एक हादसे ने जगाया सिस्टम: इंजीनियर की मौत के बाद ग्रेटर नोएडा की सड़कों पर शुरू हुई सुरक्षा मुहिम

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कभी-कभी एक दुखद घटना पूरे सिस्टम को आईना दिखा देती है। ग्रेटर नोएडा में एक युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर की सड़क हादसे में मौत ने ठीक यही काम किया है। इस घटना के बाद ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी में हड़कंप मच गया है और अब उन सड़कों पर तेजी से सुरक्षा इंतजाम किए जा रहे हैं, जिन्हें लंबे समय से खतरनाक माना जा रहा था। हादसे के बाद सड़कों पर रिफ्लेक्टिंग पट्टियां, नई मार्किंग और चेतावनी संकेत लगाने का काम युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया गया है।

यह हादसा नोएडा के सेक्टर-150 इलाके में हुआ, जहां रात के समय तेज रफ्तार और खराब विजिबिलिटी एक युवा इंजीनियर की जान ले बैठी। शुरुआती जांच में सामने आया कि जिस सड़क पर यह दुर्घटना हुई, वहां न तो पर्याप्त रिफ्लेक्टिव लाइनें थीं और न ही स्पष्ट रोड मार्किंग। अंधेरे में सड़क की दिशा और किनारों का अंदाजा लगाना मुश्किल था, जिससे वाहन चालक को समय रहते खतरे का एहसास नहीं हो सका।

इस एक मौत ने प्रशासन की वर्षों पुरानी लापरवाही को उजागर कर दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे लंबे समय से इन सड़कों की खराब हालत और सुरक्षा उपायों की कमी को लेकर शिकायत करते रहे थे, लेकिन हर बार फाइलें आगे बढ़ने के बजाय दबा दी जाती थीं। अब जब एक पढ़ा-लिखा युवा अपनी जान गंवा चुका है, तब जाकर सिस्टम हरकत में आया है।

हादसे के तुरंत बाद ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के वरिष्ठ अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया। सड़क की स्थिति, लाइटिंग, मोड़ और विजिबिलिटी से जुड़े सभी पहलुओं की समीक्षा की गई। निरीक्षण के दौरान यह बात साफ हुई कि कई हिस्सों में रोड मार्किंग लगभग मिट चुकी थी और कई जगहों पर रिफ्लेक्टिव स्ट्रिप्स या कैट-आई बिल्कुल नहीं थे।

इसके बाद अथॉरिटी ने तत्काल कार्रवाई के आदेश जारी किए। सबसे पहले उन सड़कों की सूची तैयार की गई, जहां हादसों की आशंका ज्यादा रहती है। सेक्टर-150, एक्सप्रेसवे से जुड़ी सर्विस रोड और कुछ अंदरूनी सड़कों को प्राथमिकता में रखा गया। इन सभी इलाकों में रातों-रात पेंटिंग, रिफ्लेक्टिंग पट्टी और नए संकेतक लगाने का काम शुरू कर दिया गया।

अधिकारियों का कहना है कि अब सड़क सुरक्षा को सिर्फ कागजी योजना नहीं, बल्कि जमीनी प्राथमिकता बनाया जा रहा है। नई रोड मार्किंग में हाई-क्वालिटी रिफ्लेक्टिव पेंट का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि रात में भी लेन और किनारे साफ दिखाई दें। साथ ही, मोड़ों पर अतिरिक्त रिफ्लेक्टर्स और चेतावनी बोर्ड लगाए जा रहे हैं, जिससे ड्राइवर पहले से सतर्क हो सकें।

इस घटना के बाद यह सवाल भी उठा है कि क्या प्रशासन हर बार किसी मौत का इंतजार करता है, तब जाकर सुधार करता है? स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह हादसा टाला जा सकता था, अगर समय रहते बुनियादी सुरक्षा इंतजाम कर लिए जाते। कई लोगों ने बताया कि उस इलाके में पहले भी छोटे-मोटे हादसे होते रहे हैं, लेकिन उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया।

इंजीनियर की मौत के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा फूटा। कई यूजर्स ने सड़कों की तस्वीरें शेयर कर दिखाया कि कैसे करोड़ों के प्रोजेक्ट वाली स्मार्ट सिटी में बुनियादी सड़क सुरक्षा की हालत खराब है। दबाव बढ़ने के बाद अथॉरिटी को मजबूरन तेजी से काम शुरू करना पड़ा।

ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अब सिर्फ उसी सड़क पर नहीं, बल्कि पूरे शहर में रोड सेफ्टी ऑडिट कराया जाएगा। जिन इलाकों में स्ट्रीटलाइट, रोड मार्किंग या साइन बोर्ड की कमी पाई जाएगी, वहां चरणबद्ध तरीके से सुधार किया जाएगा। उनका दावा है कि अगले कुछ हफ्तों में शहर की प्रमुख सड़कों पर विजिबिलिटी काफी बेहतर हो जाएगी।

यातायात विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क हादसों में खराब रोड डिजाइन और कमजोर मार्किंग एक बड़ा कारण होती है। खासतौर पर रात के समय, जब ड्राइवर की आंखें रिफ्लेक्टिव संकेतों पर निर्भर करती हैं। अगर सड़क की सीमाएं साफ न दिखें, तो मामूली सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। इस नजरिए से देखा जाए, तो ग्रेटर नोएडा की कई सड़कों पर जोखिम पहले से मौजूद था।

इस हादसे ने यह भी दिखाया कि शहरी विकास सिर्फ चौड़ी सड़कें बनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। सुरक्षा संकेत, सही पेंटिंग, रोशनी और नियमित मेंटेनेंस—ये सभी उतने ही जरूरी हैं। बिना इन इंतजामों के आधुनिक सड़कें भी मौत का जाल बन सकती हैं।

मृतक इंजीनियर के परिवार के लिए यह सुधार बहुत देर से आया है। उनके परिजनों का कहना है कि अगर प्रशासन ने पहले ध्यान दिया होता, तो आज उनका बेटा जिंदा होता। उन्होंने मांग की है कि इस हादसे के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोहराई न जाए।

इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े किए हैं। अक्सर सड़क सुरक्षा के लिए बजट तो पास हो जाता है, लेकिन जमीनी काम या तो अधूरा रहता है या गुणवत्ता से समझौता किया जाता है। हादसे के बाद अचानक काम शुरू होना यह दिखाता है कि सिस्टम ज्यादातर प्रतिक्रियात्मक है, न कि निवारक।

अब अथॉरिटी यह दावा कर रही है कि वह आगे से हादसों का इंतजार नहीं करेगी, बल्कि पहले ही खतरनाक सड़कों की पहचान कर सुधार करेगी। इसके लिए ट्रैफिक पुलिस, नगर निगम और अथॉरिटी के बीच समन्वय बढ़ाने की भी बात कही जा रही है।

स्थानीय लोग उम्मीद कर रहे हैं कि यह मुहिम सिर्फ कुछ दिनों की औपचारिकता न बनकर रह जाए, बल्कि स्थायी बदलाव लाए। उनका कहना है कि अगर यह हादसा एक सबक बन सके और भविष्य में किसी की जान बचा सके, तो शायद उस युवा इंजीनियर की मौत पूरी तरह व्यर्थ नहीं जाएगी।

कुल मिलाकर, सेक्टर-150 के हादसे ने ग्रेटर नोएडा की सड़क सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। एक इंजीनियर की मौत के बाद शुरू हुई यह रिफ्लेक्टिंग पट्टी और रोड मार्किंग की मुहिम यह सवाल छोड़ जाती है—क्या हमें हर सुधार के लिए पहले किसी की जान गंवानी होगी? अगर इस बार प्रशासन ने सच में सबक लिया और समय रहते सुधार किया, तो यह घटना एक दुखद त्रासदी के साथ-साथ बदलाव की शुरुआत भी बन सकती है।

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