20 साल पुराने थर्मस से कैसे बन गया जानलेवा ज़हर? डॉक्टर ने समझाया पूरा मामला

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पैसे बचाने की आदत अक्सर अच्छी मानी जाती है, लेकिन जब यह आदत सेहत के लिए खतरा बन जाए, तो नतीजे बेहद गंभीर हो सकते हैं। हाल ही में सामने आया एक चौंकाने वाला मामला यह दिखाता है कि रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाली साधारण सी चीज़ भी जानलेवा साबित हो सकती है। एक व्यक्ति की मौत का कारण बना उसका 20 साल पुराना थर्मस, जिसमें वह लंबे समय से गर्म कॉफी पी रहा था। डॉक्टरों ने जांच के बाद जो वजह बताई, उसने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

यह घटना ताइवान की बताई जा रही है, जहां एक मध्यम उम्र के व्यक्ति की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। शुरुआत में उसे लगातार थकान, पेट दर्द और कमजोरी महसूस हो रही थी। धीरे-धीरे उसकी हालत इतनी खराब हो गई कि उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। तमाम जांचों के बाद डॉक्टर इस नतीजे पर पहुंचे कि उसके शरीर में सीसे (लेड) की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी थी, जिसे मेडिकल भाषा में लेड पॉइजनिंग कहा जाता है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि व्यक्ति न तो किसी फैक्ट्री में काम करता था और न ही किसी जहरीले वातावरण में रहता था। ऐसे में सवाल उठा कि आखिर उसके शरीर में लेड पहुंचा कैसे? जब डॉक्टरों ने उसकी दिनचर्या और आदतों के बारे में विस्तार से पूछताछ की, तब असली वजह सामने आई। वह व्यक्ति पिछले करीब 20 सालों से एक ही थर्मस का इस्तेमाल कर रहा था और रोज उसमें गर्म कॉफी या चाय भरकर पीता था।

डॉक्टरों के मुताबिक, पुराने थर्मस की अंदरूनी परत समय के साथ खराब हो जाती है। खासकर जब उसमें रोज़ाना गर्म और अम्लीय (एसिडिक) पेय पदार्थ—जैसे कॉफी या नींबू वाला पानी—डाला जाता है, तो अंदर की धातु धीरे-धीरे घिसने लगती है। कई पुराने थर्मस में सीसा या अन्य भारी धातुओं का इस्तेमाल किया गया होता था, जो समय के साथ पेय पदार्थ में घुल सकते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि लेड पॉइजनिंग धीरे-धीरे असर करती है। इसके लक्षण तुरंत सामने नहीं आते, बल्कि महीनों या सालों में शरीर को नुकसान पहुंचता है। लगातार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेड शरीर में जाने से यह हड्डियों, किडनी, लिवर और दिमाग को प्रभावित करता है। यही वजह है कि कई बार मरीज और डॉक्टर दोनों ही शुरुआत में असली कारण समझ नहीं पाते।

इस मामले में भी यही हुआ। व्यक्ति को लंबे समय तक यह एहसास ही नहीं हुआ कि उसकी रोज़मर्रा की आदत—पुराने थर्मस में कॉफी पीना—उसके लिए जानलेवा बन रही है। डॉक्टरों ने बताया कि जब तक बीमारी का सही कारण समझ में आया, तब तक शरीर को बहुत ज्यादा नुकसान हो चुका था।

डॉक्टरों के अनुसार, थर्मस जैसे बर्तनों की भी एक “लाइफ” होती है। समय के साथ उनकी अंदरूनी कोटिंग खराब हो जाती है, खासकर अगर उनमें खरोंच, जंग या बदबू आने लगे। ऐसे संकेत यह बताते हैं कि अब उस बर्तन का इस्तेमाल सुरक्षित नहीं रहा। लेकिन कई लोग यह सोचकर इन्हें बदलते नहीं हैं कि “अभी तो ठीक दिख रहा है” या “इतने सालों से चल रहा है, कुछ नहीं होगा।”

इस घटना ने यह भी उजागर किया कि सेहत के मामले में जागरूकता कितनी जरूरी है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक बिना स्पष्ट वजह के पेट दर्द, कमजोरी, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन या वजन घटने जैसी समस्याएं हों, तो रोज़मर्रा की आदतों और इस्तेमाल की चीज़ों की भी जांच करनी चाहिए।

आजकल बाजार में मिलने वाले नए थर्मस और बोतलें आमतौर पर फूड-ग्रेड स्टील या सुरक्षित सामग्री से बनी होती हैं। लेकिन पुराने समय में बने कई बर्तनों में ऐसी तकनीक और सख्त मानक नहीं थे। यही वजह है कि दशकों पुराने बर्तनों का इस्तेमाल जोखिम भरा हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि थर्मस, पानी की बोतल, कुकर या किसी भी ऐसे बर्तन को समय-समय पर बदलते रहना चाहिए, जो सीधे खाने-पीने के संपर्क में आता है। अगर किसी थर्मस के अंदर जंग, परत उखड़ना, रंग बदलना या अजीब स्वाद महसूस हो, तो उसे तुरंत इस्तेमाल से बाहर कर देना चाहिए।

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की मौत की कहानी नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी है। हम अक्सर बड़ी बीमारियों से तो डरते हैं, लेकिन छोटी-छोटी आदतों और रोज़मर्रा की चीज़ों से होने वाले खतरों को नजरअंदाज कर देते हैं। पैसे बचाने की सोच सही है, लेकिन सेहत की कीमत पर नहीं।

इस घटना के बाद कई डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि वे अपने किचन और रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों की जांच करें। खासकर बहुत पुराने बर्तनों को लेकर सतर्क रहें। यह समझना जरूरी है कि कोई चीज़ अगर बाहर से ठीक दिख रही है, तो जरूरी नहीं कि वह अंदर से भी सुरक्षित हो।

अंत में, 20 साल पुराने थर्मस से हुई यह मौत यह सिखाती है कि सेहत से जुड़ी लापरवाही धीरे-धीरे बड़ा खतरा बन सकती है। समय पर जागरूकता, सही जानकारी और थोड़ी सी सावधानी न सिर्फ बीमारियों से बचा सकती है, बल्कि जान भी बचा सकती है। रोज़मर्रा की आदतों पर ध्यान देना और जरूरत पड़ने पर बदलाव करना ही असली समझदारी है।

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