UPI पर MDR लगाने की जरूरत नहीं, GTRI ने दी सलाह; रिपोर्ट में अमेरिका के दबाव का भी किया जिक्र

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नई दिल्ली। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाए जाने की संभावनाओं पर जारी बहस के बीच ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने सरकार को सलाह दी है कि भारत को अपने डिजिटल भुगतान ढांचे में किसी भी तरह का बदलाव बाहरी दबाव में नहीं करना चाहिए। संस्था का कहना है कि UPI पर व्यापक स्तर पर MDR लागू करने की आवश्यकता नहीं है और भारत को अपने डिजिटल भुगतान मॉडल, प्रतिस्पर्धा तथा नीति-निर्माण की स्वतंत्रता को प्राथमिकता देनी चाहिए।

GTRI की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब संसद ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 में संशोधन से जुड़ा विधेयक पारित किया है। इस संशोधन के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार मिलेगा कि वह अधिसूचना के माध्यम से तय कर सके कि किन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर शुल्क लगाया जा सकता है। हालांकि, विधेयक स्वयं UPI पर MDR लागू नहीं करता, बल्कि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर सरकार को निर्णय लेने का अधिकार देता है।

GTRI ने अमेरिका का जिक्र क्यों किया?

GTRI ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हाल के वर्षों में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने अपनी 2026 National Trade Estimate Report में भारत के UPI और RuPay जैसे घरेलू डिजिटल भुगतान ढांचे पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में इन्हें विदेशी कंपनियों के लिए चुनौती और व्यापारिक चिंता के रूप में उल्लेख किया गया था। GTRI का मानना है कि भारत को ऐसी टिप्पणियों के दबाव में अपनी सफल डिजिटल भुगतान नीति में बदलाव नहीं करना चाहिए।

संस्था के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, भारत ने बेहद कम समय में दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान नेटवर्क विकसित किया है। उनका कहना है कि UPI की सफलता का सबसे बड़ा कारण शून्य MDR (Zero MDR) नीति रही है, जिसने छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी कारोबारियों और आम उपभोक्ताओं को बिना अतिरिक्त शुल्क के डिजिटल भुगतान अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। यदि व्यापक स्तर पर MDR लागू किया जाता है, तो इसका असर छोटे व्यापारियों और डिजिटल भुगतान के प्रसार पर पड़ सकता है।

क्या UPI को फंडिंग की जरूरत है?

GTRI ने यह भी स्वीकार किया कि UPI जैसे विशाल डिजिटल भुगतान नेटवर्क के संचालन और विस्तार के लिए स्थायी वित्तीय मॉडल की आवश्यकता है। लेकिन संस्था का कहना है कि इसका समाधान हर व्यापारी पर MDR लगाना नहीं है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सरकार बजटीय सहायता, लक्षित प्रोत्साहन, बड़े कारोबारी लेनदेन पर सीमित शुल्क, अन्य वित्तीय सेवाओं से क्रॉस-सब्सिडी या केवल बड़े कारोबारियों पर सीमित शुल्क जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती है।

भारत का डिजिटल भुगतान मॉडल बना मिसाल

रिपोर्ट में कहा गया है कि UPI ने भारत में डिजिटल भुगतान की तस्वीर बदल दी है। आज छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों तक करोड़ों लोग UPI का उपयोग कर रहे हैं। इससे नकद लेनदेन पर निर्भरता कम हुई है, वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिला है और डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई गति मिली है। GTRI का मानना है कि इस मॉडल की सफलता को देखते हुए किसी भी नीति परिवर्तन से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों का गंभीरता से आकलन किया जाना चाहिए।

सरकार के पास रहेगा अंतिम फैसला

हालांकि संसद से पारित संशोधन के बाद सरकार के पास भविष्य में कुछ इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर शुल्क लागू करने का अधिकार होगा, लेकिन फिलहाल UPI पर MDR लागू करने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में ऐसा कोई निर्णय लिया जाता है, तो उसका उद्देश्य डिजिटल भुगतान व्यवस्था की वित्तीय स्थिरता और उपयोगकर्ताओं के हितों के बीच संतुलन बनाना होगा। वहीं GTRI ने जोर देकर कहा है कि भारत को अपने डिजिटल भुगतान तंत्र से जुड़े फैसले घरेलू जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लेने चाहिए, न कि बाहरी व्यापारिक दबावों के आधार पर।

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