राहुल गांधी की SIR याचिका में 14 आपत्तियां, कोर्ट फीस में ₹220 की कमी, सुनवाई पर भी अटका मामला

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राहुल गांधी की SIR याचिका में 14 खामियां, ₹220 की कोर्ट फीस कम, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए नहीं हुई लिस्टिंग

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्षी दलों के INDIA गठबंधन के नेताओं की ओर से चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। हालांकि, याचिका दाखिल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने इसमें 14 खामियां या आपत्तियां दर्ज की हैं। इन आपत्तियों में कोर्ट फीस की निर्धारित राशि से 220 रुपये कम जमा होना, नौ याचिकाकर्ताओं के वकालतनामे नहीं मिलना और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र की अस्पष्ट प्रति शामिल हैं।

इन कमियों के कारण याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया जा सका। रजिस्ट्री ने याचिकाकर्ताओं की कानूनी टीम से दस्तावेजों और दाखिल करने की प्रक्रिया से जुड़ी आपत्तियों को दूर करने को कहा है। हालांकि, यह स्पष्ट रहना चाहिए कि रजिस्ट्री की आपत्तियां याचिका की दाखिल प्रक्रिया से संबंधित हैं। इन्हें सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला या याचिका में लगाए गए आरोपों पर अदालत की टिप्पणी नहीं माना जा सकता।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब राहुल गांधी और विपक्षी दलों के नेताओं ने मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि SIR प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम हटने, चुनाव आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया और डिजिटल मतदाता रिकॉर्ड की पारदर्शिता से जुड़े गंभीर सवाल हैं। दूसरी ओर, इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित रिकॉर्ड की जांच के बाद ही हो सकता है।

क्या है पूरा मामला?

12 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी के नेतृत्व में INDIA गठबंधन के नेताओं ने दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ विरोध मार्च निकाला। विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी उठाई।

मार्च के दौरान और उसके बाद विपक्षी दलों की कानूनी टीम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। इस याचिका में चुनाव आयोग के SIR संबंधी फैसलों की वैधता की जांच करने, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने तथा संबंधित दस्तावेज अदालत के सामने रखने की मांग की गई है।

याचिका में राहुल गांधी मुख्य याचिकाकर्ता हैं। उनके साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और विभिन्न विपक्षी दलों के अन्य नेता भी शामिल हैं। कुल 11 नेताओं की ओर से यह याचिका दायर की गई।

हालांकि, याचिका दाखिल करने और उसके सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने में अंतर होता है। किसी मामले को अदालत की रजिस्ट्री में जमा कर देने के बाद दस्तावेजों, फीस, हस्ताक्षरों और अन्य औपचारिकताओं की जांच की जाती है। यदि इसमें कमियां पाई जाती हैं, तो उन्हें दूर करने के लिए आपत्तियां दर्ज की जा सकती हैं। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने पर मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है।

राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की याचिका के मामले में भी रजिस्ट्री ने ऐसी ही आपत्तियां दर्ज की हैं। इसलिए फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि इन कमियों को कितनी जल्दी दूर किया जाता है और मामला सुनवाई के लिए कब सूचीबद्ध होता है।

याचिका में 14 खामियां क्या हैं?

सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने याचिका और उसके साथ लगाए गए दस्तावेजों की जांच के बाद कुल 14 आपत्तियां दर्ज की हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, इनमें वकालतनामे, पहचान पत्र, कोर्ट फीस, सहायक दस्तावेजों की स्पष्टता और कुछ संलग्न दस्तावेजों से जुड़ी कमियां शामिल हैं।

इनमें सबसे ज्यादा चर्चा कोर्ट फीस में 220 रुपये की कमी को लेकर हो रही है। इसके अलावा नौ याचिकाकर्ताओं के वकालतनामे नहीं होने और मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र की स्पष्ट प्रति मांगे जाने का मामला भी सामने आया है।

रजिस्ट्री की आपत्तियों में कुछ संलग्न दस्तावेजों की तारीख या केस नंबर से संबंधित विसंगतियां, दस्तावेजों की पठनीयता, कुछ पन्नों की रंगीन प्रतियां और एक दस्तावेज के लिए पेन ड्राइव जमा करने की जरूरत जैसी बातें भी बताई गई हैं। याचिका में चुनाव आयुक्तों को व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी बनाए जाने के औचित्य पर भी स्पष्टीकरण मांगा गया है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि 14 आपत्तियों की पूरी सूची और प्रत्येक आपत्ति का तकनीकी विवरण अलग-अलग रिपोर्टों में अलग स्तर की विस्तार से सामने आया है। इसलिए सभी कमियों को केवल फीस या हस्ताक्षर तक सीमित समझना सही नहीं होगा। ये दाखिल प्रक्रिया, दस्तावेजों और कानूनी औपचारिकताओं से जुड़े अलग-अलग मुद्दे हैं।

कोर्ट फीस में 220 रुपये कम कैसे पड़े?

इस मामले में एक प्रमुख आपत्ति निर्धारित कोर्ट फीस से जुड़ी है। रजिस्ट्री ने पाया कि याचिका दाखिल करते समय जमा की गई फीस में 220 रुपये की कमी है। ऐसे मामलों में अदालत की निर्धारित फीस और दाखिल किए गए भुगतान का सही होना आवश्यक होता है।

कोर्ट फीस की कमी अपने आप में याचिका में लगाए गए आरोपों को सही या गलत साबित नहीं करती। यह दाखिल प्रक्रिया से संबंधित एक औपचारिक कमी है, जिसे नियमों के अनुसार दूर किया जाना होता है।

इसलिए 220 रुपये की कमी को याचिका के मूल विषय से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। मामला मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की प्रक्रिया से संबंधित है, जबकि फीस का सवाल यह सुनिश्चित करने से जुड़ा है कि अदालत में दस्तावेज दाखिल करते समय लागू औपचारिकताओं का पालन हुआ है या नहीं।

याचिका की सुनवाई के लिए आगे बढ़ने से पहले ऐसी आपत्तियों का समाधान करना जरूरी हो सकता है। इसके बाद रजिस्ट्री आगे की प्रक्रिया के लिए मामले को तैयार कर सकती है।

नौ विपक्षी नेताओं के वकालतनामे पर आपत्ति

रजिस्ट्री की ओर से दर्ज की गई प्रमुख आपत्तियों में नौ याचिकाकर्ताओं के वकालतनामे का नहीं होना भी शामिल है। रिपोर्टों के मुताबिक, याचिकाकर्ता संख्या 3 से 11 तक के वकालतनामे उपलब्ध नहीं थे या आवश्यक हस्ताक्षरों से संबंधित कमियां थीं।

इन नेताओं में सौगत रॉय, अखिलेश यादव, तेजस्वी प्रसाद यादव, संजय राउत, एम. ए. बेबी, डी. राजा, महुआ माझी, सुप्रिया सुले और ई. टी. मोहम्मद बशीर के नाम शामिल हैं।

वकालतनामा एक कानूनी दस्तावेज होता है, जिसके जरिए कोई पक्षकार अपने वकील को अदालत में अपनी ओर से पेश होने और मामले की पैरवी करने का अधिकार देता है। अदालत में किसी व्यक्ति या पक्ष की ओर से मुकदमा दायर करने और पैरवी करने की प्रक्रिया में यह दस्तावेज महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यदि किसी याचिकाकर्ता का वकालतनामा उपलब्ध नहीं है या उसमें जरूरी हस्ताक्षर नहीं हैं, तो रजिस्ट्री उस कमी को दूर करने के लिए कह सकती है। इस मामले में भी संबंधित दस्तावेजों को पूरा करने की जरूरत बताई गई है।

इस आपत्ति का मतलब यह नहीं है कि इन नेताओं ने याचिका के मुद्दों पर अपना समर्थन वापस ले लिया है। यह दस्तावेजी औपचारिकता से जुड़ा विषय है। आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि आवश्यक वकालतनामे जमा किए जाते हैं या नहीं और रजिस्ट्री की आपत्तियां किस तरह दूर की जाती हैं।

मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र की स्पष्ट प्रति मांगी

रजिस्ट्री ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र की स्पष्ट और पढ़ने योग्य प्रति भी दाखिल करने को कहा है। किसी कानूनी याचिका में पक्षकारों की पहचान और उनके दस्तावेजों की स्पष्टता महत्वपूर्ण होती है।

यदि किसी पहचान पत्र की फोटोकॉपी अस्पष्ट है या उसमें मौजूद जानकारी ठीक से पढ़ी नहीं जा सकती, तो रजिस्ट्री बेहतर प्रति जमा करने के लिए कह सकती है। इसका उद्देश्य दस्तावेजों को स्पष्ट और रिकॉर्ड के लिए उपयुक्त बनाना होता है।

इस मामले में खड़गे की पहचान पत्र संबंधी आपत्ति भी अन्य दस्तावेजी कमियों की तरह दाखिल प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे याचिका में उठाए गए राजनीतिक या संवैधानिक सवालों पर अदालत की टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

दस्तावेजों की स्पष्टता और संलग्न रिकॉर्ड पर भी सवाल

रजिस्ट्री की आपत्तियां केवल वकालतनामे, पहचान पत्र और कोर्ट फीस तक सीमित नहीं बताई गई हैं। याचिका के साथ लगाए गए कुछ दस्तावेजों की पठनीयता और संलग्न रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

कानूनी याचिका में जिन आदेशों, फैसलों या अन्य दस्तावेजों का हवाला दिया जाता है, उनकी प्रतियां स्पष्ट और सही होना जरूरी होता है। यदि किसी दस्तावेज की तारीख, केस नंबर या अन्य विवरण में अंतर मिलता है, तो उसे स्पष्ट करने या सही प्रति जमा करने के लिए कहा जा सकता है।

रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में कुछ संलग्नकों की तारीख और केस नंबर से जुड़ी विसंगतियों पर भी आपत्ति दर्ज की गई है। कुछ पन्नों के लिए रंगीन प्रतियां देने और एक संबंधित दस्तावेज की डिजिटल कॉपी पेन ड्राइव में उपलब्ध कराने की जरूरत भी बताई गई है।

इन आपत्तियों का समाधान होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि दाखिल प्रक्रिया की सभी आवश्यकताएं पूरी हुई हैं या नहीं।

चुनाव आयुक्तों को व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी बनाने पर सवाल

याचिका में चुनाव आयोग के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों को भी प्रतिवादी बनाया गया है। रजिस्ट्री ने इस बात पर स्पष्टीकरण मांगा है कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस रिट याचिका में व्यक्तिगत चुनाव आयुक्तों को प्रतिवादी बनाने का आधार क्या है।

अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का अधिकार देता है। विपक्षी नेताओं की याचिका में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के पुनरीक्षण से संबंधित निर्णयों की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।

रजिस्ट्री की आपत्ति इस बात से जुड़ी है कि याचिका में प्रतिवादियों को शामिल करने का कानूनी आधार स्पष्ट किया जाए। यह एक प्रक्रियात्मक सवाल है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अदालत ने याचिका के मूल आरोपों को स्वीकार या खारिज कर दिया है।

SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्ष की मुख्य आपत्तियां क्या हैं?

विपक्षी नेताओं की याचिका का मुख्य विषय मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की जांच और संशोधन किया जाता है। इसका उद्देश्य मतदाता रिकॉर्ड को अपडेट करना होता है, लेकिन विपक्ष ने आरोप लगाया है कि मौजूदा प्रक्रिया में कुछ ऐसे सवाल हैं जिनकी स्वतंत्र जांच जरूरी है।

याचिका में चुनाव आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया, मतदाता सूची से नाम हटाने के नियम, नए मतदाताओं के पंजीकरण और डिजिटल डेटाबेस के संचालन से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं।

विपक्ष का कहना है कि पात्र मतदाताओं के नाम हटने की स्थिति में पर्याप्त सूचना, सुनवाई और नाम दोबारा जुड़वाने की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या SIR से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय चुनाव आयोग के सभी सदस्यों की जानकारी और सहमति से लिए गए थे।

ये आरोप याचिकाकर्ताओं के दावे हैं। इनकी सत्यता पर अंतिम निष्कर्ष अदालत की जांच, संबंधित रिकॉर्ड और पक्षकारों के जवाब के बाद ही निकाला जा सकता है।

चुनाव आयोग के फैसलों और रिकॉर्ड की जांच की मांग

याचिका में चुनाव आयोग से SIR से जुड़े निर्णयों का पूरा रिकॉर्ड प्रस्तुत करने की मांग की गई है। इसमें संबंधित फाइलें, बैठकों के विवरण, कार्यवाही और निर्णयों से जुड़ी टिप्पणियां शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और SIR लागू करने के आधार को स्पष्ट रूप से समझने के लिए मूल दस्तावेजों की जांच जरूरी है। वे यह भी चाहते हैं कि अदालत यह देखे कि प्रक्रिया लागू करने में संबंधित कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों का पालन हुआ या नहीं।

याचिका में 24 जून 2025 को SIR शुरू करने से जुड़े फैसले और उससे संबंधित दस्तावेजों का उल्लेख किया गया है। विपक्ष ने यह सवाल भी उठाया है कि देशव्यापी स्तर पर प्रक्रिया लागू करने का निर्णय किस तरह लिया गया और क्या उससे संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध है।

इन मांगों पर अदालत का क्या रुख रहता है, यह याचिका के सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने और आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

ECINET और ERONET के स्वतंत्र ऑडिट की मांग

याचिका में चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINET और ERONET को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। ये सिस्टम चुनाव संबंधी कामकाज और मतदाता सूची के प्रबंधन से जुड़े हैं।

विपक्षी नेताओं ने इन प्रणालियों की तकनीकी संरचना, रिकॉर्ड में किए गए बदलावों और मतदाता सूची से संबंधित डेटा तक पहुंच की प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि रिकॉर्ड में बदलाव किस अधिकार के तहत किए जाते हैं और क्या इन बदलावों का पर्याप्त डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाता है।

याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हटा दिया जाए, तो उसे दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है। विपक्ष का तर्क है कि डिजिटल प्रणालियों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है।

हालांकि, इन तकनीकी आरोपों को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। संबंधित प्रणालियों की वास्तविक कार्यप्रणाली और उनमें किसी कमी का सवाल तकनीकी जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही तय किया जा सकता है।

मतदाता सूची से नाम हटाने और दोबारा जोड़ने का मुद्दा

SIR विवाद का एक अहम पहलू मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया है। विपक्षी याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि किसी पात्र नागरिक का नाम हटाने से पहले कानून के अनुसार आवश्यक प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि मतदाता सूची में नाम हटाने से प्रभावित लोगों को उचित सूचना और अपनी बात रखने का अवसर मिले। इसके साथ ही यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया हो, तो उसे दोबारा सूची में शामिल कराने का प्रभावी तरीका उपलब्ध होना चाहिए।

मतदाता सूची चुनावी प्रक्रिया का बुनियादी हिस्सा है, क्योंकि मतदान का अधिकार इस्तेमाल करने के लिए पात्र नागरिक का नाम संबंधित सूची में दर्ज होना आवश्यक होता है। इसी कारण सूची में संशोधन की प्रक्रिया में सटीकता, पारदर्शिता और समय पर सुधार महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

विपक्ष का कहना है कि इन पहलुओं की जांच की जानी चाहिए। दूसरी ओर, किसी विशेष मामले में नाम हटाना नियमों के अनुरूप था या नहीं, यह संबंधित तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर तय होगा।

रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति बनाने की मांग

याचिका में एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग भी की गई है। प्रस्ताव के अनुसार, समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करें और इसमें तकनीकी विशेषज्ञों तथा अन्य विशेषज्ञ व्यक्तियों को शामिल किया जाए।

विपक्ष चाहता है कि ऐसी समिति SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में हुए बदलावों और डिजिटल डेटाबेस की कार्यप्रणाली की जांच करे। याचिका में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से संबंधित तकनीकी और संचालन संबंधी प्रक्रियाओं की समीक्षा की मांग भी शामिल है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि स्वतंत्र जांच से चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और भरोसा मजबूत करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, समिति बनाने या किसी स्वतंत्र ऑडिट का आदेश देने का फैसला अदालत के अधिकार क्षेत्र और मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।

अभी यह मांग याचिका का हिस्सा है। इसे अदालत द्वारा स्वीकार की गई मांग या समिति गठित करने के आदेश के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल सबसे जरूरी कदम रजिस्ट्री की ओर से दर्ज आपत्तियों को दूर करना है। याचिकाकर्ताओं की कानूनी टीम को आवश्यक दस्तावेजों, वकालतनामों, पहचान पत्र की स्पष्ट प्रति, कोर्ट फीस और अन्य संलग्नकों से जुड़ी कमियों को ठीक करना होगा।

इसके बाद रजिस्ट्री यह जांच करेगी कि आपत्तियों का समाधान हुआ है या नहीं। प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने का रास्ता साफ हो सकता है। सुनवाई की तारीख और अदालत की ओर से आगे की कार्रवाई के बारे में कोई निष्कर्ष तभी निकाला जाना चाहिए जब इसकी आधिकारिक पुष्टि हो।

यह भी महत्वपूर्ण है कि दाखिल प्रक्रिया में खामियां और याचिका के मूल कानूनी सवाल दो अलग विषय हैं। रजिस्ट्री की आपत्तियां यह बताती हैं कि दस्तावेजों या औपचारिकताओं में सुधार की जरूरत है। वे अपने आप में यह तय नहीं करतीं कि SIR को लेकर विपक्ष के आरोप सही हैं या गलत।

अदालत में सुनवाई होने पर याचिकाकर्ताओं की मांगों, चुनाव आयोग के पक्ष और संबंधित कानूनों पर विचार किया जा सकता है। आगे की न्यायिक प्रक्रिया से ही स्पष्ट होगा कि अदालत किन मुद्दों पर सुनवाई करती है और क्या कोई अंतरिम या अंतिम निर्देश जारी किए जाते हैं।

राजनीतिक विवाद के बीच कानूनी प्रक्रिया पर नजर

राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं की याचिका ने मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया है। विपक्षी दल इस प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और पात्र मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े सवाल उठा रहे हैं।

वहीं, याचिका के दाखिल होते ही रजिस्ट्री की ओर से 14 आपत्तियां दर्ज होना मामले की प्रक्रियात्मक स्थिति को महत्वपूर्ण बनाता है। 220 रुपये की कोर्ट फीस की कमी, नौ नेताओं के वकालतनामे और मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र की स्पष्ट प्रति जैसी आपत्तियों को दूर करना आगे की प्रक्रिया के लिए जरूरी है।

अभी इस घटनाक्रम को याचिका की दाखिल प्रक्रिया से जुड़ी स्थिति के रूप में ही देखना चाहिए। SIR की वैधता, चुनाव आयोग के निर्णयों और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक जांच के बाद ही सामने आ सकता है।

इसलिए फिलहाल ध्यान इस बात पर रहेगा कि विपक्षी नेताओं की कानूनी टीम रजिस्ट्री की आपत्तियों को कब तक दूर करती है और याचिका सुनवाई के लिए कब सूचीबद्ध होती है। उसके बाद ही मामले के मूल मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की दिशा स्पष्ट हो सकेगी।

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