलों के जरिए जोड़ना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए GMCP को देश के भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए महत्वपूर्ण परियोजना माना जा रहा है।
मुइज्जू ने भी कहा है कि यह परियोजना ग्रेटर माले क्षेत्र के विकास में बड़ा योगदान दे सकती है।
‘इंडिया आउट’ की राजनीति से आगे बढ़ते मुइज्जू
मुइज्जू का राजनीतिक सफर भारत के संदर्भ में काफी दिलचस्प रहा है। सत्ता में आने से पहले उनकी राजनीति में भारत से दूरी का संदेश प्रमुख था। सत्ता में आने के बाद भी उन्होंने भारतीय सैन्य कर्मियों की मौजूदगी और भारत की भूमिका को लेकर कड़ा रुख अपनाया।
लेकिन अब वही राष्ट्रपति भारत की सहायता से बन रहे पुल को दोनों देशों की दोस्ती का प्रतीक बता रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और भारत सरकार को सार्वजनिक रूप से धन्यवाद दिया है।
यह बदलाव बताता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राजनीतिक नारों के साथ-साथ आर्थिक और रणनीतिक वास्तविकताएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मालदीव को विकास और वित्तीय स्थिरता के लिए भारत जैसे पड़ोसी की जरूरत है, जबकि भारत के लिए भी मालदीव हिंद महासागर में महत्वपूर्ण साझेदार है।
क्या भारत-मालदीव रिश्ते पूरी तरह सामान्य हो गए?
हालांकि दोनों देशों के संबंधों में स्पष्ट सुधार दिखाई दे रहा है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी मतभेद पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं। भारत और मालदीव के बीच समुद्री सुरक्षा, सैन्य सहयोग, पर्यटन, आर्थिक साझेदारी और क्षेत्रीय रणनीति जैसे कई मुद्दे हैं जिन पर लगातार संवाद की जरूरत रहेगी।
फिर भी मुइज्जू के हालिया बयान एक सकारात्मक बदलाव का संकेत देते हैं। खासकर तब जब उन्होंने भारत की सहायता से बन रही परियोजना को सार्वजनिक रूप से दोनों देशों की दोस्ती से जोड़ा है।
मुइज्जू की सरकार अब भारत के साथ उन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में रुचि दिखा रही है जो मालदीव की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे के लिए महत्वपूर्ण हैं।
बदलते रिश्तों की तस्वीर
मुइज्जू का ‘इंडिया आउट’ से भारत को धन्यवाद देने तक का सफर भारत-मालदीव संबंधों में आए बदलाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। 2023 में सत्ता में आने के बाद भारत को लेकर उनका रुख बेहद सख्त था। चीन के साथ संबंधों को बढ़ाने की कोशिश भी उनकी विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही।
लेकिन आर्थिक चुनौतियों, विकास की जरूरत और भारत की लगातार सहायता ने दोनों देशों को फिर से करीब लाने में भूमिका निभाई। अब मुइज्जू भारत के सहयोग से बन रहे थिलामाले ब्रिज को दोस्ती का प्रतीक बता रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी का आभार व्यक्त कर रहे हैं।
यह बदलाव केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है। भारत और मालदीव के बीच वित्तीय सहयोग, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और विकास साझेदारी लगातार आगे बढ़ रही है। भारत की ओर से दी गई वित्तीय सहायता और बड़े प्रोजेक्ट्स में भागीदारी ने मालदीव के लिए नई दिल्ली की उपयोगिता को बनाए रखा है।
इसलिए मुइज्जू का बदला हुआ रुख आने वाले समय में भारत-मालदीव संबंधों के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है। जिस ‘इंडिया आउट’ राजनीति ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाने में भूमिका निभाई थी, वही नेता अब भारत की विकास साझेदारी की सराहना कर रहा है।
थिलामाले ब्रिज की तस्वीर इस बदलाव को सबसे साफ तरीके से दिखाती है। एक ओर भारत की आर्थिक और तकनीकी सहायता से मालदीव में एक विशाल कनेक्टिविटी परियोजना आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर मालदीव के राष्ट्रपति स्वयं इसे दोनों देशों की मजबूत और स्थायी दोस्ती का प्रतीक बता रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह बदला हुआ रुख कितना स्थायी साबित होता है और भारत-मालदीव संबंध विकास तथा रणनीतिक साझेदारी के किस नए स्तर तक पहुंचते हैं।