
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक संकट से गुजर रही है। कभी बंगाल की सबसे ताकतवर राजनीतिक ताकत मानी जाने वाली पार्टी अब अंदरूनी बगावत, नेतृत्व विवाद और टूट की स्थिति का सामना कर रही है। चुनावी हार के बाद शुरू हुई असंतुष्टि कुछ ही दिनों में खुले विद्रोह में बदल गई और अब हालात ऐसे हो गए हैं कि पार्टी के बड़े हिस्से ने नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
राजनीतिक घटनाक्रम की शुरुआत 4 मई को विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद हुई। चुनाव में TMC को बड़ा झटका लगा और पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। हार के बाद पार्टी के भीतर आत्ममंथन की उम्मीद थी, लेकिन इसके बजाय नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे। कई नेताओं और विधायकों को लगा कि पार्टी में फैसले लेने की प्रक्रिया सीमित लोगों तक सिमट गई है और संगठन धीरे-धीरे एक परिवार केंद्रित ढांचे में बदल रहा है।
स्थिति 6 मई को और गंभीर हो गई, जब नव-निर्वाचित विधायकों की बैठक आयोजित की गई। रिपोर्टों के अनुसार बैठक में ममता बनर्जी ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के चुनावी योगदान की सराहना करने के लिए विधायकों से तालियां बजाने को कहा। नेतृत्व की नजर में यह चुनाव अभियान में अभिषेक की भूमिका का सम्मान था, लेकिन पार्टी के एक वर्ग ने इसे उत्तराधिकार की राजनीति और बढ़ते पारिवारिक प्रभाव के संकेत के रूप में देखा। यही वह क्षण माना जा रहा है जिसने अंदर ही अंदर चल रहे असंतोष को और बढ़ा दिया।
इसके बाद पार्टी के भीतर विरोध के स्वर खुलकर सामने आने लगे। कुछ विधायकों ने संगठनात्मक फैसलों पर सवाल उठाए और कथित पक्षपात के आरोप लगाए। विशेष रूप से कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि नेतृत्व के करीबी लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही जबकि अन्य नेताओं पर सख्ती दिखाई जा रही है। इससे पार्टी के भीतर दो स्पष्ट धड़े बनते दिखाई देने लगे।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे प्रमुख चेहरा बनकर उभरे रितब्रत बनर्जी। कभी वामपंथी राजनीति से जुड़े रहे रितब्रत धीरे-धीरे असंतुष्ट विधायकों के केंद्र में आ गए। उन्होंने उन नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश की जो चुनावी हार और नेतृत्व शैली से नाराज थे। कुछ ही दिनों में यह असंतोष एक संगठित राजनीतिक चुनौती में बदल गया।
22 मई के बाद घटनाएं तेजी से बदलीं। विभिन्न बैठकों, राजनीतिक संपर्कों और रणनीतिक चर्चाओं के बाद असंतुष्ट विधायकों ने खुलकर नेतृत्व को चुनौती देना शुरू कर दिया। अगले लगभग दो सप्ताह के भीतर स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि बड़ी संख्या में विधायक बागी खेमे के साथ दिखाई देने लगे।
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब 58 से अधिक विधायकों ने रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व का समर्थन किया। इसके बाद उन्हें विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिलने का रास्ता भी साफ हो गया। इस कदम ने TMC के भीतर पहली बार इतने बड़े स्तर पर विभाजन की तस्वीर सामने ला दी।
बागी खेमे की दिलचस्प रणनीति यह रही कि उसने सीधे ममता बनर्जी के खिलाफ व्यक्तिगत हमला करने से परहेज किया। कई रिपोर्टों के अनुसार असंतुष्ट विधायक ममता बनर्जी के प्रति सम्मान जताते रहे, लेकिन पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव को लेकर सवाल उठाते रहे। यही कारण है कि विद्रोह को केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि संगठन की दिशा को लेकर संघर्ष के रूप में भी देखा जा रहा है।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि पार्टी नेतृत्व को संगठन में व्यापक बदलाव करने पड़े। TMC ने अपने विभिन्न संगठनात्मक निकायों और मोर्चों को भंग करने का फैसला लिया, जिसे संकट से निपटने और संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश माना गया। यह कदम दर्शाता है कि नेतृत्व पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी को गंभीरता से ले रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संकट केवल चुनावी हार का परिणाम नहीं है। इसके पीछे कई वर्षों से जमा हो रही असंतुष्टि, नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता और संगठन में शक्ति संतुलन से जुड़े मुद्दे भी हैं। चुनावी हार ने इन सभी अंतर्विरोधों को सतह पर ला दिया।
अब TMC के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी एकता बचाने की है। यदि असंतोष और बढ़ता है तो इसका असर न केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पड़ेगा बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति में भी महसूस किया जा सकता है, क्योंकि TMC लंबे समय से प्रमुख विपक्षी दलों में शामिल रही है।
फिलहाल बंगाल की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। चुनावी हार से शुरू हुआ विवाद अब पार्टी के अस्तित्व और नेतृत्व के भविष्य तक पहुंच चुका है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि ममता बनर्जी इस संकट को संभाल पाती हैं या फिर TMC के इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक टूट एक नई सियासी कहानी लिखती है।