
दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां पुराने वर्चस्व को नई साझेदारियां खुली चुनौती दे रही हैं। इसी संदर्भ में भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को सिर्फ एक आर्थिक करार नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलने वाला कदम माना जा रहा है। 27 देशों के यूरोपीय ब्लॉक और भारत की यह साझेदारी दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत जीडीपी और करीब दो अरब आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। यही वजह है कि इसे यूं ही नहीं, बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है।
यह समझौता ऐसे समय में आकार ले रहा है, जब अमेरिका की अगुवाई में चल रही वैश्विक व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के दौर से चली आ रही “अमेरिका फर्स्ट” नीति, टैरिफ वॉर और दबाव की कूटनीति ने कई देशों को वैकल्पिक रास्ते तलाशने पर मजबूर किया है। भारत-EU डील को इसी अमेरिकी दादागीरी के खिलाफ एक सामूहिक और सुनियोजित चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
भारत और यूरोपीय संघ की बातचीत कोई नई नहीं है। पिछले कई वर्षों से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही थी, लेकिन कभी कृषि, कभी बौद्धिक संपदा अधिकार और कभी डेटा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बात अटक जाती थी। अब पहली बार संकेत मिल रहे हैं कि दोनों पक्ष रणनीतिक स्तर पर इस डील को अंतिम रूप देने के लिए पूरी तरह गंभीर हो चुके हैं।
इस समझौते का सबसे बड़ा महत्व इसके आर्थिक आकार में छिपा है। यूरोपीय संघ दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक ब्लॉक है और भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। जब ये दोनों एक साथ आते हैं, तो यह साझेदारी दुनिया की चौथाई अर्थव्यवस्था को एक मंच पर ला देती है। यही आंकड़ा इस डील को साधारण समझौते से कहीं ऊपर ले जाता है।
वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि यह डील सीधे तौर पर अमेरिकी आर्थिक वर्चस्व को चुनौती देती है। अब तक अमेरिका अपने बाजार, डॉलर और तकनीकी ताकत के जरिए वैश्विक नियम तय करता रहा है। लेकिन अगर भारत और यूरोप मिलकर अपने व्यापारिक मानक, टैरिफ ढांचे और सप्लाई चेन तय करते हैं, तो अमेरिका की एकतरफा दबाव की नीति कमजोर पड़ सकती है।
इस समझौते का असर चीन पर भी उतना ही गहरा पड़ने वाला है। चीन लंबे समय से यूरोप का बड़ा सप्लायर रहा है। अगर भारत को यूरोपीय बाजार में आसान पहुंच मिलती है, तो चीनी निर्यात को सीधी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। यही वजह है कि यह डील सिर्फ अमेरिका को नहीं, बल्कि चीन को भी रणनीतिक रूप से झटका दे सकती है।
भारत के लिए यह समझौता कई स्तरों पर गेम चेंजर माना जा रहा है। सबसे पहले, भारतीय निर्यातकों को एक विशाल और समृद्ध बाजार तक सीधी पहुंच मिलेगी। टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स, फार्मा, आईटी सेवाएं और केमिकल सेक्टर में भारत को बड़ा फायदा हो सकता है। टैरिफ कम होने से भारतीय उत्पाद यूरोप में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे।
दूसरी तरफ, यूरोप के लिए भारत एक उभरता हुआ मैन्युफैक्चरिंग हब है। चीन पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रही यूरोपीय कंपनियों के लिए भारत एक भरोसेमंद विकल्प बन सकता है। “चीन प्लस वन” रणनीति के तहत कई कंपनियां पहले ही भारत की ओर देख रही हैं, और यह डील उस रुझान को मजबूत कर देगी।
इस समझौते का एक बड़ा रणनीतिक पहलू सप्लाई चेन सुरक्षा है। कोविड के बाद दुनिया ने समझ लिया कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है। भारत और यूरोप मिलकर ऐसी सप्लाई चेन तैयार करना चाहते हैं, जो चीन या किसी एक ताकत के दबाव से मुक्त हो।
ग्रीन एनर्जी और जलवायु परिवर्तन इस डील का एक और महत्वपूर्ण स्तंभ है। यूरोप ग्रीन ट्रांजिशन में भारी निवेश कर रहा है, जबकि भारत सोलर, विंड और ग्रीन हाइड्रोजन में बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। यह साझेदारी भारत को ग्रीन टेक्नोलॉजी में वैश्विक खिलाड़ी बनाने में मदद कर सकती है।
राजनीतिक दृष्टि से यह समझौता बहुध्रुवीय दुनिया की ओर एक मजबूत कदम माना जा रहा है। लंबे समय तक दुनिया अमेरिकी नेतृत्व वाले एकध्रुवीय ढांचे में रही। अब भारत-EU जैसी साझेदारियां संकेत दे रही हैं कि भविष्य बहुध्रुवीय होगा, जहां कई ताकतें मिलकर नियम तय करेंगी।
हालांकि, इस डील के रास्ते में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कृषि और डेयरी क्षेत्र भारत के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दे हैं। भारतीय किसानों को डर है कि यूरोपीय सस्ते कृषि उत्पाद बाजार में आ गए, तो घरेलू किसानों पर दबाव बढ़ेगा। सरकार को इन क्षेत्रों में विशेष सुरक्षा प्रावधान करने होंगे।
बौद्धिक संपदा अधिकार भी एक बड़ा विवादित मुद्दा है। यूरोप चाहता है कि भारत पेटेंट और डेटा सुरक्षा के नियम और सख्त करे, जबकि भारत अपनी दवा उद्योग और जेनेरिक मेडिसिन की क्षमता को कमजोर नहीं करना चाहता। इन संतुलनों को साधना इस डील की सबसे कठिन परीक्षा होगी।
इसके बावजूद, राजनीतिक इच्छाशक्ति इस बार पहले से कहीं ज्यादा मजबूत दिख रही है। भारत की “आत्मनिर्भर भारत” नीति और यूरोप की “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” की सोच, दोनों इस डील में एक साझा आधार बना रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि नए वैश्विक नियमों की नींव रख सकता है। डिजिटल टैक्सेशन, डेटा फ्लो, ग्रीन स्टैंडर्ड और लेबर नॉर्म्स—इन सभी क्षेत्रों में भारत और यूरोप मिलकर नए मानक तय कर सकते हैं, जो आगे चलकर दुनिया के लिए मिसाल बनेंगे।
ट्रंप की दादागीरी को चुनौती देने का असली मतलब यही है—कि अब दुनिया एकतरफा दबाव को स्वीकार करने के बजाय साझेदारी और संतुलन का रास्ता चुन रही है। भारत-EU डील इसी बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक बन सकती है।
अगर यह समझौता अपने पूरे स्वरूप में लागू होता है, तो इसका असर सिर्फ व्यापार आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। यह भारत की वैश्विक हैसियत, यूरोप की रणनीतिक स्वतंत्रता और अमेरिका-चीन की राजनीति—तीनों को नए सिरे से परिभाषित करेगा।
कुल मिलाकर, “मदर ऑफ ऑल डील्स” सिर्फ एक आकर्षक नाम नहीं है। यह उस समझौते का प्रतीक है, जो दुनिया की चौथाई अर्थव्यवस्था को एक मंच पर लाकर पुराने वर्चस्व को सीधी चुनौती देने जा रहा है। आने वाले वर्षों में इतिहास शायद इसी पल को उस मोड़ के रूप में याद करे, जब वैश्विक शक्ति संतुलन की दिशा सचमुच बदलनी शुरू हुई।