
वेस्ट एशिया में जारी संघर्ष और ईरान-इजरायल तनाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। हालांकि मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत स्थिति में है, लेकिन यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो सबसे बड़ा खतरा कच्चे तेल की कीमतों से पैदा हो सकता है। उनका कहना है कि मौजूदा समय में भारत के आर्थिक संकेतक अपेक्षाकृत मजबूत हैं, लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहने पर महंगाई, विकास दर और सरकारी वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।
नागेश्वरन के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि अभी क्या हो रहा है, बल्कि यह है कि यदि वेस्ट एशिया का संकट साल की दूसरी छमाही तक जारी रहता है तो कच्चे तेल की कीमतें किस स्तर तक पहुंच सकती हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद शुरुआती दिनों में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था, लेकिन बाद में कुछ नरमी भी आई। इसके बावजूद अनिश्चितता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यदि खाड़ी क्षेत्र में तेल उत्पादन, रिफाइनिंग गतिविधियां या समुद्री आपूर्ति मार्ग प्रभावित होते हैं तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में नया संकट खड़ा हो सकता है। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतें काफी ऊपर जा सकती हैं, जिसका असर केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने स्पष्ट किया कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी कई स्तरों पर असर डालती है। सबसे पहले परिवहन लागत बढ़ती है, जिसके कारण वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें ऊपर जाने लगती हैं। उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है और इसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। इससे महंगाई बढ़ सकती है और आम लोगों के खर्च पर दबाव आ सकता है।
महंगाई के अलावा सरकार की वित्तीय स्थिति पर भी इसका असर पड़ सकता है। यदि सरकार पेट्रोल, डीजल या अन्य ईंधन उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए राहत देती है, तो राजकोषीय बोझ बढ़ सकता है। दूसरी ओर यदि कीमतों का पूरा असर उपभोक्ताओं पर डाला जाता है, तो लोगों की क्रय शक्ति कमजोर हो सकती है और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि ऊर्जा कीमतों में वृद्धि को नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती माना जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा चलता है और तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो भारत की आर्थिक विकास दर पर भी असर पड़ सकता है। नागेश्वरन ने संकेत दिया कि सबसे खराब स्थिति में आर्थिक वृद्धि 6 प्रतिशत से नीचे भी जा सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में भारत कई अन्य देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है और उसके पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार तथा आर्थिक स्थिरता के अन्य साधन मौजूद हैं।
इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक भी बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं पर नजर बनाए हुए है। हाल ही में केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों को यथावत रखते हुए संकेत दिया कि कच्चे तेल की कीमतों, कमजोर होती मुद्रा और वेस्ट एशिया संकट जैसी चुनौतियां आगे चलकर महंगाई को प्रभावित कर सकती हैं। इसी वजह से नीति निर्माताओं के सामने विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बनी हुई है।
वेस्ट एशिया संकट का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। शेयर बाजार, मुद्रा बाजार और निवेश प्रवाह पर भी इसका प्रभाव देखने को मिला है। हाल के दिनों में वैश्विक तनाव बढ़ने के बाद भारतीय शेयर बाजार में गिरावट दर्ज की गई, जबकि रुपया भी दबाव में नजर आया। निवेशक जोखिम से बचने की रणनीति अपनाते हुए सतर्क रुख अपना रहे हैं।
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती ऊर्जा आयात पर निर्भरता को कम करना और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना है। साथ ही रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, ऊर्जा आपूर्ति के विविध स्रोत और वित्तीय अनुशासन जैसी नीतियां भविष्य के ऐसे संकटों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
फिलहाल मुख्य आर्थिक सलाहकार का आकलन यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था तत्काल संकट में नहीं है और उसके बुनियादी आर्थिक संकेतक मजबूत बने हुए हैं। लेकिन यदि वेस्ट एशिया का युद्ध लंबे समय तक जारी रहता है और कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी होती है, तो महंगाई, विकास दर, सरकारी वित्त और आम लोगों की जेब पर इसका असर दिखाई दे सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार की दिशा भारत की आर्थिक स्थिति तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक होगी।