‘धर्म हमारे DNA में है’, मोहन भागवत ने बताया धर्म और रिलीजन में अंतर, युवाओं से कही ये बात

3

मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित तीन दिवसीय ‘युवा धर्म संसद-2026’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं से धर्म, जीवन मूल्यों और भारतीय परंपरा को लेकर संवाद किया। शुक्रवार को कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि आज की युवा पीढ़ी धर्म जैसे विषयों पर चर्चा कर रही है। उन्होंने कहा कि आम तौर पर धर्म को बुजुर्गों से जुड़ा विषय समझ लिया जाता है, जबकि उनके अनुसार धर्म का संबंध जीवन के हर चरण से है।

उज्जैन में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 1,600 से 1,700 युवा प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया। तीन दिवसीय आयोजन में धर्म और भारतीय संस्कृति के अलावा शिक्षा, तकनीक, पर्यावरण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक जिम्मेदारी और युवाओं की भूमिका जैसे विषयों पर भी चर्चा रखी गई थी।

‘धर्म हमारे DNA में है’

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि जीवन में परिस्थितियां लगातार बदलती रहती हैं। सुख और दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन उनके अनुसार मनुष्य और उसके धर्म का संबंध स्थायी है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि धर्म हमारे DNA और आचरण में है तथा यह व्यक्ति के व्यवहार और कार्यों को दिशा देता है।

उन्होंने धर्म को केवल किसी विशेष पूजा-पद्धति या धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं बताया। उनके अनुसार धर्म का संबंध जीवन को संचालित करने वाले नियमों, अनुशासन और आचरण से है। उन्होंने कहा कि धर्म को समझने की प्रक्रिया इतनी व्यापक है कि व्यक्ति इसके बारे में लगातार अध्ययन और चिंतन करता रहे, फिर भी इसकी पूरी व्याख्या कर पाना आसान नहीं है।

भागवत ने यह भी कहा कि धर्म के कुछ कर्मकांड और अनुशासन होते हैं, लेकिन इसे केवल कर्मकांड तक सीमित करके देखना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार धर्म व्यक्ति के आचरण में दिखाई देता है और जीवन के भौतिक तथा आध्यात्मिक पक्षों से जुड़ा हुआ है।

धर्म और रिलीजन को एक जैसा नहीं मानते भागवत

अपने भाषण का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने ‘धर्म’ और अंग्रेजी शब्द ‘रिलीजन’ के अंतर को समझाने में लगाया। भागवत ने कहा कि दोनों शब्दों को एक-दूसरे का सटीक पर्याय मानना सही नहीं है।

उनके अनुसार अंग्रेजी में ‘धर्म’ के लिए ऐसा कोई एक शब्द नहीं है, जो इसकी पूरी अवधारणा को व्यक्त कर सके। उन्होंने कहा कि भारतीय संदर्भ में धर्म का अर्थ केवल किसी विशेष पंथ, मत या पूजा पद्धति से नहीं है।

उन्होंने ‘रिलीजन’ शब्द की व्युत्पत्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि यह ‘रिलिजियो’ से जुड़ा है, जिसका अर्थ बांधने या अनुशासन में रखने से जोड़ा जाता है। इसके विपरीत, भागवत के अनुसार धर्म व्यक्ति को मुक्ति की दिशा में ले जाता है।

उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि जब रिलीजन धर्म के सिद्धांतों के अनुरूप चलता है, तो वह व्यक्ति को मुक्ति की ओर ले जा सकता है, लेकिन जब धर्म से उसका संबंध टूट जाता है तो धार्मिक आधार पर विवाद और संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है।

‘धर्म’ शब्द का अर्थ भी समझाया

भागवत ने धर्म की व्याख्या करते हुए इसे संस्कृत के ‘धृ’ शब्द से जोड़ा। उन्होंने कहा कि इसका अर्थ धारण करना या संभालकर रखना है। उनके अनुसार जो व्यक्ति या समाज को जोड़ता है, उसे बिखरने और टूटने से रोकता है तथा उसे आगे बढ़ने की दिशा देता है, वह धर्म की व्यापक अवधारणा से जुड़ा है।

उन्होंने कहा कि धर्म किसी व्यक्ति को बांधने के बजाय उसे मुक्त करने की दिशा में काम करता है। उनके संबोधन में धर्म को मोक्ष और आत्मिक उन्नति से भी जोड़ा गया।

यह व्याख्या उनके भारतीय दार्शनिक दृष्टिकोण पर आधारित थी। उन्होंने युवाओं के सामने धर्म को केवल धार्मिक पहचान के बजाय जीवन के व्यापक अनुशासन और आचरण से जोड़कर समझाने की कोशिश की।

युवाओं को धर्म पर चर्चा करते देखकर जताई खुशी

भागवत ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी धर्म जैसे विषयों पर बात कर रही है, यह उनके लिए खुशी की बात है। उन्होंने कहा कि समाज में कई बार धर्म को जीवन के अंतिम चरण या बुजुर्गों से जोड़कर देखा जाता है।

इस सोच का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गीता और रामायण जैसी पुस्तकों को भी कई बार लोग ऐसी किताबों के रूप में देखते हैं जिन्हें जीवन के बाद के दौर में पढ़ा जाना चाहिए। भागवत के अनुसार धर्म को इस तरह किसी उम्र विशेष तक सीमित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने धर्म को जीवन के आरंभ से अंत तक मौजूद रहने वाली अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया। उनके मुताबिक व्यक्ति किसी व्यवस्था या नियम को माने या न माने, प्रकृति की अपनी व्यवस्था होती है और वह अपने नियमों के अनुसार चलती है। उन्होंने सूर्य के उदय और अस्त होने का उदाहरण देते हुए अपनी बात समझाई।

भारत की धार्मिक अवधारणा पर भी बोले

भागवत ने भारत और पश्चिमी समाज में धर्म की अवधारणा को लेकर अंतर की बात भी कही। उन्होंने कहा कि भारत में अलग-अलग आस्थाओं और विश्वासों को साथ लेकर चलने की परंपरा रही है। उन्होंने इसे भारतीय धर्मनिरपेक्षता की अपनी समझ से जोड़ा।

उनके अनुसार भारत में अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के बीच भेदभाव न करने की भावना महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने युवाओं से अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक जड़ों को समझने की अपील की, साथ ही दूसरी मान्यताओं के प्रति सम्मान बनाए रखने की बात कही।

यह बात ऐसे समय में कही गई जब युवा धर्म संसद में धर्म और संस्कृति के साथ-साथ आधुनिक विषयों पर भी चर्चा हो रही थी। कार्यक्रम में तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों को भी शामिल किया गया था।

‘धर्म’ को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न रखने की बात

भागवत के संबोधन में धर्म का एक महत्वपूर्ण पहलू आचरण रहा। उन्होंने कहा कि धर्म व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई देता है। यानी धर्म का संबंध केवल किसी धार्मिक अनुष्ठान या पूजा से नहीं बल्कि व्यक्ति के जीवन में उसके निर्णयों और कार्यों से भी है।

उन्होंने धर्म को अनुशासन से भी जोड़ा। उनके अनुसार किसी व्यवस्था के नियमों का पालन करना और अपने आचरण को नियंत्रित रखना धर्म की अवधारणा से संबंधित है।

उनकी इस व्याख्या में व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ समाज और व्यापक मानवीय व्यवस्था का संदर्भ भी शामिल था। उन्होंने धर्म को ऐसी व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया जो व्यक्ति को अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को समझने की दिशा देती है।

युवाओं को सिर्फ सफल नहीं, सार्थक बनने का संदेश

मोहन भागवत ने युवाओं से कहा कि उनका लक्ष्य केवल सफलता हासिल करना नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत के युवा पूरी दुनिया में सिर्फ यशस्वी ही नहीं, बल्कि सार्थक भी बनें।

उन्होंने युवाओं के लिए शक्ति, वैभव, धन और बुद्धि जैसे पहलुओं का उल्लेख किया और इन्हें जीवन की जिम्मेदारियों से जोड़ने की बात कही। उनके अनुसार व्यक्तिगत उपलब्धियों के साथ समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है।

युवा धर्म संसद का उद्देश्य भी युवाओं को भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़े विषयों पर चर्चा के लिए एक मंच देना बताया गया है। इस आयोजन में अलग-अलग क्षेत्रों के विद्वान, शिक्षक, धार्मिक नेता और अन्य विशेषज्ञ भी शामिल हुए।

तीन दिन तक चला युवा धर्म संसद का आयोजन

उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद का यह छठा संस्करण है। आयोजकों के अनुसार इसकी शुरुआत 2018-19 के दौरान हुई थी। इससे पहले काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और कांचीपुरम में इसके आयोजन हो चुके हैं। उज्जैन इस श्रृंखला का छठा पड़ाव है।

इस बार कार्यक्रम में 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से युवा प्रतिभागियों के पहुंचने की जानकारी सामने आई। आयोजन 17 से 19 सितंबर तक रखा गया है। 18 सितंबर को मोहन भागवत ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जबकि 19 सितंबर को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के समापन सत्र में शामिल होने की जानकारी आयोजकों की ओर से दी गई थी।

कार्यक्रम में युवाओं ने अलग-अलग विषयों पर अपने विचार भी रखे। इनमें जीवन प्रबंधन, उद्यमिता, राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका, पर्यावरण का भारतीय दृष्टिकोण और नागरिक कर्तव्य जैसे विषय शामिल रहे। साथ ही युवाओं को सवाल पूछने और संवाद में हिस्सा लेने का अवसर भी दिया गया।

धर्म, आधुनिकता और युवाओं के बीच संवाद

युवा धर्म संसद में धर्म और परंपरा के साथ आधुनिक समय की चुनौतियों पर भी चर्चा की जा रही है। कार्यक्रम के निर्धारित विषयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीक, शिक्षा और रोजगार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पर्यावरण तथा सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मुद्दे शामिल हैं।

इस लिहाज से मोहन भागवत का संबोधन केवल धर्म की परिभाषा तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने युवाओं के सामने धर्म को जीवन, आचरण और जिम्मेदारी से जोड़कर रखने की कोशिश की। उन्होंने अपनी परंपराओं को समझने के साथ-साथ दूसरों की मान्यताओं के सम्मान की बात भी कही।

भागवत की ओर से धर्म और रिलीजन के बीच किया गया अंतर उनकी वैचारिक व्याख्या है। अलग-अलग धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में ‘धर्म’ शब्द की व्याख्या अलग संदर्भों में की जाती है। इसलिए उनके वक्तव्य को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिसमें उन्होंने उज्जैन के युवा धर्म संसद में इसे युवाओं के सामने रखा।

उज्जैन के इस आयोजन में धर्म, संस्कृति और आधुनिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर हो रही चर्चा का केंद्र युवा पीढ़ी है। भागवत ने अपने संबोधन में इसी युवा वर्ग को भारतीय परंपरा को समझने, अपने आचरण में मूल्यों को उतारने और व्यक्तिगत सफलता के साथ सामाजिक सार्थकता पर भी ध्यान देने का संदेश दिया।

Share it :

End